Puja Importance: दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा मनाने के पीछे भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला और ब्रजवासियों की रक्षा की पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। यह पर्व हमें भक्ति, प्रकृति प्रेम, अन्न के सम्मान और सामूहिक एकता का संदेश देता है।
Govardhan Puja Traditions: भारत में दिवाली का त्योहार पांच दिनों तक मनाया जाता है। इस पर्व के चौथे दिन गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व होता है। इसे अन्नकूट पूजा के नाम से भी जाना जाता है। दिवाली के अगले दिन यानी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गोवर्धन पूजा की जाती है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत, गाय और प्रकृति की पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गोवर्धन पूजा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की एक पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। इस दिन पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है और भगवान कृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है। आइए जानते हैं कि दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा क्यों की जाती है और इसके पीछे कौन-सी कथा प्रचलित है।
हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गोवर्धन पर्वत ने ब्रजवासियों और उनके पशुओं की रक्षा की थी। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर पूरे ब्रज क्षेत्र के लोगों को इंद्र देव के प्रकोप से बचाया था। इस घटना के बाद से ही गोवर्धन पूजा की परंपरा शुरू हुई। इस दिन लोग अपने घरों में गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाते हैं और उसकी पूजा करते हैं। इसके साथ ही भगवान कृष्ण को अन्नकूट का भोग लगाया जाता है। इस पूजा के माध्यम से प्रकृति, पर्यावरण, पशुधन और अन्न के महत्व को समझाया जाता है।
गोवर्धन पर्वत की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण अपने बाल्यकाल में गोकुल और वृंदावन में रहते थे। उस समय ब्रज के लोग वर्षा के देवता इंद्र की पूजा किया करते थे। उनका मानना था कि इंद्र देव की कृपा से ही वर्षा होती है और वर्षा के कारण खेतों में अच्छी फसल उगती है। इसी वजह से ब्रजवासी हर साल इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजा और यज्ञ का आयोजन करते थे। एक बार जब ब्रजवासी इंद्र देव की पूजा की तैयारी कर रहे थे, तब बालक कृष्ण ने अपने पिता नंद बाबा से पूछा कि वे यह पूजा क्यों कर रहे हैं। नंद बाबा ने बताया कि इंद्र देव वर्षा करते हैं, जिससे धरती पर अन्न और चारा पैदा होता है। इसलिए उनकी पूजा की जाती है।
Trending Video
इस पर भगवान कृष्ण ने कहा कि मनुष्य को अपने कर्म और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए। गोवर्धन पर्वत से हमें पशुओं के लिए हरा चारा, पेड़-पौधे और जल प्राप्त होता है। यहां की भूमि हमारे जीवन का आधार है। इसलिए हमें गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। भगवान कृष्ण की बात सुनकर ब्रजवासियों ने इंद्र देव की पूजा करने के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का निर्णय लिया। उन्होंने गोवर्धन पर्वत को तरह-तरह के पकवानों और व्यंजनों का भोग लगाया। इस आयोजन में भगवान कृष्ण ने भी ब्रजवासियों का साथ दिया।
इंद्र देव ने क्यों किया था ब्रजवासियों पर प्रकोप?
जब इंद्र देव को पता चला कि ब्रजवासियों ने उनकी पूजा नहीं की है, तो वे बहुत क्रोधित हो गए। उन्हें लगा कि भगवान कृष्ण के कहने पर ब्रजवासियों ने उनका अपमान किया है। क्रोध में आकर इंद्र देव ने ब्रज में मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। देखते ही देखते पूरे क्षेत्र में पानी भरने लगा। तेज बारिश और आंधी के कारण ब्रजवासियों के सामने संकट खड़ा हो गया। लोग अपने परिवार और पशुओं को बचाने के लिए परेशान होने लगे। चारों तरफ पानी ही पानी दिखाई देने लगा। जब ब्रजवासियों को कोई रास्ता नहीं सूझा, तब वे भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और उनसे रक्षा करने की प्रार्थना करने लगे।
भगवान कृष्ण ने उठाया गोवर्धन पर्वत
ब्रजवासियों की परेशानी देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें गोवर्धन पर्वत के पास चलने के लिए कहा। इसके बाद उन्होंने अपनी छोटी उंगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया। भगवान कृष्ण ने सभी ब्रजवासियों से कहा कि वे अपने परिवार और पशुओं के साथ पर्वत के नीचे आकर सुरक्षित स्थान पर खड़े हो जाएं। भगवान की लीला देखकर सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। ब्रजवासी अपने पशुओं और परिवार के साथ गोवर्धन पर्वत के नीचे सुरक्षित रहने लगे।
कहा जाता है कि इंद्र देव ने लगातार सात दिनों तक मूसलाधार बारिश की, लेकिन भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाए रखा। इस दौरान किसी भी ब्रजवासी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। आखिरकार इंद्र देव को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्हें समझ आ गया कि भगवान श्रीकृष्ण कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। इसके बाद उन्होंने भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी और वर्षा बंद कर दी।
तभी से शुरू हुई गोवर्धन पूजा की परंपरा
मान्यता है कि इस घटना के बाद से ही ब्रजवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा करना शुरू कर दिया। भगवान कृष्ण ने लोगों को संदेश दिया कि प्रकृति और पर्यावरण हमारे जीवन का आधार हैं। हमें उनका सम्मान करना चाहिए और उनके संरक्षण के लिए प्रयास करना चाहिए। इसी घटना की याद में हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गोवर्धन पूजा की जाती है। इस दिन गोवर्धन पर्वत के साथ भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने की परंपरा है। मथुरा, वृंदावन, गोकुल और बरसाना सहित पूरे ब्रज क्षेत्र में यह त्योहार विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है।
क्यों लगाया जाता है अन्नकूट का भोग?
गोवर्धन पूजा के दिन भगवान श्रीकृष्ण को अन्नकूट का भोग लगाने की विशेष परंपरा है। अन्नकूट का अर्थ होता है अन्न का पहाड़। इस दिन घरों और मंदिरों में कई तरह के पकवान, सब्जियां, मिठाइयां, चावल, दाल और अन्य खाद्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं। इन सभी व्यंजनों को भगवान कृष्ण को अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अन्नकूट का भोग लगाने से भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और घर में अन्न-धन की कमी नहीं होती। कई मंदिरों में इस दिन छप्पन भोग भी लगाया जाता है। इसके बाद प्रसाद को भक्तों के बीच बांटा जाता है।
गोवर्धन पूजा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
गोवर्धन पूजा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व भी है। इस दिन गायों की पूजा की जाती है, क्योंकि हिंदू धर्म में गाय को माता का दर्जा दिया गया है। गाय से प्राप्त दूध, दही, घी और गोबर का धार्मिक और दैनिक जीवन में विशेष महत्व माना जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि मनुष्य का जीवन प्रकृति, पशु-पक्षियों और पर्यावरण पर निर्भर है। इसलिए हमें पेड़-पौधों, पहाड़ों, नदियों और जीव-जंतुओं की रक्षा करनी चाहिए। गोवर्धन पूजा के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने यह संदेश दिया कि प्रकृति का सम्मान करना ही सच्ची पूजा है।
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।