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Raja Dashrath Aur Kaikeyi Ki Katha- राजा दशरथ ने कैकेयी को क्यों और कब दिए थे दो वरदान? जानें पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी साह
सार

Raja Dashrath: दशरथ ने कैकेयी से कहा कि इस युद्ध में मेरे साथ सारथी बनकर चलो। कैकेयी ने हर्षपूर्वक स्वीकार किया। दोनों एक ही रथ पर सवार होकर देवासुर संग्राम के मैदान में पहुंचे।

Ramayana Mythological Story
Ramayana Mythological Story: रामायण की सबसे मार्मिक और महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है- राजा दशरथ द्वारा अपनी सबसे प्रिय रानी कैकेयी को दिए गए दो वरदान। इन्हीं दो वरदानों ने न सिर्फ राम को चौदह वर्ष का वनवास दिया, बल्कि पूरी रामकथा की दिशा बदल दी, लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर राजा दशरथ ने कैकेयी को कब और क्यों दिया था ये वरदान। आइए जानते हैं इससे जुड़ी पौराणिक कथा...

देवासुर संग्राम और दशरथ का युद्ध में जाना

त्रेतायुग में जब-जब पृथ्वी पर असुरों का अत्याचार बढ़ता, देवता इंद्र के नेतृत्व में उनसे युद्ध करते थे। ऐसा ही एक भयंकर देवासुर संग्राम हुआ था, जिसमें सम्भरासुर नामक महाबली दैत्य ने देवताओं को बुरी तरह पराजित कर दिया था। सम्भरासुर को यह वरदान था कि वह दिन में नहीं मारा जा सकता, इसलिए वह केवल रात में युद्ध करता और दिन में अपने नगर में चला जाता। देवता हताश हो गए, तब देवराज इंद्र ब्रह्मा जी के पास गए।

ब्रह्मा जी ने कहा कि केवल इक्ष्वाकु वंश के महाराज दशरथ ही इस युद्ध में देवताओं की सहायता कर सकते हैं, क्योंकि उनके पास दिव्य अस्त्र-शस्त्र और अपार शक्ति है। इंद्र स्वयं दशरथ के पास पहुंचे और युद्ध में सहायता मांगी। राजा दशरथ ने तुरंत स्वीकार कर लिया। उस समय दशरथ की तीन रानियां थीं- कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा। कैकेयी दशरथ को सबसे प्रिय थी और वह कुशल रथचालिका तथा युद्धकला में निपुण थी।

कैकेयी का राजा दशरथ के साथ युद्ध में जाना

दशरथ ने कैकेयी से कहा कि इस युद्ध में मेरे साथ सारथी बनकर चलो। कैकेयी ने हर्षपूर्वक स्वीकार किया। दोनों एक ही रथ पर सवार होकर देवासुर संग्राम के मैदान में पहुंचे। युद्ध बहुत भयंकर था। सम्भरासुर की सेना में लाखों राक्षस थे। दशरथ दिव्य अस्त्रों से असुरों का संहार कर रहे थे। कैकेयी कुशलता से रथ हांक रही थी। कई दिन और रातों तक युद्ध चलता रहा।
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कैकेयी ने बचाई दशरथ की जान

एक दिन युद्ध अपने चरम पर था। सम्भरासुर ने स्वयं दशरथ पर आक्रमण कर दिया। उसने एक ऐसा शक्ति-बाण चलाया, जो दशरथ के रथ के पहिये को तोड़कर रथ को उलटने वाला था। रथ का संतुलन बिगड़ गया और वह खाई की ओर गिरने लगा। यदि रथ गिर जाता तो दशरथ की मृत्यु निश्चित थी। 

उस अत्यंत संकटपूर्ण क्षण में कैकेयी ने अपनी अद्भुत बुद्धि और साहस का परिचय दिया। उसने तुरंत रथ का संतुलन बनाए रखा, एक हाथ से दशरथ को सहारा दिया और दूसरे हाथ से दिव्य अस्त्र चला कर सम्भरासुर के बाण को काट दिया। साथ ही उसने रथ को इतनी कुशलता से मोड़ा कि वह खाई में नहीं गिरा। दूसरे ही पल दशरथ ने अपना सबसे प्रचंड अस्त्र छोड़ा और सम्भरासुर का वध कर दिया। असुर सेना भाग खड़ी हुई। देवताओं की विजय हुई।

युद्ध के मैदान में ही दशरथ ने दिए दो वरदान

युद्ध समाप्त होने पर दशरथ अत्यंत प्रसन्न थे। उन्होंने कैकेयी को गले लगाते हुए कहा- प्रिय कैकेयी, तुमने आज मेरी प्राण रक्षा की है। मेरी जान बचाने का यह ऋण मैं जीवन भर नहीं चुका सकता। मैं तुम्हें दो वरदान देता हूं। जब तुम चाहो, जो चाहो, मांग लेना। सत्य प्रतिज्ञ इक्ष्वाकु वंशी कभी अपने वचन से पीछे नहीं हटते।
कैकेयी ने मुस्कुराते हुए कहा- महाराज, अभी मुझे किसी वरदान की आवश्यकता नहीं है। जब कभी आवश्यकता होगी, मैं अवश्य मांग लूंगी। दशरथ ने पुनः सत्य की शपथ लेते हुए वरदान दे दिए। यह घटना राम के जन्म से बहुत पहले की है, जब दशरथ अभी युवा थे और पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ भी नहीं किया था।

राजा दशरथ के चार पुत्र

वर्षों बीत गए। दशरथ को कौसल्या से राम, सुमित्रा से लक्ष्मण-शत्रुघ्न और कैकेयी से भरत हुए। राम बड़े हुए। विश्वामित्र उन्हें लेकर गए, राक्षसों का संहार हुआ, मिथिला में सीता स्वयंवर हुआ और राम-सीता का विवाह हुआ। अयोध्या में हर्षोल्लास था। दशरथ ने राम को युवराज बनाने का निश्चय किया। पूरी अयोध्या में उत्सव की तैयारियां होने लगीं।

मंथरा का विषैला षड्यंत्र

इसी समय कैकेयी की दासी मंथरा ने कैकेयी के कान में विष भरना शुरू किया। उसने कहा- रानी, तुम मूर्ख हो। राम युवराज बनेंगे तो भरत को गुलामी करनी पड़ेगी। कौसल्या तुम्हारी दासी बनेगी। राम तो तुम्हें कैद कर देंगे। कैकेयी पहले तो नहीं मानी, क्योंकि वह राम को पुत्रवत ही प्यार करती थी, लेकिन मंथरा ने बार-बार भय दिखाया कि राम के राज्याभिषेक के बाद भरत और कैकेयी का सर्वनाश हो जाएगा। अंततः कैकेयी का हृदय परिवर्तित हो गया।
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कोप भवन में कैकेयी का नाटक

कैकेयी कोप भवन में चली गईं। सारी सजावट उतार कर, मैले वस्त्र पहन कर, बाल बिखेर कर भूमि पर लेट गईं। जब दशरथ शाम को उनके महल में आए तो उन्हें इस अवस्था में देख कर घबरा गए। बार-बार पूछा- प्रिये, क्या हुआ? किसी ने तुम्हारा अपमान किया? तुम्हें क्या चाहिए बताओ, तुम्हारा चांद के चकोर जैसा मुख आज इस अवस्था में क्यों है? किसको यमराज के पास जाना है? तुम मुझे बताओ कि किसने क्या किया है तुम्हारे साथ, मैं उसे राज्य से निकाल दुंगा। तुम्हें क्या चाहिए, वो बताओ मैं सब दुंगा।

राजा दशरथ के मनाने पर आखिर कैकेयी बोलीं- महाराज आप मांगने के लिए तो कहते हैं, लेकिन कुछ देते नहीं है, आपने मुझे दो वरदान भी दिए थे, जिसे आप शायद भूल गए हैं। कैकेयी ने कहा, “महाराज, कोई मुझे दुःख नहीं दे रहा। बस आप अपने वचन से मुझे दुख दे रहे हैं।

राजा ने हंसकर कहा कि अब मैं तुम्हारा मतलब समझा। मान करना तुम्हें परम प्रिय है। तुमने उन वरों को धरोहर रखकर फिर कभी मांगा ही नहीं और मेरा भूलने का स्वभाव होने से मुझे भी वह प्रसंग याद नहीं रहा। मांगों तुम्हें क्या मांगना है, दो क्या मैं तुम्हारे चार वर पूरे कर दुंगा।

कैकेयी ने मांगे दो वरदान 

कैकेयी ने अपना वरदान मांग लिया। कैकेयी ने कहा- मेरा पहला वरदान यह कि भरत को अयोध्या का राज्याभिषेक हो। दूसरा वरदान यह कि राम चौदह वर्ष तक वन में रहें, वल्कल वस्त्र पहनें, जटा धारण करें और तपस्वी की भांति जीवन व्यतीत करें। इतना सुनते ही दशरथ स्तब्ध रह गए। उनके मुंह से केवल एक शब्द निकला- राम और वे मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।

दशरथ का करुण विलाप

जब होश आया तो दशरथ ने कैकेयी से बहुत अनुनय-विनय की और कहा- कैकेयी, तुम्हें जो चाहिए दे दूंगा, सारी अयोध्या, सारा राज्य, अपना सर्वस्व दे दूंगा, लेकिन राम को वन मत भेजो। राम के बिना मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता। कैकेयी क्रूरता से बोली- महाराज, इक्ष्वाकु वंश में कोई झूठ नहीं बोलता। आपने दो वरदान दिए थे। अब या तो वरदान पूरे कीजिए या सत्य त्याग दीजिए। दुनिया कहेगी कि दशरथ झूठे हैं। दशरथ विलाप करते रहे और कैकेयी से विनती करते रहे, लेकिन कैकेयी अपनी वाणी पर अटल रहीं।

राम का निर्णय और वन गमन

सारी बातें सुनकर भगवान राम ने मुस्कुराते हुए कहा- पिताजी, आप चिंता न करें। मैं अभी वन के लिए प्रस्थान करता हूं। पिता का वचन सत्य करना प्रत्येक पुत्र का परम धर्म है। सीता और लक्ष्मण भी साथ चले गए। दशरथ राम वियोग में कुछ ही दिनों में प्राण त्याग दिए।

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(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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