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Nag Panchami: पौराणिक काल के कौन से हैं वो पांच नाग? जिनकी आज भी की जाती है पूजा, जानें पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Nag Panchami: पौराणिक कथाओं में शेषनाग को नागों का राजा और अनंत नाम से भी जाना जाता है। उनका उल्लेख विष्णु पुराण, भागवत पुराण और महाभारत सहित कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। 

Nag Panchami 2026
Nag Panchami 2026: नाग पंचमी का पर्व सनातन धर्म में नाग देवताओं की पूजा और उनके प्रति श्रद्धा का विशेष दिन माना जाता है। सावन शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर नाग देवताओं की पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं और पुराणों में अनेक नागों का वर्णन मिलता है, जिनमें शेषनाग, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक और पद्म नाग का विशेष महत्व बताया गया है। इन नागों का संबंध भगवान विष्णु, भगवान शिव, समुद्र मंथन और महाभारत सहित कई प्रमुख पौराणिक प्रसंगों से जुड़ा हुआ है, लेकिन ये पांच नाग कौन हैं और इनकी पूजा का वर्णन पुराणों में किस प्रकार मिलता है? नाग पंचमी के अवसर पर इन पांच प्रमुख नागों से जुड़ी पौराणिक कथाएं जानना विशेष माना जाता है।

शेषनाग कौन हैं? भगवान विष्णु की शय्या बने नागराज

पौराणिक कथाओं में शेषनाग को नागों का राजा और अनंत नाम से भी जाना जाता है। उनका उल्लेख विष्णु पुराण, भागवत पुराण और महाभारत सहित कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। शेषनाग को भगवान विष्णु का परम भक्त माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में रहते हैं, तब शेषनाग अपनी विशाल कुंडलियों से उनकी शय्या बनते हैं। उनके हजार फनों का वर्णन मिलता है और प्रत्येक फन पर मणि होने की बात भी पुराणों में कही गई है।

शेषनाग से जुड़ी एक प्रमुख कथा उनके भाई-बंधुओं से अलग होने की है। प्रजापति कश्यप की पत्नी कद्रू से अनेक नागों का जन्म हुआ था। कद्रू के पुत्रों में शेष भी थे। अपने भाइयों के व्यवहार और उनकी प्रवृत्तियों से शेषनाग अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने सांसारिक मोह छोड़कर कठोर तपस्या करने का निश्चय किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें वरदान दिया। इसके बाद शेषनाग ने स्वयं को भगवान विष्णु की सेवा में समर्पित कर दिया। इसी कारण उन्हें अनंत शेष कहा गया और भगवान विष्णु की शय्या के रूप में उनका विशेष स्थान माना गया।

वासुकी नाग का समुद्र मंथन से है संबंध

नागों में वासुकी का नाम भी अत्यंत प्रमुख माना जाता है। पुराणों में उन्हें नागराज कहा गया है। वासुकी का संबंध भगवान शिव से भी जोड़ा जाता है। भगवान शिव के गले में सुशोभित नाग को कई धार्मिक परंपराओं में वासुकी के रूप में माना गया है। वासुकी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा समुद्र मंथन की है। देवताओं और असुरों ने जब अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन करने का निश्चय किया, तब मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया।

देवता और असुर वासुकी को पकड़कर समुद्र मंथन करने लगे। इस दौरान वासुकी के शरीर पर अत्यधिक दबाव पड़ा। मंथन के समय उनके मुख से निकले विष के कारण वातावरण अत्यंत विषाक्त हो गया। समुद्र मंथन से निकले इसी भयंकर विष को कालकूट या हलाहल कहा गया। विष के प्रभाव से देवता और असुर सभी चिंतित हो गए। तब भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। इसी कारण भगवान शिव नीलकंठ कहलाए। वासुकी का समुद्र मंथन में महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है और इसी वजह से नाग पंचमी पर उनकी पूजा विशेष रूप से की जाती है।

तक्षक नाग की कथा महाभारत से जुड़ी है

तक्षक नाग का वर्णन महाभारत और पुराणों में मिलता है। वे नागों के प्रमुख राजा माने गए हैं। तक्षक का नाम विशेष रूप से राजा परीक्षित की कथा से जुड़ा हुआ है। महाभारत के अनुसार राजा परीक्षित को एक ऋषि के पुत्र श्रृंगी के शाप के कारण सातवें दिन नाग के डसने से मृत्यु होने वाली थी। शाप के बारे में जानकारी मिलने के बाद राजा परीक्षित ने अपनी सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था कर ली थी। वे नागों से बचने के लिए कड़ी सुरक्षा में रहने लगे।

इसी दौरान तक्षक नाग राजा परीक्षित तक पहुंचने के लिए निकले। कथा के अनुसार तक्षक ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और सुरक्षा व्यवस्था को पार कर लिया। इसके बाद उन्होंने अपने वास्तविक नाग रूप में आकर राजा परीक्षित को डस लिया। तक्षक के विष के प्रभाव से राजा परीक्षित की मृत्यु हो गई। राजा परीक्षित की मृत्यु के बाद उनके पुत्र जनमेजय ने नागों से प्रतिशोध लेने के लिए नाग यज्ञ कराया।

इस यज्ञ में मंत्रों के प्रभाव से नाग अग्नि में गिरने लगे। तक्षक भी इस यज्ञ की अग्नि से बचने के लिए देवराज इंद्र की शरण में गए। जब तक्षक सहित अनेक नागों के नष्ट होने की स्थिति पैदा हुई, तब आस्तीक मुनि ने जनमेजय से नाग यज्ञ रोकने का अनुरोध किया। जनमेजय ने उनकी बात मान ली और यज्ञ समाप्त कर दिया। इस प्रकार तक्षक सहित अनेक नागों का जीवन बच गया।

कर्कोटक नाग की कथा राजा नल से जुड़ी है

कर्कोटक नाग का वर्णन महाभारत के वन पर्व में मिलता है। उनकी कथा राजा नल और रानी दमयंती की प्रसिद्ध कथा से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार कर्कोटक नाग एक वन में रहते थे। एक समय वे किसी कारण से अग्नि के बीच फंस गए। उसी दौरान राजा नल वहां पहुंचे। कर्कोटक ने राजा नल से उन्हें अग्नि से बाहर निकालने का अनुरोध किया। राजा नल ने उनकी सहायता की और उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया।

इसके बाद कर्कोटक नाग ने राजा नल को एक विशेष प्रकार से डस लिया। इस विष के कारण राजा नल का रूप बदल गया और उनका शरीर विकृत दिखाई देने लगा। यह डसना राजा नल के लिए साधारण घटना नहीं थी। कर्कोटक ने उन्हें बताया कि उनके शरीर में प्रवेश कर चुका विष उनके भीतर मौजूद कलि के प्रभाव को कमजोर करेगा। कर्कोटक ने राजा नल को बाहुक नाम से रहने और अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण के यहां सेवा करने की सलाह दी। आगे चलकर राजा नल ने अपने ज्ञान और कौशल के माध्यम से अपनी पहचान और राज्य दोनों वापस प्राप्त किए। इस पूरी कथा में कर्कोटक नाग की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

पद्म नाग का पुराणों में विशेष उल्लेख

पद्म नाग भी प्रमुख नागों में गिने जाते हैं। पुराणों में नागों के अनेक कुलों और प्रमुख नागों का वर्णन मिलता है। पद्म नाग का नाम उन प्रसिद्ध नागों में आता है जिनका स्मरण नाग पूजा के अवसर पर किया जाता है। पद्म नाग से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में उन्हें नाग लोक के प्रमुख नागों में माना गया है। विभिन्न पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में नागों की अलग-अलग सूचियां मिलती हैं और कई स्थानों पर पद्म, महापद्म, शंखपाल, कुलिक, तक्षक, वासुकी तथा शेष जैसे नागों का उल्लेख मिलता है।

नाग पंचमी के दिन नाग देवताओं की पूजा करते समय इन प्रमुख नागों का स्मरण करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। नाग देवताओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए लोग नाग प्रतिमा या नाग चित्र की पूजा करते हैं और दूध, पुष्प, अक्षत तथा जल अर्पित करते हैं।

नाग पंचमी पर इन नागों के स्मरण की परंपरा

नाग पंचमी की पूजा में नाग देवताओं का स्मरण विशेष रूप से किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन नागों की पूजा करने से नाग देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। कई स्थानों पर शेषनाग, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक और पद्म नाग का नाम लेकर पूजा की जाती है। नाग पंचमी की कथा और पूजा परंपरा में नागों को केवल सर्प के रूप में नहीं, बल्कि नाग देवता के रूप में पूजने की परंपरा है। भगवान शिव के साथ वासुकी, भगवान विष्णु के साथ शेषनाग और महाभारत की कथा में तक्षक जैसे नागों का विशेष धार्मिक और पौराणिक स्थान है। इसी कारण सावन के इस पर्व पर इन नागों का स्मरण और पूजन सनातन परंपरा में विशेष महत्व रखता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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