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Ramayana: कुंभकर्ण को आखिर क्यों सोना पड़ा छह-छह महीने? जानिए रावण के भाई की निद्रा का रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Ramayana Katha: रामायण के अनुसार रावण, कुंभकर्ण और विभीषण तीनों भाइयों ने ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए घोर तप किया। उनकी तपस्या इतनी कठिन थी कि तीनों लोकों में उसका प्रभाव दिखाई देने लगा। 

Ramayana Mythological Story: 
Ramayana Mythological Story: रामायण में रावण के छोटे भाई कुंभकर्ण का नाम सुनते ही सबसे पहले छह महीने तक सोने वाले महाबली योद्धा की छवि सामने आती है। उनके विशाल शरीर, अपार बल और लंबी निद्रा का उल्लेख वाल्मीकि रामायण से लेकर विभिन्न पुराणों और रामकथा परंपराओं में मिलता है। अक्सर यह प्रश्न उठता है कि आखिर इतना पराक्रमी और विद्वान योद्धा छह-छह महीने तक सोने के लिए क्यों विवश हुआ? क्या यह कोई जन्मजात स्थिति थी या इसके पीछे कोई दैवी कारण था? क्या आपको पता है कि आखिर कुंभकर्ण की निद्रासन का रहस्य क्या था? आइए जानते हैं इसके पीछे छिपी पौराणिक कथा...

कौन थे कुंभकर्ण?

कुंभकर्ण महर्षि विश्रवा और राक्षसी कैकसी के पुत्र थे। उनके बड़े भाई रावण और छोटे भाई विभीषण थे, जबकि उनकी बहन का नाम शूर्पणखा था। चारों भाई-बहनों का स्वभाव एक-दूसरे से बिल्कुल अलग था। रावण महान विद्वान और शिवभक्त होने के साथ-साथ अत्यंत महत्वाकांक्षी था। विभीषण धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने वाले थे, जबकि कुंभकर्ण असाधारण बल, विशाल शरीर और युद्ध कौशल के लिए प्रसिद्ध थे। रामायण में उनका वर्णन ऐसे योद्धा के रूप में मिलता है, जिसे देवता भी युद्ध में हल्के में नहीं लेते थे। कहा जाता है कि उनका शरीर पर्वत के समान विशाल था और उनकी गर्जना से शत्रु भयभीत हो जाते थे।

कुंभकर्ण ने क्यों की कठोर तपस्या?

रामायण के अनुसार रावण, कुंभकर्ण और विभीषण तीनों भाइयों ने ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए घोर तप किया। उनकी तपस्या इतनी कठिन थी कि तीनों लोकों में उसका प्रभाव दिखाई देने लगा। लंबे समय तक तप करने के बाद ब्रह्माजी उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें इच्छानुसार वरदान मांगने के लिए कहा। रावण ने देवता, दानव, गंधर्व और यक्षों से अवध्य होने का वरदान मांगा। विभीषण ने सदैव धर्म का पालन करने और भगवान की भक्ति का वरदान मांगा। अब बारी कुंभकर्ण की थी। यहीं से उनकी छह महीने की निद्रा की कथा प्रारंभ होती है।
 
कुंभकर्ण

देवताओं को क्यों सताने लगी थी चिंता?

देवताओं को पहले से ही यह भय था कि यदि कुंभकर्ण ने अपनी शक्ति के अनुरूप कोई अत्यंत बड़ा वरदान मांग लिया, तो तीनों लोकों में भारी संकट खड़ा हो सकता है। वह पहले ही असाधारण बलशाली था। यदि उसे अमरता, अजेयता या इंद्र का पद मिल जाता तो देवताओं के लिए उसे रोकना लगभग असंभव हो जाता। देवताओं ने इस संकट को देखते हुए ब्रह्माजी से प्रार्थना की कि किसी प्रकार कुंभकर्ण ऐसा वरदान न मांग पाए जिससे समस्त सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाए।

देवी सरस्वती ने कैसे बदल दिए कुंभकर्ण के शब्द?

ब्रह्माजी ने देवताओं की चिंता सुनने के बाद देवी सरस्वती से सहायता करने का आग्रह किया। जब कुंभकर्ण वरदान मांगने के लिए तैयार हुए, तब देवी सरस्वती उनकी जिह्वा पर विराजमान हो गईं। रामकथा की प्रचलित मान्यता के अनुसार कुंभकर्ण इंद्रासन यानी देवराज इंद्र का सिंहासन मांगना चाहते थे, लेकिन देवी सरस्वती के प्रभाव से उनकी वाणी बदल गई और उनके मुख से "इंद्रासन" के स्थान पर "निद्रासन" निकल गया।

ब्रह्माजी ने क्या दिया वरदान?

जब कुंभकर्ण के मुख से "निद्रासन" शब्द निकला, तब ब्रह्माजी ने उसी के अनुसार वरदान प्रदान कर दिया। वरदान मिलते ही यह निश्चित हो गया कि कुंभकर्ण लंबे समय तक सोए रहेंगे और बहुत कम समय के लिए जागेंगे। कथा के अनुसार इस स्थिति को देखकर स्वयं रावण भी चिंतित हो गया। उसे लगा कि इतना महान योद्धा यदि अधिकांश समय सोता रहेगा तो लंका के लिए यह बड़ा नुकसान होगा।

रावण की प्रार्थना पर ब्रह्माजी ने किया संशोधन

रावण ने ब्रह्माजी से निवेदन किया कि यह वरदान वास्तव में कुंभकर्ण के लिए अभिशाप बन गया है। यदि वह हमेशा सोता रहेगा तो उसका बल और पराक्रम किसी काम नहीं आएगा। रावण की प्रार्थना सुनकर ब्रह्माजी ने अपने वरदान में आंशिक परिवर्तन किया। उन्होंने कहा कि कुंभकर्ण लगातार हमेशा नहीं सोएगा, बल्कि छह महीने तक गहरी निद्रा में रहेगा और उसके बाद केवल एक दिन के लिए जागेगा। उस जागरण काल में वह भोजन करेगा, आवश्यक कार्य करेगा और यदि आवश्यकता पड़ी तो युद्ध भी करेगा। इसके बाद वह फिर छह महीने की निद्रा में चला जाएगा। इसी कारण रामायण में कुंभकर्ण की छह-छह महीने की नींद का उल्लेख मिलता है।

 
कुंभकर्ण

कुंभकर्ण के जागने की प्रक्रिया भी थी अत्यंत कठिन

रामायण में वर्णन मिलता है कि जब कुंभकर्ण सो जाता था, तब उसे जगाना अत्यंत कठिन होता था। उसके जागने का समय आने पर हजारों राक्षस उसे जगाने का प्रयास करते थे। वे बड़े-बड़े नगाड़े बजाते, शंख फूंकते, हाथियों को उसके ऊपर चलाते, भारी गदाओं से प्रहार करते और अनेक प्रकार के प्रयास करते थे, तब कहीं जाकर कुंभकर्ण की नींद टूटती थी। जागने के बाद उसकी भूख भी असाधारण होती थी। उसके लिए विशाल मात्रा में भोजन और पेय पदार्थों की व्यवस्था की जाती थी। इसके बाद ही वह सामान्य अवस्था में आता था।

श्रीराम-रावण युद्ध के समय कैसे जागा था कुंभकर्ण?

लंका युद्ध के दौरान जब श्रीराम की सेना ने रावण के अनेक प्रमुख योद्धाओं का वध कर दिया, तब रावण को कुंभकर्ण की याद आई। उस समय कुंभकर्ण अपनी छह महीने की निद्रा में था। रावण के आदेश पर असंख्य राक्षस उसे जगाने पहुंचे। उन्होंने शंख, नगाड़े, भेरियां और विभिन्न वाद्य बजाए। हाथियों और घोड़ों को उसके ऊपर चलाया गया। अनेक प्रकार के प्रयासों के बाद अंततः कुंभकर्ण की नींद टूटी।

जागने के बाद जब उसे युद्ध की पूरी स्थिति बताई गई, तब उसने सबसे पहले रावण को सीता हरण के लिए अनुचित ठहराया। उसने स्पष्ट कहा कि पहले उसे विभीषण और अन्य मंत्रियों की सलाह मान लेनी चाहिए थी। हालांकि, बड़े भाई के प्रति अपने कर्तव्य को निभाते हुए उसने अंततः युद्ध में जाने का निर्णय लिया।

युद्ध में कुंभकर्ण का पराक्रम

युद्धभूमि में उतरते ही कुंभकर्ण ने वानर सेना में भारी हलचल मचा दी। उसका विशाल शरीर और अपार बल देखकर अनेक वानर भयभीत हो गए। उसने अनेक वीरों को परास्त किया और युद्ध का रुख बदलने का प्रयास किया। इसके बाद स्वयं भगवान श्रीराम उसके सामने आए। दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ। श्रीराम ने अपने दिव्य बाणों से पहले उसके हाथ और पैर काटे, फिर अंत में एक प्रचंड बाण से उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया। इस प्रकार लंका का महाबली योद्धा युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुआ।





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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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