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Kanya Pujan 2025: नवरात्रि में क्यों होता है कन्या पूजन? जानें इससे जुड़ी पौराणिक कथा और महत्व

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Chaitra Navratri 2025 : साल 2025  के चैत्र नवरात्रि अब समाप्त होने वाले हैं. नवरात्रि के 9 दिनों में मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन दिनों में भक्तों का उत्साह और भक्ति एक अलग ही स्तर की होती है।

Chaitra Navratri 2025
Chaitra Navratri 2025 : साल 2025  के चैत्र नवरात्रि अब समाप्त होने वाले हैं. नवरात्रि के 9 दिनों में मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन दिनों में भक्तों का उत्साह और भक्ति एक अलग ही स्तर की होती है। नवरात्रि के ये 9 दिन सकारात्मकता को दर्शाते हैं। कहा जाता है कि इन 9 दिनों में सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है। नवरात्रि का समापन कन्या पूजन या कन्या भोग के साथ होता है। कन्या पूजन की प्रथा कई सालों से चली आ रही है। कहा जाता है कि जो भक्त नवरात्रि में कन्याओं को भोजन कराता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उसे माता रानी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। जानकारों के अनुसार इस प्रथा के पीछे पौराणिक कथाएं भी है।

नवरात्रि कन्या पूजन 2025

Kanya Pujan 2025
साल 2025 में चैत्र नवरात्रि 30 मार्च से शुरू होकर 6 अप्रैल को समाप्त होगी। यानी अष्टमी तिथि 5 अप्रैल और नवमी तिथि 6 अप्रैल को रहेगी। भारत के अलग-अलग राज्यों में कन्या पूजन की तिथि भी अलग-अलग है, कुछ भक्त अष्टमी तो कुछ नवमी को कन्या पूजन करते हैं।

कन्या पूजन कैसे करें

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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कन्या पूजन के दौरान 10 साल से अधिक उम्र की बालिकाओं को नहीं बुलाना चाहिए। बता दें कि इन कन्याओं बुलाकर पैर धोएं उसके बाद साफ साफ जगह पर बैठाएं। कन्या पूजन से पहले आपको माता रानी को भोजन कराना चाहिए। कन्या पूजन के बाद कन्याओं को हलवा, पूरी और चना खिलाना चाहिए। इसके बाद कन्याओं के हाथ धुलवाकर उन्हें आसन पर बैठाना चाहिए और उन्हें दक्षिणा देनी चाहिए।

कन्या पूजन का महत्व

नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। पूजन में 9 कन्याओं को ही बुलाने की परंपरा है, जिन्हें मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही कन्याओं के साथ एक बटुक भी होना चाहिए, जिन्हें भैरव का स्वरूप माना जाता है। जो भक्त विधि-विधान से मां की पूजा करते हैं और कुंवारी कन्याओं का पूजन करते हैं, उन्हें मां का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कन्या पूजन करने से मां की कृपा आप पर बनी रहती हैं और घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। ऐसा करने से आपका धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान भी बढ़ता है। तो आज इस खबर में कन्या पूजन से जुड़ी पौराणिक कथाओं के बारे में जानेंगे।

नवरात्रि कन्या पूजन से जुड़ी पौराणिक कथा

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पौराणिक शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा जी के कहने पर इंद्र देव ने कन्या पूजन किया था। दरअसल इंद्र देव देवी मां को प्रसन्न करना चाहते थे। इंद्रदेव अपनी इच्छा लेकर ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उनसे मां दुर्गा को प्रसन्न करने का उपाय पूछा। ब्रह्मा जी ने इंद्रदेव से कहा कि, देवी मां को प्रसन्न करने के लिए आपको कन्याओं का पूजन करना चाहिए और उन्हें भोजन कराना चाहिए। ब्रह्मा जी की सलाह के बाद इंद्रदेव ने विधि-विधान से मां की पूजा करने के बाद कुंवारी कन्याओं का पूजन किया और उन्हें भोजन कराया। इंद्रदेव की सेवा भावना को देखकर मां प्रसन्न हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। मान्यता है कि तभी से कन्या पूजन की परंपरा शुरू हुई।

कन्या पूजन से जुड़ी दूसरी पौराणिक कथा

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बहुत समय पहले जम्मू-कश्मीर के कटरा जिले के पास हंसाली गांव में श्रीधर नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह पंडित था जो मां दुर्गा का बहुत बड़ा भक्त था और अक्सर उनकी पूजा में लीन रहता था। श्रीधर की एक भी संतान नहीं थी, जिसके कारण वह बहुत दुखी रहता था। एक दिन उसने नवरात्रि का व्रत रखा और कन्या पूजन के लिए कन्याओं को आमंत्रित किया। इन्हीं कन्याओं में से एक प्यारी सी कन्या का रूप धारण कर मां वैष्णो उसके घर आईं।

मां वैष्णो ने श्रीधर को दिया था आदेश

Chaitra Navratri 2025
श्रीधर ने सभी कन्याओं का सच्चे मन से आदर किया और उन्हें भोजन कराया। भोजन करने के बाद सभी कन्याएं वहां से चली गईं लेकिन माता वैष्णो श्रीधर के साथ वहीं रुक गईं। उस छोटी सी कन्या ने श्रीधर को भोज का आयोजन करने और पूरे गांव को आमंत्रित करने का आदेश दिया। पंडित श्रीधर ने कन्या की बात मानकर ठीक वैसा ही किया। श्रीधर द्वारा आयोजित भोज में भैरवनाथ भी आए। कहा जाता है कि यहीं से भैरवनाथ का अंत शुरू हुआ। इस भंडारे के आयोजन के बाद श्रीधर को एक संतान की प्राप्ति हुई। तब से नवरात्रि में कन्या पूजन किया जाता है।

 

Chaitra Navratri 2025

पंडित श्रीधर ने कन्या की बात मानकर ठीक वैसा ही किया। श्रीधर द्वारा आयोजित भोज में भैरवनाथ भी आए। कहा जाता है कि यहीं से भैरवनाथ का अंत शुरू हुआ। इस भंडारे के आयोजन के बाद श्रीधर को एक संतान की प्राप्ति हुई। तब से नवरात्रि में कन्या पूजन किया जाता है।

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