Vishnu Purana: विष्णु पुराण और अन्य वैष्णव पुराणों में शेषनाग का वर्णन अत्यंत प्रभावशाली रूप में मिलता है। उन्हें भगवान विष्णु का परम भक्त, अनंत स्वरूप वाला नागराज और पृथ्वी को धारण करने वाला दिव्य नाग बताया गया है।
Vishnu Purana Katha: सनातन धर्म में भगवान विष्णु का स्वरूप जब भी ध्यान में आता है तो क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विराजमान उनकी दिव्य छवि भी सामने आती है। भगवान विष्णु के साथ शेषनाग का यह संबंध केवल एक चित्रात्मक रूप नहीं, बल्कि पुराणों में वर्णित एक गहरी पौराणिक परंपरा से जुड़ा है। शेषनाग को अनंत और नागराज के नाम से भी जाना जाता है। उनके असंख्य फनों पर भगवान विष्णु का विश्राम करना और स्वयं शेषनाग का भगवान की शय्या बनना विष्णु से जुड़े प्रमुख पौराणिक प्रसंगों में शामिल है।
विष्णु पुराण और अन्य वैष्णव पुराणों में शेषनाग का वर्णन अत्यंत प्रभावशाली रूप में मिलता है। उन्हें भगवान विष्णु का परम भक्त, अनंत स्वरूप वाला नागराज और पृथ्वी को धारण करने वाला दिव्य नाग बताया गया है, लेकिन शेषनाग भगवान विष्णु की शय्या कैसे बने और उन्हें अनंत क्यों कहा गया, इसके पीछे भी एक विस्तृत पौराणिक कथा है।
कौन हैं शेषनाग?
शेषनाग को नागों के राजा के रूप में जाना जाता है। पुराणों में उनका एक नाम अनंत भी मिलता है। ‘शेष’ का अर्थ उस सत्ता से जुड़ा है जो सब कुछ समाप्त होने के बाद भी शेष रहती है। इसी कारण उन्हें अनंत और शेष दोनों नामों से पुकारा गया।
पौराणिक वर्णन के अनुसार शेषनाग के अनेक फन हैं और वे अपनी विशाल देह पर पृथ्वी को धारण करते हैं। भगवान विष्णु के साथ उनका संबंध अत्यंत प्राचीन माना गया है। क्षीरसागर में भगवान विष्णु जब योगनिद्रा में रहते हैं, तब शेषनाग उनके लिए दिव्य शय्या का रूप धारण करते हैं। शेषनाग अपने फनों से भगवान विष्णु के ऊपर छत्र भी बनाते हैं। भगवान विष्णु के इस स्वरूप में माता लक्ष्मी उनके चरणों के पास विराजमान दिखाई देती हैं और भगवान विष्णु शेषनाग की कुंडली पर विश्राम करते हैं। यह दृश्य वैष्णव परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
कद्रू के पुत्र और नागों में सबसे बड़े शेष
पौराणिक कथाओं में ऋषि कश्यप की अनेक पत्नियों का वर्णन मिलता है। इनमें कद्रू से नागों की उत्पत्ति बताई गई है। कद्रू के अनेक पुत्र हुए, जिनमें शेषनाग प्रमुख थे। नागों के जन्म के बाद उनके बीच अलग-अलग स्वभाव और प्रवृत्तियों का वर्णन पुराणों में मिलता है। शेषनाग अपने भाइयों के आचरण से कई बार दुखी रहते थे। नागों के बीच होने वाले विवादों और उनकी कुछ प्रवृत्तियों से वे स्वयं को अलग रखना चाहते थे। कहा जाता है कि शेषनाग का मन सांसारिक विवादों से हटकर भगवान की भक्ति में लग गया। उन्होंने अपने भाइयों और माता से अलग होकर तपस्या करने का निर्णय लिया।
शेषनाग ने की कठोर तपस्या
शेषनाग ने भगवान की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की। उन्होंने अपने मन को पूरी तरह भगवान की आराधना में लगा दिया। उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि देवताओं का ध्यान भी उनकी ओर गया। शेषनाग की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए। भगवान के दर्शन पाकर शेषनाग ने अपनी इच्छा प्रकट की कि उनका मन सदैव भगवान की भक्ति में लगा रहे और वे भगवान की सेवा से कभी दूर न हों। भगवान विष्णु शेषनाग की भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें अपने साथ रहने का वर प्रदान किया। इसी के बाद शेषनाग का भगवान विष्णु के साथ वह दिव्य संबंध स्थापित हुआ, जिसका वर्णन वैष्णव परंपरा में मिलता है।
भगवान विष्णु ने शेषनाग को बनाया अपनी शय्या
पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने शेषनाग की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी सेवा का विशेष स्थान दिया। शेषनाग ने भगवान के लिए अपनी विशाल देह को शय्या के रूप में अर्पित किया। शेषनाग अपनी कुंडलाकार देह को इस प्रकार धारण करते हैं कि भगवान विष्णु उस पर आराम से विश्राम कर सकें। इसी कारण भगवान विष्णु का एक प्रसिद्ध स्वरूप क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विराजमान दिखाई देता है। यहां शेषनाग केवल भगवान की शय्या ही नहीं हैं। जब भगवान विष्णु विश्राम करते हैं, तब शेषनाग अपने फनों को फैलाकर उनके ऊपर छत्र का रूप भी धारण करते हैं। इस प्रकार वे भगवान की सेवा में निरंतर उपस्थित रहते हैं।
शेषनाग को क्यों कहा जाता है अनंत?
शेषनाग का दूसरा प्रमुख नाम ‘अनंत’ है। पुराणों में उनका स्वरूप अनंत और असीम बताया गया है। इसी कारण वे अनंत शेष या अनंत नाग के नाम से प्रसिद्ध हुए। ‘अनंत’ का संबंध उनकी विशालता और उनके दिव्य स्वरूप से माना जाता है। शेषनाग का कोई सामान्य नाग की तरह सीमित स्वरूप नहीं बताया गया है। उनके असंख्य फनों का वर्णन मिलता है और उनका विस्तार भी असीम माना गया है। इसी अनंत स्वरूप के कारण भगवान विष्णु के साथ उनका संबंध भी विशेष माना गया। भगवान विष्णु का शेषशायी रूप इसी कारण वैष्णव परंपरा में अत्यंत पूजनीय है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)