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Yogini Ekadashi: योगिनी एकादशी व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर क्यों माना जाता है? जानें महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Yogini Ekadashi: योगिनी एकादशी के महत्व का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा था कि इस व्रत का पुण्य 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान माना गया है।

Yogini Ekadashi Vrat
Yogini Ekadashi Vrat: आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। सनातन धर्म में इस एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण सहित अनेक धार्मिक ग्रंथों में योगिनी एकादशी के व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा और व्रत करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा साधक को दुर्लभ पुण्य की प्राप्ति होती है।

योगिनी एकादशी के महत्व का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा था कि इस व्रत का पुण्य 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान माना गया है। यही कारण है कि इस एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी और फलदायी एकादशियों में गिना जाता है। आइए जानते हैं कि आखिर योगिनी एकादशी का व्रत इतना महान क्यों माना गया है और इसके पीछे कौन-सी पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।

योगिनी एकादशी का पौराणिक महत्व

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार योगिनी एकादशी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इस तिथि पर किया गया व्रत और पूजा विशेष फल प्रदान करती है। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था कि जिस प्रकार अनेक यज्ञ, दान और तपस्या करने से महान पुण्य प्राप्त होता है, उसी प्रकार श्रद्धा और नियमपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत करने वाला भी महान पुण्य का अधिकारी बनता है।

ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि इस एकादशी का प्रभाव इतना व्यापक माना गया है कि यह बड़े-बड़े पापों का भी नाश करने वाली है। इसी महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि योगिनी एकादशी का व्रत करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान होता है। यह तुलना इस व्रत की महत्ता और दुर्लभ पुण्यफल को बताने के लिए की गई है।

88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर मिलता है फल

सनातन परंपरा में ब्राह्मणों को भोजन कराना अत्यंत श्रेष्ठ दान और पुण्य कर्म माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में हजारों ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक भोजन कराने का फल अत्यंत दुर्लभ बताया गया है। योगिनी एकादशी के संदर्भ में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं युधिष्ठिर से कहते हैं कि इस एकादशी का व्रत करने वाले को वही पुण्य प्राप्त होता है, जो 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने से मिलता है।

यह संख्या केवल किसी सामान्य दान की तुलना नहीं है, बल्कि इस बात का संकेत है कि भगवान विष्णु को समर्पित यह व्रत अत्यंत प्रभावशाली और महान फल देने वाला माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जब कोई साधक पूर्ण श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए योगिनी एकादशी का पालन करता है, तब उसे अनेक प्रकार के पुण्य प्राप्त होते हैं। ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि इस व्रत के प्रभाव से पापों का क्षय होता है और साधक भगवान विष्णु की कृपा का पात्र बनता है। इसी कारण इसकी तुलना अत्यंत बड़े धार्मिक दान से की गई है।

भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई योगिनी एकादशी की महिमा

पद्म पुराण में वर्णन मिलता है कि धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उसका क्या महत्व है। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि यह योगिनी एकादशी कहलाती है और संसार में अत्यंत दुर्लभ पुण्य देने वाली तिथि है। उन्होंने बताया कि इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जो फल लंबे समय तक तपस्या, यज्ञ और बड़े-बड़े दान से प्राप्त होता है, वही फल योगिनी एकादशी के व्रत से भी प्राप्त हो सकता है। इसी प्रसंग में उन्होंने कहा कि इसका पुण्य 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर माना गया है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने इस व्रत की महिमा समझाने के लिए कुबेर के माली हेममाली की कथा सुनाई।

योगिनी एकादशी व्रत की पौराणिक कथा

प्राचीन समय में अलकापुरी नगरी में धन के देवता कुबेर का विशाल और दिव्य राज्य था। कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे और प्रतिदिन बड़ी श्रद्धा के साथ उनका पूजन करते थे। भगवान शिव की पूजा के लिए प्रतिदिन मानसरोवर से ताजे और सुगंधित पुष्प लाने का कार्य उनके सेवक हेममाली को सौंपा गया था।

हेममाली अपनी पत्नी विशालाक्षी से अत्यंत प्रेम करता था। एक दिन वह मानसरोवर से फूल लेकर लौटा, लेकिन भगवान शिव की पूजा के लिए समय पर पुष्प पहुँचाने के बजाय अपनी पत्नी के साथ विलास में मग्न हो गया। उधर पूजा का समय निकल गया और कुबेर भगवान शिव की आराधना के लिए फूलों की प्रतीक्षा करते रहे।

जब काफी देर तक पुष्प नहीं पहुंचे, तब उन्होंने सेवकों को कारण जानने के लिए भेजा। सेवकों ने लौटकर बताया कि हेममाली अपनी पत्नी के साथ मनोरंजन में व्यस्त है और उसने अपने कर्तव्य की उपेक्षा की है। यह सुनकर कुबेर अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने तुरंत हेममाली को अपने सामने बुलवाया। हेममाली भयभीत होकर उपस्थित हुआ, लेकिन उसके पास अपने अपराध का कोई उचित उत्तर नहीं था।

कुबेर ने कहा कि जिसने भगवान शिव की पूजा में बाधा उत्पन्न की है और अपने कर्तव्य की अवहेलना की है, वह दंड का भागी है। क्रोधित होकर उन्होंने हेममाली को शाप दिया कि वह पत्नी से वियोग प्राप्त करेगा और कुष्ठ रोग से पीड़ित होकर पृथ्वी पर कष्टमय जीवन बिताएगा। कुबेर के शाप का प्रभाव तत्काल हुआ। हेममाली का दिव्य स्वरूप नष्ट हो गया, उसका शरीर कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो गया और वह स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरा। पत्नी का साथ भी उससे छूट गया और वह जंगलों तथा पर्वतों में अत्यंत दुखद जीवन बिताने लगा।

हेममाली की ऋषि मार्कण्डेय से भेंट

लंबे समय तक कष्ट झेलते हुए एक दिन हेममाली की भेंट महान तपस्वी महर्षि मार्कण्डेय से हुई। ऋषि ने अपने तपोबल से उसके दुख का कारण जान लिया। उन्होंने हेममाली से पूछा कि वह इस अवस्था में क्यों भटक रहा है। तब हेममाली ने हाथ जोड़कर अपना पूरा अपराध स्वीकार किया। उसने बताया कि उसने अपने स्वामी द्वारा सौंपे गए कार्य की उपेक्षा की और भगवान शिव की पूजा के लिए समय पर पुष्प नहीं पहुंचाए, जिसके कारण उसे कुबेर का शाप मिला। हेममाली ने महर्षि से प्रार्थना की कि यदि कोई ऐसा उपाय हो जिससे वह इस शाप से मुक्त हो सके, तो कृपया उसे बताएं।

महर्षि मार्कण्डेय ने बताया योगिनी एकादशी का व्रत

हेममाली की प्रार्थना सुनकर महर्षि मार्कण्डेय ने कहा कि आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली योगिनी एकादशी अत्यंत पुण्यदायी है। यदि वह श्रद्धा और नियमपूर्वक इस एकादशी का व्रत करे तथा भगवान विष्णु की पूजा करे, तो उसके पाप नष्ट हो जाएंगे और वह शाप से मुक्त हो जाएगा। महर्षि ने उसे विधिपूर्वक व्रत करने का निर्देश दिया। हेममाली ने पूरे विश्वास और भक्ति के साथ योगिनी एकादशी का व्रत किया। उसने भगवान विष्णु का पूजन किया और पूरे नियमों का पालन किया।

व्रत के प्रभाव से हेममाली को मिली शाप से मुक्ति

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार योगिनी एकादशी के व्रत का प्रभाव तत्काल प्रकट हुआ। हेममाली का कुष्ठ रोग समाप्त हो गया और उसका दिव्य स्वरूप पुनः प्राप्त हो गया। वह कुबेर के शाप से मुक्त हो गया। इसके बाद वह पुनः अपने दिव्य लोक में लौट गया और अपनी पत्नी विशालाक्षी से उसका पुनर्मिलन हुआ। इस प्रकार योगिनी एकादशी के प्रभाव से हेममाली को न केवल रोग और शाप से मुक्ति मिली, बल्कि उसे अपना पूर्व वैभव भी वापस प्राप्त हुआ। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को यह कथा सुनाते हुए कहा कि जिस प्रकार हेममाली को इस व्रत के प्रभाव से मुक्ति मिली, उसी प्रकार श्रद्धापूर्वक योगिनी एकादशी का पालन करने वाले साधक को भी भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

पुराणों में वर्णित योगिनी एकादशी की महिमा

पद्म पुराण में योगिनी एकादशी को समस्त पापों का नाश करने वाली एकादशी कहा गया है। इसमें वर्णन मिलता है कि यह व्रत मनुष्य को महान पुण्य प्रदान करता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा का अधिकारी बनाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी इस एकादशी का महत्व स्वीकार किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाई गई इसकी महिमा के कारण यह एकादशी विशेष रूप से प्रसिद्ध मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु की आराधना के साथ किया गया यह व्रत अत्यंत दुर्लभ फल देने वाला होता है। इसी कारण सनातन परंपरा में योगिनी एकादशी को ऐसी पुण्यदायी तिथि माना गया है, जिसका व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान महान धार्मिक फल प्रदान करने वाला बताया गया है। 


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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