विज्ञापन
Home  mythology  lord jagannath ko 108 kalashon se kyon karwaya jata hai snan janiye pauranik katha

Lord Jagannath: भगवान जगन्नाथ को 108 कलशों से क्यों करवाया जाता है स्नान? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Lord Jagannath: स्कंद पुराण के पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य तथा श्रीजगन्नाथ मंदिर की प्राचीन परंपराओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ के विग्रहों का वार्षिक महाअभिषेक अत्यंत प्राचीन काल से किया जाता रहा है। 

lord jagannath
Lord Jagannath: पुरी धाम में भगवान जगन्नाथ से जुड़ी अनेक परंपराएं सदियों से श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जाती हैं। इन्हीं में सबसे प्रमुख है भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का 108 पवित्र कलशों से होने वाला दिव्य स्नान, जिसे स्नान पूर्णिमा या देव स्नान पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन भगवान को मंदिर के गर्भगृह से बाहर स्नान वेदी पर विराजमान किया जाता है और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच 108 स्वर्ण, रजत एवं ताम्र कलशों में भरे पवित्र जल से उनका महाअभिषेक किया जाता है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि इसके पीछे एक प्राचीन पौराणिक कथा और श्रीजगन्नाथ मंदिर की विशेष परंपरा जुड़ी हुई है। मान्यता है कि इस दिव्य स्नान के माध्यम से भगवान स्वयं अपने भक्तों को दर्शन देकर उन्हें पुण्य प्रदान करते हैं।

क्या है स्नान पूर्णिमा का महत्व?

ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को भगवान जगन्नाथ का वार्षिक महा स्नान उत्सव मनाया जाता है। इसे देव स्नान पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इसी दिन भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को गर्भगृह से बाहर लाकर विशेष स्नान मंडप पर विराजमान किया जाता है। श्रीमंदिर की परंपरा के अनुसार वर्ष में केवल इसी दिन भगवान का सार्वजनिक रूप से महाअभिषेक होता है। हजारों-लाखों श्रद्धालु इस दिव्य अवसर के साक्षी बनने के लिए पुरी पहुंचते हैं। स्नान के बाद भगवान को विश्राम के लिए ले जाया जाता है, जिसे 'अनसर काल' कहा जाता है। इसके बाद ही भगवान नवयौवन स्वरूप में पुनः भक्तों को दर्शन देते हैं और फिर भव्य रथयात्रा का आयोजन होता है।

108 कलशों से स्नान कराने की परंपरा कैसे शुरू हुई?

स्कंद पुराण के पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य तथा श्रीजगन्नाथ मंदिर की प्राचीन परंपराओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ के विग्रहों का वार्षिक महाअभिषेक अत्यंत प्राचीन काल से किया जाता रहा है। कहा जाता है कि जब राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ की प्रतिष्ठा करवाई, तब देवताओं, ऋषियों और ब्राह्मणों ने भगवान के अभिषेक के लिए अनेक पवित्र तीर्थों के जल का संग्रह कराया।

मान्यता है कि सभी पवित्र नदियों, सरोवरों और तीर्थों की दिव्य शक्ति को एक साथ भगवान के चरणों में अर्पित करने के लिए 108 कलशों में जल भरकर उनका अभिषेक किया गया। तभी से यह परंपरा श्रीक्षेत्र पुरी में निरंतर चली आ रही है। कहा जाता है कि यह केवल जल का स्नान नहीं, बल्कि समस्त तीर्थों द्वारा भगवान की सामूहिक पूजा का प्रतीक माना जाता है, इसलिए प्रत्येक वर्ष उसी विधि से भगवान का महा स्नान कराया जाता है।

क्यों होता है 108 कलशों से भगवान का अभिषेक?

पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु ने पुरुषोत्तम क्षेत्र में भगवान जगन्नाथ के रूप में निवास करने का संकल्प लिया, तब सभी देवता उनके दर्शन के लिए वहां पहुंचे। देवताओं ने भगवान के इस दिव्य स्वरूप का स्वागत करने हेतु स्वर्ग, पृथ्वी और समस्त पवित्र तीर्थों के जल से उनका अभिषेक करने का निश्चय किया। ब्रह्मा जी के निर्देश पर विभिन्न देवताओं ने गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी, सिंधु तथा अन्य पवित्र नदियों का जल एकत्र किया। ऋषि-मुनियों ने वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए 108 कलश तैयार किए और उन्हीं कलशों के जल से भगवान का महाअभिषेक किया गया।

कथा में कहा गया है कि उस समय सभी देवताओं ने भगवान की स्तुति करते हुए प्रार्थना की कि यह महा स्नान प्रत्येक वर्ष पृथ्वी पर भी उसी प्रकार संपन्न हो, जिससे भक्तों को भगवान के दिव्य स्वरूप का दर्शन प्राप्त हो सके। तभी से स्नान पूर्णिमा पर 108 कलशों से भगवान के अभिषेक की परंपरा स्थापित मानी जाती है।

श्रीमंदिर की परंपरा में 108 कलशों का विशेष विधान

पुरी श्रीमंदिर में भगवान के स्नान के लिए सामान्य जल का उपयोग नहीं किया जाता। मंदिर परिसर में स्थित पवित्र 'सुना कुआँ' (स्वर्ण कुआँ) से विशेष विधि द्वारा जल निकाला जाता है। पूरे वर्ष यह कुआँ ढका रहता है और केवल स्नान पूर्णिमा के अवसर पर ही इसे खोला जाता है।

मंदिर के सेवायत वैदिक मंत्रों के बीच 108 कलशों में यह पवित्र जल भरते हैं। इसके बाद चंदन, कपूर, अगर, केसर, पुष्प और सुगंधित द्रव्यों से उस जल को अभिमंत्रित किया जाता है। फिर निश्चित धार्मिक विधि के अनुसार भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, देवी सुभद्रा तथा सुदर्शन चक्र का महाअभिषेक संपन्न कराया जाता है। मान्यता है कि इस जल में सभी पवित्र तीर्थों का आध्यात्मिक स्वरूप प्रतिष्ठित किया जाता है, इसलिए यह अभिषेक अत्यंत दिव्य माना जाता है।

108 संख्या का धार्मिक रहस्य

सनातन धर्म में 108 संख्या को अत्यंत पवित्र माना गया है। यही कारण है कि भगवान के महाअभिषेक में भी 108 कलशों का ही प्रयोग किया जाता है। धार्मिक ग्रंथों में 108 उपनिषदों का उल्लेख मिलता है। जपमाला में भी 108 मनके होते हैं। अनेक यज्ञों, अनुष्ठानों और वैदिक पूजन में 108 की संख्या को पूर्णता और दिव्यता का प्रतीक माना गया है। इसी धार्मिक परंपरा के अनुरूप भगवान जगन्नाथ के स्नान में भी 108 कलशों का विधान स्थापित किया गया, जिससे अभिषेक को संपूर्ण वैदिक स्वरूप प्राप्त हो।

महास्नान के दौरान कैसे संपन्न होती है पूरी विधि?

स्नान पूर्णिमा की सुबह भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को विशेष पहंडी विजय परंपरा के अनुसार गर्भगृह से बाहर लाया जाता है। सेवायत भगवान को स्नान वेदी पर विराजमान करते हैं, जहां पहले विभिन्न पूजन, आह्वान और वैदिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। इसके बाद 108 कलशों में भरे पवित्र जल से क्रमशः भगवान का अभिषेक किया जाता है। प्रत्येक कलश के साथ वैदिक मंत्रों का उच्चारण होता है और पूरा वातावरण शंखध्वनि तथा जयघोष से गूंज उठता है। अभिषेक के पश्चात भगवान को गजवेश धारण कराया जाता है। इस विशेष श्रृंगार में भगवान हाथी के समान अलंकरण धारण करते हैं। इस स्वरूप के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।

स्नान के बाद भगवान क्यों हो जाते हैं अस्वस्थ?

श्रीजगन्नाथ परंपरा के अनुसार 108 कलशों से महाअभिषेक के बाद भगवान को ज्वर हो जाता है। मान्यता है कि अत्यधिक शीतल जल से स्नान करने के कारण भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद भगवान को 'अनसर गृह' में विश्राम कराया जाता है। इस अवधि में उन्हें सार्वजनिक दर्शन नहीं दिए जाते। सेवायत विशेष औषधीय भोग, जड़ी-बूटियों से निर्मित पेय और पारंपरिक उपचार विधियों द्वारा भगवान की सेवा करते हैं। यह अनसर काल लगभग पंद्रह दिनों तक चलता है। इसके बाद भगवान नवयौवन स्वरूप में पुनः भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसे 'नवयौवन दर्शन' कहा जाता है। इसके तुरंत बाद विश्वविख्यात रथयात्रा का आयोजन होता है।

क्या सभी कलशों का जल अलग-अलग होता है?

श्रीमंदिर की परंपरा के अनुसार 108 कलशों में भरा गया जल विशेष रूप से शुद्ध और अभिमंत्रित होता है। इसे सुना कुआँ से लाने के बाद विभिन्न सुगंधित पदार्थों और वैदिक विधियों से पवित्र बनाया जाता है। पूजन के दौरान प्रत्येक कलश को अलग-अलग मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है। अभिषेक की संपूर्ण प्रक्रिया मंदिर की परंपरा के अनुसार निर्धारित सेवायतों द्वारा संपन्न की जाती है। इस कारण प्रत्येक कलश केवल जल का पात्र नहीं माना जाता, बल्कि वह एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान का अंग होता है।


यह भी पढ़ें:- 

Ramayan Ki Kahani: रामायण की रचना क्यों हुई? जानें रामायण की मुख्य घटनाएं, कथा और धार्मिक महत्व 

Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 

Hanuman Ji Story: कलियुग में कहां रहते हैं हनुमान जी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 
 
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel