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Govardhan Puja: गोवर्धन पूजा पर कैसे टूटा इंद्रदेव का घमंड? जानें श्रीकृष्ण की पौराणिक कथा

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Lord Krishna Story: गोवर्धन पूजा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति की महत्ता, गौसेवा, प्रेम, सेवा और अहंकार त्यागने का संदेश देने वाला त्योहार है।
 

Govardhan Puja
Govardhan Parvat Story: हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह पर्व दीपावली के अगले दिन यानी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा की जाती है। गोवर्धन पूजा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की एक ऐसी पौराणिक कथा से है, जिसमें उन्होंने देवराज इंद्र के घमंड को तोड़कर पूरे ब्रजवासियों की रक्षा की थी। इस कथा से यह संदेश मिलता है कि अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, सत्य और धर्म के सामने उसे झुकना ही पड़ता है। आइए जानते हैं कि आखिर भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्रदेव का घमंड कैसे तोड़ा था और गोवर्धन पूजा की शुरुआत कैसे हुई।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में ब्रज क्षेत्र में रहने वाले लोग खेती और पशुपालन करके अपना जीवन बिताते थे। वहां के अधिकतर लोग गायों को पालते थे और दूध, दही, मक्खन आदि से अपनी आजीविका चलाते थे। उस समय ब्रज के लोग वर्षा के देवता इंद्र की पूजा किया करते थे। उनका मानना था कि इंद्रदेव की कृपा से ही बारिश होती है और बारिश के कारण खेतों में अच्छी फसल पैदा होती है।

ब्रजवासी हर साल इंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजा और यज्ञ का आयोजन करते थे। उनका विश्वास था कि यदि इंद्रदेव नाराज हो गए तो वर्षा नहीं होगी और उनका जीवन कठिनाइयों से भर जाएगा। इसी परंपरा के अनुसार एक बार नंद बाबा और दूसरे ब्रजवासी इंद्रदेव की पूजा की तैयारी कर रहे थे।

श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को क्यों रोका?

जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि सभी ब्रजवासी इंद्रदेव की पूजा करने की तैयारी कर रहे हैं, तो उन्होंने अपनी माता यशोदा और पिता नंद बाबा से इसका कारण पूछा। नंद बाबा ने बताया कि इंद्रदेव वर्षा के देवता हैं। उनकी कृपा से ही बारिश होती है और बारिश से खेती तथा पशुओं के लिए चारा मिलता है। इसलिए उन्हें प्रसन्न करने के लिए यह पूजा की जाती है। यह सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को समझाया कि मनुष्य को हमेशा अपने कर्म और प्रकृति का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि ब्रजवासियों का जीवन गोवर्धन पर्वत, जंगलों, पेड़-पौधों, नदियों और गायों पर निर्भर है। गोवर्धन पर्वत से पशुओं को हरा चारा मिलता है, जल के स्रोत मिलते हैं और प्रकृति से जीवन चलाने के लिए जरूरी चीजें प्राप्त होती हैं।

श्रीकृष्ण ने कहा कि हमें गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि ये हमारे जीवन का आधार हैं। उन्होंने ब्रजवासियों को इंद्रदेव की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए प्रेरित किया। भगवान श्रीकृष्ण की बातों से प्रभावित होकर सभी ब्रजवासियों ने इंद्रदेव की पूजा की तैयारी छोड़ दी और गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का निर्णय लिया।

पूजा में लगाया गया 56 भोग

भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर ब्रजवासियों ने बड़े उत्साह के साथ गोवर्धन पर्वत की पूजा की। इस अवसर पर तरह-तरह के पकवान बनाए गए। दूध, दही, मक्खन, मिठाइयां, फल और अनेक प्रकार के व्यंजन भगवान को अर्पित किए गए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत का स्वरूप धारण करके ब्रजवासियों के भोग को स्वीकार किया। उन्होंने ब्रजवासियों से कहा कि गोवर्धन पर्वत की जय बोलो और सभी ने श्रद्धा के साथ गोवर्धन महाराज की जय-जयकार की। इस प्रकार ब्रज में पहली बार गोवर्धन पूजा का आयोजन हुआ। लेकिन जब देवराज इंद्र को पता चला कि ब्रजवासियों ने उनकी पूजा नहीं की और भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर गोवर्धन पर्वत की पूजा की है, तो वह क्रोधित हो गए।

इंद्रदेव ने ब्रज में क्यों भेजा प्रलयंकारी तूफान?

इंद्रदेव को अपनी शक्ति और पद का बहुत घमंड था। उन्हें लगा कि ब्रजवासियों ने उनकी पूजा न करके उनका अपमान किया है। इसी क्रोध में उन्होंने अपने शक्तिशाली मेघों को आदेश दिया कि वे ब्रज में इतनी भयंकर वर्षा करें कि पूरा क्षेत्र जलमग्न हो जाए। इंद्रदेव के आदेश पर बादलों ने ब्रज में मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। तेज हवाएं चलने लगीं, बिजली कड़कने लगी और चारों तरफ पानी भरने लगा। बारिश इतनी भयंकर थी कि लोगों के घरों में पानी घुसने लगा। पशु-पक्षी परेशान हो गए और ब्रजवासियों के सामने अपने परिवार और गायों को बचाने का संकट खड़ा हो गया। चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। लोग डर के मारे भगवान श्रीकृष्ण को पुकारने लगे। सभी ब्रजवासी अपने बाल-बच्चों और पशुओं को लेकर श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और उनसे रक्षा करने की प्रार्थना करने लगे।

श्रीकृष्ण ने एक उंगली पर उठाया गोवर्धन पर्वत

जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि ब्रजवासी इंद्रदेव के प्रकोप से बहुत परेशान हैं, तो उन्होंने सभी को धैर्य रखने के लिए कहा। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर विशाल गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। उन्होंने सभी ब्रजवासियों से कहा कि वे अपने परिवार, गायों और पशुओं के साथ पर्वत के नीचे आकर शरण लें। भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर छत की तरह धारण कर लिया। सभी ब्रजवासी अपने पशुओं और परिवारों के साथ उसके नीचे सुरक्षित हो गए।

मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने लगातार सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाए रखा। इस दौरान इंद्रदेव लगातार बारिश करते रहे, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से ब्रजवासियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। इस अद्भुत दृश्य को देखकर सभी ब्रजवासी भगवान श्रीकृष्ण की जय-जयकार करने लगे। उन्हें समझ आ गया कि उनके कान्हा कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान हैं।

कैसे टूटा इंद्रदेव का घमंड?

सात दिनों तक लगातार वर्षा करने के बाद भी जब इंद्रदेव ब्रजवासियों का कुछ नहीं बिगाड़ पाए, तो उन्हें अपनी गलती का एहसास होने लगा। उन्हें समझ आ गया कि भगवान श्रीकृष्ण कोई साधारण बालक नहीं हैं। उनके सामने उनकी सारी शक्तियां व्यर्थ हैं। इसके बाद इंद्रदेव को अपनी गलती पर पछतावा हुआ। उन्होंने वर्षा रोक दी और भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगने के लिए उनके पास पहुंचे। पौराणिक कथा के अनुसार, इंद्रदेव ने भगवान श्रीकृष्ण के सामने अपना सिर झुकाया और अपने अहंकार के लिए क्षमा मांगी।

इस दौरान कामधेनु गाय ने भी भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक किया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी कारण भगवान श्रीकृष्ण को गोविंद नाम से भी जाना जाता है। गोविंद का अर्थ है गायों के रक्षक और पालनकर्ता। भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्रदेव को क्षमा कर दिया और उन्हें समझाया कि किसी भी व्यक्ति को अपनी शक्ति, पद और अधिकार का घमंड नहीं करना चाहिए। शक्ति का उपयोग दूसरों की रक्षा और कल्याण के लिए होना चाहिए, न कि किसी को डराने या परेशान करने के लिए।

गोवर्धन पूजा से क्या मिलता है संदेश?

गोवर्धन पूजा की यह पौराणिक कथा हमें कई महत्वपूर्ण बातें सिखाती है। सबसे पहली सीख यह है कि मनुष्य को कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए। चाहे उसके पास कितना भी बड़ा पद, धन या शक्ति क्यों न हो, उसे हमेशा विनम्र रहना चाहिए। इसके साथ ही यह पर्व प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर भी है। गोवर्धन पर्वत, गाय, पेड़-पौधे, नदियां और धरती हमारे जीवन का आधार हैं। इसलिए हमें इनकी रक्षा करनी चाहिए और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीना चाहिए। गोवर्धन पूजा के दिन लोग गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाते हैं, भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं और गायों को सजाकर उनकी आरती उतारते हैं। कई स्थानों पर अन्नकूट का आयोजन किया जाता है और भगवान को 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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