Nag Panchami: नाग पंचमी के पर्व से जुड़ी कई पौराणिक कथाओं में नागवंश और ऋषियों का उल्लेख मिलता है। इनमें महाभारत से जुड़ी राजा जनमेजय के सर्पसत्र की कथा विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। कहा जाता है कि राजा जनमेजय ने अपने पिता राजा परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए ऐसा भयंकर यज्ञ कराया था, जिसमें मंत्रों की शक्ति से एक-एक करके नाग अग्निकुंड की ओर खिंचे चले आ रहे थे। बड़े-बड़े और शक्तिशाली नाग भी इस यज्ञ से बच नहीं पा रहे थे। जब नागों का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया, तब आस्तिक मुनि ने वहां पहुंचकर अपनी बुद्धि और तपोबल से नागवंश को विनाश से बचाया। आखिर जनमेजय ने इतना बड़ा सर्पसत्र क्यों कराया था और आस्तिक मुनि ने किस तरह नागों की रक्षा की? आइए जानते हैं इस पूरी पौराणिक कथा को...
राजा परीक्षित की मृत्यु से शुरू हुई प्रतिशोध की आग
महाभारत के अनुसार, राजा परीक्षित पांडव वंश के राजा थे। एक बार शिकार के दौरान उन्हें अत्यंत प्यास लगी। वे एक आश्रम में पहुंचे, जहां शमीक नाम के ऋषि ध्यान में लीन थे। राजा ने उनसे जल और अपने आने का संकेत जानना चाहा, लेकिन ऋषि गहरे ध्यान में होने के कारण कोई उत्तर नहीं दे सके। राजा परीक्षित को यह बात अपमान जैसी लगी। क्रोध में उन्होंने वहां पड़े एक मृत सर्प को उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया और अपने महल लौट आए।
ऋषि शमीक के पुत्र श्रृंगी को जब इस घटना का पता चला तो उन्हें बहुत क्रोध आया। उन्होंने राजा परीक्षित को श्राप दिया कि सातवें दिन तक्षक नामक नाग के डसने से उनकी मृत्यु हो जाएगी। श्राप की बात राजा परीक्षित तक पहुंची तो उन्होंने अपनी रक्षा के लिए कई उपाय किए, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सातवें दिन नागराज तक्षक ने राजा परीक्षित को डस लिया और उनकी मृत्यु हो गई।
तक्षक से बदला लेने के लिए हुआ सर्पसत्र
पिता परीक्षित की मृत्यु का समाचार सुनकर उनके पुत्र राजा जनमेजय अत्यंत क्रोधित हुए। उन्हें पता चला कि तक्षक नाग के विष से उनके पिता की मृत्यु हुई है। इसके बाद उन्होंने तक्षक समेत समस्त नागवंश को समाप्त करने का संकल्प लिया। राजा जनमेजय ने महान ऋषियों और ब्राह्मणों को बुलाकर एक विशाल सर्पसत्र यज्ञ का आयोजन कराया। इस यज्ञ का उद्देश्य ही नागों का विनाश करना था। यज्ञ के लिए विशाल वेदी तैयार की गई और मंत्रोच्चार के साथ अग्नि प्रज्वलित की गई। ऋषियों ने ऐसे मंत्रों का उच्चारण शुरू किया, जिनके प्रभाव से दूर-दूर रहने वाले नाग भी अपने आप खिंचकर यज्ञ की अग्नि में गिरने लगे।
मंत्रों के प्रभाव से अग्निकुंड की ओर खिंच रहे थे नाग
सर्पसत्र शुरू होते ही नागलोक में भय फैल गया। यज्ञ की शक्ति इतनी प्रबल थी कि अनेक नाग अपनी इच्छा के विरुद्ध आकाश में उठकर यज्ञ की अग्नि की ओर जाने लगे। छोटे-बड़े असंख्य नाग अग्निकुंड में गिरते जा रहे थे। नागवंश के लिए यह केवल कुछ नागों की मृत्यु का मामला नहीं था, बल्कि पूरा नागकुल विनाश के कगार पर पहुंच गया था।
नागराज वासुकि समेत नागवंश के प्रमुख लोगों को इस बात की चिंता सताने लगी कि यदि यज्ञ इसी तरह चलता रहा तो कोई भी नाग जीवित नहीं बचेगा। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा जनमेजय का क्रोध इतना प्रबल था कि वे तब तक यज्ञ रोकने के लिए तैयार नहीं थे, जब तक तक्षक समेत पूरा नागवंश समाप्त न हो जाए।
तक्षक ने इंद्र की शरण ली
जब नागों का विनाश लगातार होने लगा तो तक्षक ने अपनी रक्षा के लिए देवराज इंद्र की शरण ली। तक्षक इंद्र के पास जाकर उनकी शरण में रहने लगा। कहा जाता है कि इंद्र ने तक्षक को अपने संरक्षण में रख लिया, लेकिन राजा जनमेजय के यज्ञ में तक्षक के बच जाने की बात सामने आई तो ऋत्विजों ने तक्षक को भी यज्ञ की अग्नि की ओर खींचने के लिए मंत्रों का प्रयोग किया। यज्ञ की शक्ति से इंद्र का आसन भी प्रभावित होने लगा। तक्षक इंद्र के साथ ही यज्ञ की ओर खिंचने लगा। यह देखकर यज्ञ में उपस्थित लोग समझ गए कि अब तक्षक भी अग्निकुंड से नहीं बच सकेगा। राजा जनमेजय भी चाहते थे कि तक्षक किसी भी स्थिति में बचने न पाए।
आस्तिक मुनि का जन्म नागवंश की रक्षा के लिए हुआ था
इसी समय इस कथा में आस्तिक मुनि का प्रवेश होता है। आस्तिक मुनि ऋषि जरत्कारु और नागकन्या जरत्कारु के पुत्र थे। उनकी माता नागराज वासुकि की बहन थीं। इस प्रकार आस्तिक मुनि का संबंध ऋषि परंपरा और नागवंश दोनों से था। पौराणिक कथा के अनुसार, नागवंश पर आए इस संकट को देखते हुए आस्तिक मुनि यज्ञ स्थल की ओर गए। वे बहुत कम आयु में ही वेदों और शास्त्रों के ज्ञाता तथा तपस्वी माने जाते थे।
जब आस्तिक मुनि जनमेजय के यज्ञ स्थल पर पहुंचे तो उन्होंने राजा की प्रशंसा की। उन्होंने राजा के यश, पराक्रम और यज्ञ की व्यवस्था की प्रशंसा करते हुए उनसे प्रसन्न होकर वरदान देने का आग्रह किया। राजा जनमेजय आस्तिक मुनि के ज्ञान और वाणी से प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि वे मुनि की इच्छा के अनुसार वरदान देने के लिए तैयार हैं।
आस्तिक मुनि ने मांगा यज्ञ रोकने का वरदान
राजा द्वारा वरदान देने की बात कहे जाने के बाद आस्तिक मुनि ने वही मांग रखी जिसकी वजह से वे यज्ञस्थल पर आए थे। उन्होंने राजा जनमेजय से सर्पसत्र को रोक देने का वरदान मांगा। राजा जनमेजय के लिए यह मांग आसान नहीं थी। उनका उद्देश्य तक्षक को दंड देना और नागवंश का विनाश करना था। यज्ञ लगभग अपने उद्देश्य तक पहुंच चुका था और तक्षक भी यज्ञ की शक्ति से खिंचा चला आ रहा था।
राजा के सामने धर्मसंकट उत्पन्न हो गया। एक ओर पिता की मृत्यु का बदला लेने की उनकी प्रतिज्ञा थी, तो दूसरी ओर वे आस्तिक मुनि को वरदान देने का वचन दे चुके थे। ऋषियों और पुरोहितों की उपस्थिति में आस्तिक मुनि ने अपनी बात स्पष्ट रखी और यज्ञ को समाप्त करने का आग्रह किया।
तक्षक यज्ञ की अग्नि में गिरने से बच गया
कथा के अनुसार, उस समय तक्षक भी इंद्र के साथ यज्ञ की ओर खिंच रहा था। यज्ञ में तक्षक को अग्नि में लाने के लिए मंत्रों का उच्चारण हो रहा था। लेकिन तभी आस्तिक मुनि ने राजा जनमेजय से यज्ञ रोकने का आग्रह किया। राजा ने आस्तिक मुनि को दिया हुआ वरदान स्वीकार किया और सर्पसत्र को रोक दिया। इसके साथ ही तक्षक की जान बच गई और नागवंश का पूर्ण विनाश टल गया। इस तरह आस्तिक मुनि ने अपने तप, ज्ञान और वाणी से वह कार्य किया जिसके कारण नागवंश का अस्तित्व बच सका। जिस यज्ञ में लगातार नाग अग्नि की ओर खिंचे चले आ रहे थे, उसी यज्ञ को आस्तिक मुनि ने रुकवा दिया।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)