विज्ञापन
Home  mythology  mahabharat story raja shalay ko kyo banna pada tha karn ka saarthi

Mahabharat Story: राजा शल्य को क्यों बनना पड़ा था कर्ण का सारथी , जानिए कथा

जीवांजलिPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Karn Ka Sarthi Kaun Tha: राजा शल्य  महाभारत के एक अत्यंत महत्वपूर्ण, पराक्रमी और जटिल चरित्र हैं। वे मद्र देश के राजा थे, इसलिए उन्हें 'मद्रराज' भी कहा जाता है। शल्य नकुल और सहदेव की माता, रानी माद्री के सगे भाई  थे

Mahabharat Story
Karn Ka Sarthi Kaun Tha: राजा शल्य  महाभारत के एक अत्यंत महत्वपूर्ण, पराक्रमी और जटिल चरित्र हैं। वे मद्र देश के राजा थे, इसलिए उन्हें 'मद्रराज' भी कहा जाता है। शल्य नकुल और सहदेव की माता, रानी माद्री के सगे भाई  थे, और इस नाते वे पांडवों के सगे मामा थे। वे एक कुशल योद्धा, अद्वितीय गदाधारी और विश्वप्रसिद्ध सारथी थे।महाभारत के युद्ध में उनकी भूमिका बहुत अजीब और विवशतापूर्ण रही। वे पांडवों के मामा होने के बावजूद कौरवों की ओर से लड़े और अंततः युद्ध के 17वें दिन कर्ण के सारथी बने। शल्य के कर्ण का सारथी बनने के पीछे एक बहुत ही दिलचस्प, कूटनीतिक और भावुक कहानी है।

दुर्योधन का छल

जब महाभारत का युद्ध निश्चित हो गया, तो राजा शल्य ने अपने भानजों (पांडवों) की सहायता करने का निर्णय लिया। वे एक विशाल अक्षौहिणी सेना लेकर पांडवों के शिविर की ओर निकल पड़े।दुर्योधन अपनी गुप्तचर प्रणाली के कारण शल्य की इस यात्रा से वाकिफ था। वह शल्य जैसे महारथी को पांडवों से मिलने से पहले ही अपने पक्ष में करना चाहता था। इसके लिए दुर्योधन ने एक गहरी कूटनीति रची। शल्य के रास्ते में जितने भी विश्राम स्थल थे, दुर्योधन ने उन सभी को गुप्त रूप से अत्यंत भव्य और विलासितापूर्ण महलों में बदल दिया। वहां शल्य और उनकी सेना के लिए उत्तम भोजन, मदिरा, दास-दासियों और मनोरंजन की ऐसी व्यवस्था की गई, जैसी उन्होंने कभी मद्र देश में भी नहीं देखी थी। शल्य को लगा कि यह सब व्यवस्था उनके भांजे युधिष्ठिर ने की है।

अत्यंत प्रसन्न होकर शल्य ने चिल्लाकर कहा, "जिसने भी मेरे लिए यह अद्भुत सत्कार आयोजित किया है, वह सामने आए। मैं उसे मुंह मांगा वरदान दूंगा।"

उसी समय दुर्योधन छिपकर सामने आया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। शल्य यह देखकर स्तब्ध रह गए कि यह सब दुर्योधन ने किया था। लेकिन चूंकि वे वचन दे चुके थे, दुर्योधन ने तुरंत वरदान मांग लिया: "मामाश्री! आप महाभारत के युद्ध में मेरी ओर से लड़ें और मेरी सेना के सेनापति या रक्षक बनें।"

वचन के पक्के शल्य विवश हो गए। उन्होंने भारी मन से दुर्योधन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, लेकिन उन्होंने युधिष्ठिर से मिलने की अनुमति मांगी। युधिष्ठिर के पास जाकर शल्य ने अपनी भूल स्वीकार की। युधिष्ठिर शांत थे, उन्होंने शल्य से कहा कि वे अपने वचन का पालन करें, लेकिन साथ ही उन्होंने शल्य से एक गुप्त सहायता भी मांग ली, जिसने आगे चलकर कर्ण के अंत की नींव रखी।

 कर्ण के सारथी कैसे बने शल्य

युद्ध के 16वें दिन, भीष्म और द्रोणाचार्य के पतन के बाद, कर्ण को कौरव सेना का प्रधान सेनापति बनाया गया। कर्ण एक अद्भुत योद्धा थे, लेकिन उनके सामने अर्जुन जैसा प्रतिद्वंद्वी था, जिसके सारथी स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे।कर्ण जानते थे कि अर्जुन को हराने के लिए उन्हें एक ऐसे सारथी की आवश्यकता है, जो न केवल रथ चलाने में निपुण हो, बल्कि जिसका प्रभाव और कौशल श्रीकृष्ण के स्तर का हो। कर्ण ने दुर्योधन से कहा:"अर्जुन के पास कृष्ण जैसा सारथी है, जो घोड़ों के दिल की बात समझता है। यदि मुझे अर्जुन को हराना है, तो मुझे मद्रराज शल्य जैसा सारथी चाहिए। वे अश्व-विद्या (घोड़ों के विज्ञान) में कृष्ण के समान ही कुशल हैं।"

शल्य ने किया सारथी बनने से  इनकार

जब दुर्योधन ने राजा शल्य के सामने कर्ण का सारथी बनने का प्रस्ताव रखा, तो शल्य क्रोध से आगबबूला हो गए। वे एक क्षत्रिय राजा थे और कर्ण को समाज में 'सूतपुत्र' माना जाता था। शल्य ने इसे अपना घोर अपमान समझा। उन्होंने कहा, "दुर्योधन! तुम मेरा अपमान कर रहे हो। मैं एक राजा हूं, और तुम मुझे एक सूतपुत्र का सारथी बनने को कह रहे हो? मैं अभी अपनी सेना लेकर वापस लौट जाऊंगा।"दुर्योधन ने स्थिति बिगड़ती देख शल्य की खुशामद शुरू की। उसने शल्य को ब्रह्मा जी और त्रिपुरासुर वध की कथा सुनाई, जहां देवताओं के अनुरोध पर स्वयं ब्रह्मा जी भगवान शिव के सारथी बने थे। दुर्योधन ने कहा:
"मामाश्री, सारथी बनने से कोई छोटा नहीं होता। कृष्ण भी तो अर्जुन के सारथी हैं, जबकि वे यादवों के राजा हैं। आप योग्यता में कर्ण से कहीं श्रेष्ठ हैं, इसीलिए केवल आप ही उनके तेज को संभाल सकते हैं।" इस अत्यधिक प्रशंसा और कूटनीति के बाद शल्य मान गए, लेकिन उन्होंने एक बहुत ही कड़वी शर्त रखी। शल्य ने कहा: "ठीक है, मैं कर्ण का सारथी बनूंगा। लेकिन रथ पर बैठ कर मेरे मुंह से जो भी अच्छा या बुरा निकलेगा, कर्ण को उसे चुपचाप सुनना होगा। वह मुझे टोक नहीं सकता।" दुर्योधन और कर्ण ने विवश होकर यह शर्त मान ली।

शल्य का वचन

यहाँ महाभारत का वह मोड़ आता है जहाँ शल्य ने पांडवों को दिया अपना वचन निभाया। जब शल्य दुर्योधन के छल के बाद युधिष्ठिर से मिलने गए थे, तब युधिष्ठिर ने उनसे कहा था: "मामाजी, जब आप कर्ण के सारथी बनें, तो अर्जुन की रक्षा के लिए आप कर्ण का मनोबल गिराते रहिएगा।"

शल्य ने ठीक ऐसा ही किया। युद्ध के 17वें दिन, जैसे ही कर्ण रथ पर सवार हुए, शल्य ने अर्जुन और कृष्ण की तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए।

जब भी कर्ण अपनी वीरता की बात करते, शल्य तंज कसते: "कर्ण, तुम अर्जुन के सामने कुछ नहीं हो। जब अर्जुन बाण चलाएगा, तो तुम्हारा सारा घमंड हवा हो जाएगा।"

 शल्य लगातार कर्ण को उनके पुराने पराजयों  की याद दिलाकर उनका मानसिक संतुलन बिगाड़ते रहे।

कर्ण इस मानसिक प्रताड़ना से अत्यंत क्रोधित और हताश हो गए, जिससे युद्ध के दौरान उनका ध्यान बार-बार भटकता रहा।

शल्य की  भूमिका 

भले ही शल्य ने कर्ण का मनोबल गिराया, लेकिन एक सारथी के रूप में उन्होंने अपने कर्तव्य में कोई बेईमानी नहीं की। जब कर्ण का रथ एक दलदल में फंस गया, तब शल्य ने उसे निकालने का प्रयास भी किया था। कर्ण की मृत्यु के बाद, युद्ध के 18वें और अंतिम दिन, दुर्योधन ने शल्य को कौरव सेना का अंतिम प्रधान सेनापति बनाया।शल्य ने अंतिम दिन पांडव सेना पर भीषण तबाही मचाई। अंततः, युधिष्ठिर ने एक दिव्य शक्ति का प्रयोग करके राजा शल्य का वध किया।

यह भी पढ़ें:- 
Ramayan Ki Kahani: रामायण की रचना क्यों हुई? जानें रामायण की मुख्य घटनाएं, कथा और धार्मिक महत्व 
Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 
Hanuman Ji Story: कलियुग में कहां रहते हैं हनुमान जी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 
 
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 



 

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel