Ramayana Katha: विभीषण महर्षि विश्रवा और राक्षसी कैकसी के पुत्र थे। हालांकि, उनका जन्म राक्षस कुल में हुआ था, लेकिन उनका मन सदैव धर्म, सत्य और भगवान विष्णु की भक्ति में लगा रहता था।
Ramayana Mythological Story: रामायण में रावण, कुंभकर्ण और विभीषण तीनों भाइयों का उल्लेख मिलता है, लेकिन इन तीनों का स्वभाव एक-दूसरे से बिल्कुल अलग था। जहां रावण अपनी शक्ति और अहंकार के लिए प्रसिद्ध हुआ, वहीं विभीषण धर्म और सत्य का साथ देने वाले पात्र के रूप में जाने गए। रामायण के युद्ध के बाद जब रावण का अंत हुआ, तब श्रीराम ने विभीषण को लंका का राजा बनाया। इसी प्रसंग के साथ एक ऐसी मान्यता भी जुड़ी है, जिसके अनुसार विभीषण आज भी जीवित हैं। हिंदू धर्म में उन्हें सप्त चिरंजीवियों में स्थान दिया गया है। यही कारण है कि समय-समय पर यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में रावण के भाई विभीषण आज भी इस पृथ्वी पर विद्यमान हैं? आइए, वाल्मीकि रामायण, पुराणों और प्रचलित धार्मिक मान्यताओं के आधार पर इस रहस्य को विस्तार से जानते हैं।
कौन थे विभीषण?
विभीषण महर्षि विश्रवा और राक्षसी कैकसी के पुत्र थे। रावण और कुंभकर्ण उनके बड़े भाई थे, जबकि शूर्पणखा उनकी बहन थीं। हालांकि, उनका जन्म राक्षस कुल में हुआ था, लेकिन उनका मन सदैव धर्म, सत्य और भगवान विष्णु की भक्ति में लगा रहता था। पौराणिक कथाओं के अनुसार विभीषण बचपन से ही सात्विक प्रवृत्ति के थे। उन्होंने तप, संयम और धर्म का पालन किया। यही कारण था कि जहां रावण अपनी शक्ति के कारण देवताओं तक को चुनौती देता था, वहीं विभीषण धर्म के विरुद्ध किसी भी कार्य का समर्थन नहीं करते थे।
सीता हरण के बाद विभीषण ने क्या सलाह दी थी?
जब रावण माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले आया, तब लंका की राजसभा में कई बार इस विषय पर चर्चा हुई। उस समय विभीषण ने खुले शब्दों में रावण को समझाया कि किसी पराई स्त्री का हरण धर्म के विरुद्ध है और माता सीता को सम्मानपूर्वक श्रीराम के पास वापस भेज देना ही उचित होगा।
उन्होंने रावण को चेतावनी भी दी कि श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। यदि उनसे युद्ध हुआ तो लंका का विनाश निश्चित है। लेकिन रावण ने अपने अहंकार में विभीषण की बात को अस्वीकार कर दिया। इतना ही नहीं, उसने सभा में उनका अपमान किया और उन्हें लंका से निकाल दिया।
श्रीराम की शरण में कैसे पहुंचे विभीषण?
रावण द्वारा अपमानित किए जाने के बाद विभीषण अपने कुछ विश्वस्त साथियों के साथ समुद्र पार करके श्रीराम की शरण में पहुंचे। उस समय वानर सेना में यह संदेह था कि कहीं विभीषण शत्रु की ओर से भेजे गए गुप्तचर तो नहीं हैं। सुग्रीव सहित कई योद्धाओं ने उन्हें स्वीकार करने का विरोध किया, लेकिन श्रीराम ने कहा कि जो कोई भी एक बार उनकी शरण में आ जाए, उसे वे कभी अस्वीकार नहीं करते। इसके बाद श्रीराम ने विभीषण को अपने साथ स्वीकार कर लिया। युद्ध के दौरान विभीषण ने श्रीराम को लंका की सेना, रावण के योद्धाओं और कई महत्वपूर्ण रहस्यों की जानकारी दी। मेघनाद के यज्ञ को रोकने और रावण की युद्धनीति को समझने में भी विभीषण की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
रावण की मृत्यु के बाद क्या हुआ?
लंका युद्ध में जब श्रीराम ने रावण का वध किया, तब विभीषण अपने बड़े भाई के अंतिम संस्कार को लेकर संकोच में थे। उनका मानना था कि अधर्मी रावण का अंतिम संस्कार करना उचित नहीं होगा, तब श्रीराम ने उन्हें समझाया कि मृत्यु के बाद सभी वैर समाप्त हो जाते हैं। उन्होंने विभीषण को आदेश दिया कि वे अपने बड़े भाई का विधिपूर्वक अंतिम संस्कार करें। श्रीराम के आदेश का पालन करते हुए विभीषण ने रावण का अंतिम संस्कार संपन्न कराया। इसके बाद श्रीराम ने लक्ष्मण को आदेश दिया कि वे विभीषण का लंका के नए राजा के रूप में राजतिलक करें। इस प्रकार विभीषण लंका के राजा बने और धर्म के अनुसार राज्य का संचालन करने लगे।
विभीषण को चिरंजीवी होने का वरदान कैसे मिला?
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार विभीषण ने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया था। जब ब्रह्माजी ने वरदान मांगने को कहा, तब विभीषण ने धन, बल या अमरता नहीं मांगी। उन्होंने प्रार्थना की कि उनका मन सदैव धर्म और भगवान विष्णु की भक्ति में स्थिर रहे। उनकी धर्मनिष्ठा से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें दीर्घायु होने का वरदान दिया। आगे चलकर श्रीराम ने भी विभीषण को आशीर्वाद दिया कि जब तक पृथ्वी पर उनका यश और रामकथा का प्रचार रहेगा, तब तक विभीषण धर्म की रक्षा के लिए जीवित रहेंगे। इसी वरदान के आधार पर धार्मिक परंपरा में विभीषण को सप्त चिरंजीवियों में स्थान दिया गया है।
अष्ट चिरंजीवी में क्यों गिने जाते हैं विभीषण?
हिंदू धर्म में सात ऐसे महापुरुषों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें चिरंजीवी माना गया है। इन आठों के नाम इस प्रकार बताए जाते हैं- अश्वत्थामा, राजा बलि, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और भगवान परशुराम, ऋषि मार्कंडेय। धार्मिक मान्यता है कि ये आठ कलियुग के अंत तक किसी न किसी रूप में विद्यमान रहेंगे। विभीषण का स्थान इस सूची में इसलिए बताया गया है, क्योंकि उन्होंने धर्म का साथ दिया और श्रीराम की शरण स्वीकार की।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)