Mahabharata Mythological Story: महाभारत का चीरहरण प्रसंग भारतीय पौराणिक कथाओं के सबसे चर्चित और मार्मिक प्रसंगों में से एक माना जाता है। यह वह घटना थी, जब हस्तिनापुर की भरी राजसभा में द्रौपदी का अपमान करने का प्रयास किया गया। सभा में उस समय भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, धृतराष्ट्र, विदुर, दुर्योधन, कर्ण सहित अनेक महारथी मौजूद थे, लेकिन कोई भी द्रौपदी की रक्षा के लिए आगे नहीं आया। जब सभी उम्मीदें समाप्त हो गईं, तब द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया और इसके बाद जो हुआ, वह महाभारत का सबसे प्रसिद्ध चमत्कारी प्रसंग बन गया। आइए जानते हैं इस प्रसंग से जुड़ी पौराणिक कथा...
जुए के खेल से शुरू हुई पूरी घटना
महाभारत के अनुसार, राजसूय यज्ञ के बाद पांडवों का वैभव और शक्ति लगातार बढ़ रही थी। यह बात दुर्योधन को बिल्कुल पसंद नहीं आई। उसने अपने मामा शकुनि के साथ मिलकर पांडवों को जुए के खेल में हराने की योजना बनाई। महाराज धृतराष्ट्र की अनुमति से हस्तिनापुर में जुए की सभा बुलाई गई। धर्मराज युधिष्ठिर को भी आमंत्रित किया गया। शकुनि पासों का बड़ा खिलाड़ी था और अपनी चालाकी से उसने एक-एक करके युधिष्ठिर की सारी संपत्ति, राज्य, रथ, हाथी, घोड़े और धन जीत लिया। इसके बाद युधिष्ठिर ने अपने चारों भाइयों को दांव पर लगाया और उन्हें भी हार गए। अंत में उन्होंने स्वयं को भी हार दिया।
द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया गया
जब युधिष्ठिर सब कुछ हार चुके, तब शकुनि ने उनसे द्रौपदी को दांव पर लगाने के लिए कहा। युधिष्ठिर ने द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया और इस दांव में भी वे हार गए। इसके बाद दुर्योधन ने अपने भाई दुःशासन को आदेश दिया कि वह द्रौपदी को राजसभा में लेकर आए।
द्रौपदी ने पूछा धर्म का सबसे बड़ा प्रश्न
उस समय द्रौपदी अपने महल में थीं। दुःशासन ने उन्हें सभा में चलने के लिए कहा, लेकिन द्रौपदी ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा। उन्होंने कहा कि पहले यह बताया जाए कि महाराज युधिष्ठिर ने पहले स्वयं को हारा था या बाद में उन्हें दांव पर लगाया था। यदि वे पहले ही स्वयं दास बन चुके थे, तो उन्हें अपनी पत्नी को दांव पर लगाने का अधिकार कैसे हो सकता था? दुःशासन ने उनके प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया। उसने बलपूर्वक द्रौपदी के बाल पकड़ लिए और उन्हें घसीटते हुए राजसभा में ले आया।
सभा में किसी ने नहीं किया विरोध
राजसभा में पहुंचने के बाद द्रौपदी ने सबसे पहले भीष्म पितामह से धर्म का निर्णय पूछना चाहा। उन्होंने पूछा कि क्या स्वयं को हार चुका व्यक्ति अपनी पत्नी को दांव पर लगा सकता है। भीष्म ने इसे धर्म का अत्यंत जटिल विषय बताते हुए स्पष्ट उत्तर देने से इनकार कर दिया। गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और धृतराष्ट्र भी मौन रहे। केवल विदुर ने दुर्योधन के इस कृत्य का विरोध किया, लेकिन उनकी बात को किसी ने नहीं माना। उधर कर्ण ने भी दुर्योधन का समर्थन किया और द्रौपदी के लिए कठोर शब्द कहे।
दुर्योधन ने दिया चीरहरण का आदेश
दुर्योधन ने अपमान की सारी सीमाएं पार करते हुए दुःशासन को आदेश दिया कि वह द्रौपदी के वस्त्र उतार दे। आदेश मिलते ही दुःशासन द्रौपदी की ओर बढ़ा और उनके चीरहरण का प्रयास करने लगा। द्रौपदी ने सभा में उपस्थित सभी लोगों से सहायता मांगी, लेकिन कोई भी उनकी रक्षा के लिए आगे नहीं आया।
जब द्रौपदी ने लिया श्रीकृष्ण का नाम
जब द्रौपदी को लगा कि अब संसार में उनकी रक्षा करने वाला कोई नहीं बचा है, तब उन्होंने दोनों हाथ उठाकर पूरे विश्वास के साथ भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया। कहा जाता है कि उस समय उन्होंने स्वयं को पूरी तरह श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया और उनकी शरण ली।
श्रीकृष्ण ने ऐसे बचाई द्रौपदी की लाज
जैसे ही दुःशासन ने द्रौपदी की साड़ी खींचनी शुरू की, वैसे ही भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से उनकी साड़ी लगातार बढ़ने लगी। दुःशासन पूरी ताकत से वस्त्र खींचता रहा, लेकिन साड़ी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। जितना वह साड़ी खींचता, उतनी ही नई साड़ी प्रकट होती जाती। कुछ ही देर में सभा में वस्त्रों का बड़ा ढेर लग गया, लेकिन द्रौपदी के वस्त्र समाप्त नहीं हुए। यह दृश्य देखकर पूरी सभा आश्चर्यचकित रह गई।
दुःशासन थककर बैठ गया
दुःशासन लगातार पूरी शक्ति से साड़ी खींचता रहा। धीरे-धीरे उसकी ताकत जवाब देने लगी। उसके शरीर से पसीना बहने लगा और अंत में वह थककर वहीं बैठ गया। वह द्रौपदी का चीरहरण करने में पूरी तरह असफल रहा। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से द्रौपदी की लाज बच गई।
भीम ने उसी सभा में ली भयंकर प्रतिज्ञा
द्रौपदी का अपमान देखकर भीम का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे युद्ध में दुःशासन का वध करेंगे और दुर्योधन की जांघ तोड़ेंगे। द्रौपदी ने भी प्रण लिया कि जब तक दुःशासन का वध नहीं होगा, तब तक वह अपने केश नहीं बांधेंगी।
महाभारत युद्ध में पूरी हुई प्रतिज्ञा