Vat Purnima Vrat Katha: प्राचीन समय में मद्र देश में अश्वपति नाम के एक प्रतापी और धर्मनिष्ठ राजा राज्य करते थे। उनके पास धन, वैभव और समृद्धि की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने के कारण वे अत्यंत चिंतित रहते थे।
Vat Purnima Vrat Katha: वट पूर्णिमा व्रत सनातन धर्म में सुहागिन महिलाओं के प्रमुख व्रतों में से एक माना जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना से वट (बरगद) वृक्ष की पूजा करती हैं तथा विधि-विधान से व्रत रखती हैं। धर्मग्रंथों के अनुसार इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण अंग सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा का श्रवण या पाठ है। मान्यता है कि व्रत के दौरान इस कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से व्रत पूर्ण माना जाता है। वट पूर्णिमा के अवसर पर पढ़ी जाने वाली यह कथा केवल एक धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि पुराणों में वर्णित एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी है, जिसे सदियों से व्रत के साथ जोड़ा जाता रहा है। आइए जानते हैं वट पूर्णिमा व्रत का कथा...
राजा अश्वपति को पुत्री रूप में मिली सावित्री
प्राचीन समय में मद्र देश में अश्वपति नाम के एक प्रतापी और धर्मनिष्ठ राजा राज्य करते थे। उनके पास धन, वैभव और समृद्धि की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने के कारण वे अत्यंत चिंतित रहते थे। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने वर्षों तक देवी सावित्री की कठोर आराधना की और नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप किया। लंबी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी सावित्री ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान दिया कि उनके यहां एक तेजस्विनी एवं गुणवान कन्या का जन्म होगा। समय आने पर राजा के यहां एक अत्यंत सुंदर पुत्री का जन्म हुआ। देवी के वरदान से प्राप्त होने के कारण उसका नाम सावित्री रखा गया। बचपन से ही सावित्री रूप, गुण, ज्ञान और सदाचार से संपन्न थीं। जब वह विवाह योग्य हुईं तो राजा अश्वपति ने उनके लिए योग्य वर की तलाश आरंभ की, किंतु सावित्री जैसी तेजस्विनी कन्या के लिए कोई उपयुक्त वर नहीं मिल सका।
सावित्री ने स्वयं चुना अपना वर
राजा अश्वपति ने अंततः सावित्री को स्वयं वर चुनने की अनुमति दी। सावित्री अनेक राज्यों और आश्रमों का भ्रमण करते हुए वन प्रदेश में पहुंचीं। वहां उनकी भेंट द्युमत्सेन नामक एक वृद्ध और नेत्रहीन राजा के पुत्र सत्यवान से हुई। द्युमत्सेन पहले एक समृद्ध राज्य के राजा थे, किंतु शत्रुओं ने उनका राज्य छीन लिया था। वे अपने परिवार सहित वन में रहने लगे थे। सत्यवान अपने माता-पिता की सेवा करते हुए वन में ही जीवन व्यतीत कर रहे थे। उनका स्वभाव अत्यंत विनम्र, सत्यप्रिय, पराक्रमी और धर्मनिष्ठ था। सावित्री ने सत्यवान को ही अपना पति स्वीकार कर लिया और लौटकर अपने पिता को अपने निर्णय की जानकारी दी।
नारद मुनि ने बताया सत्यवान की अल्पायु का रहस्य
उसी समय देवर्षि नारद राजा अश्वपति के दरबार में पहुंचे। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि सावित्री ने सत्यवान को पति के रूप में चुना है तो उन्होंने राजा से कहा कि सत्यवान सभी गुणों से संपन्न हैं, किंतु उनकी आयु अत्यंत कम है। नारद मुनि ने बताया कि विवाह के ठीक एक वर्ष बाद सत्यवान की मृत्यु निश्चित है। यह सुनकर राजा अश्वपति अत्यंत चिंतित हो गए। उन्होंने सावित्री को बहुत समझाया कि वह किसी अन्य योग्य राजकुमार को पति के रूप में चुन लें, किंतु सावित्री अपने निर्णय से नहीं डिगीं। उन्होंने कहा कि आर्य कन्या जीवन में केवल एक बार ही पति का वरण करती है। जिस पुरुष को उन्होंने मन, वचन और संकल्प से अपना पति स्वीकार कर लिया है, उसे बदलना संभव नहीं है। सावित्री की अटल निष्ठा देखकर राजा अश्वपति ने सत्यवान के साथ उनका विवाह संपन्न करा दिया।
वन में शुरू हुआ दांपत्य जीवन
विवाह के बाद सावित्री अपने पति सत्यवान के साथ वन में रहने लगीं। उन्होंने अपने सास-ससुर की पूरी श्रद्धा से सेवा की। वन का साधारण जीवन भी उन्होंने बिना किसी शिकायत के स्वीकार कर लिया। समय धीरे-धीरे बीतता गया। सावित्री को नारद मुनि की कही हुई बात निरंतर स्मरण रहती थी। जब सत्यवान की निर्धारित आयु पूरी होने में केवल तीन दिन शेष रह गए, तब सावित्री ने कठोर व्रत धारण कर लिया। उन्होंने तीन दिनों तक उपवास किया, भगवान का स्मरण किया और निरंतर प्रार्थना करती रहीं।
जिस दिन पूरी हुई सत्यवान की आयु
निर्धारित दिन प्रातःकाल सावित्री ने पूजा-अर्चना की, बड़ों का आशीर्वाद लिया और सत्यवान के साथ वन जाने की अनुमति मांगी। सत्यवान लकड़ियां काटने के लिए वन जा रहे थे। कुछ देर बाद सत्यवान को अचानक तेज सिरदर्द होने लगा। उन्होंने कहा कि उनका सिर बहुत भारी हो रहा है और वे अधिक देर तक खड़े नहीं रह सकते। सावित्री ने उन्हें अपनी गोद में सिर रखकर विश्राम करने को कहा। इसी समय सत्यवान के प्राण निकलने का समय आ गया।
यमराज स्वयं लेने पहुंचे सत्यवान के प्राण
कुछ ही क्षणों में वहां यमराज प्रकट हुए। उन्होंने अपने पाश से सत्यवान के सूक्ष्म शरीर को बाहर निकाला और दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े। सावित्री ने जब यह दृश्य देखा तो वे भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगीं। यमराज ने उन्हें समझाया कि अब वापस लौट जाओ। यह संसार का अटल नियम है। जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है, लेकिन सावित्री ने कहा कि जहां तक उनके पति जाएंगे, वहां तक उनका साथ देना भी उनका धर्म है।
सावित्री की धर्मयुक्त वाणी से प्रसन्न हुए यमराज
सावित्री ने मार्ग में धर्म, सत्य, करुणा और पति-पत्नी के कर्तव्य पर आधारित अनेक बातें कहीं। उनकी वाणी में विनम्रता, ज्ञान और धर्म का पालन स्पष्ट दिखाई देता था। यमराज उनकी बातों से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि सत्यवान के प्राणों के अतिरिक्त कोई भी वरदान मांग सकती हो। सावित्री ने सबसे पहले अपने अंधे ससुर द्युमत्सेन की नेत्रज्योति लौट आने का वरदान मांगा। यमराज ने यह वरदान प्रदान कर दिया।
द्युमत्सेन को मिला अपना राज्य
यमराज आगे बढ़ते रहे और सावित्री भी उनके पीछे चलती रहीं। एक बार फिर यमराज ने उन्हें लौटने के लिए कहा, लेकिन सावित्री धर्म की बातें करती हुई उनके साथ चलती रहीं। यमराज फिर प्रसन्न हुए और दूसरा वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने अपने ससुर द्युमत्सेन को उनका खोया हुआ राज्य वापस मिलने का वर मांगा। यमराज ने यह वरदान भी स्वीकार कर लिया।
राजा अश्वपति के लिए मांगा सौ पुत्रों का वर
कुछ दूरी आगे बढ़ने पर भी सावित्री नहीं रुकीं। यमराज ने तीसरा वरदान देने की बात कही। इस बार सावित्री ने अपने पिता अश्वपति के लिए सौ पराक्रमी पुत्रों का वरदान मांगा, ताकि उनका वंश आगे बढ़ सके। यमराज ने यह वरदान भी तुरंत दे दिया।
सावित्री ने मांगा अपना अंतिम वरदान
यमराज लगातार आगे बढ़ते रहे। सावित्री भी उनका अनुसरण करती रहीं। अंततः यमराज ने चौथा वरदान देने का निश्चय किया और कहा कि सत्यवान के प्राणों के अतिरिक्त कोई भी अंतिम वर मांग लो। तब सावित्री ने अत्यंत बुद्धिमानी से कहा कि उन्हें सत्यवान से उत्पन्न सौ पुत्रों की प्राप्ति हो। यमराज ने बिना विचार किए "तथास्तु" कह दिया। कुछ दूर जाने के बाद यमराज को स्मरण हुआ कि यदि सावित्री को सत्यवान से सौ पुत्र प्राप्त होने हैं, तो सत्यवान का जीवित रहना आवश्यक है। अपने ही दिए हुए वरदान को सत्य सिद्ध करने के लिए उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटा दिए।
सत्यवान पुनः जीवित हो उठे
यमराज ने सत्यवान के प्राण उनके शरीर में वापस स्थापित कर दिए और अदृश्य हो गए। उसी क्षण सत्यवान की चेतना लौट आई। उन्हें ऐसा लगा मानो वे थोड़ी देर के लिए गहरी नींद में चले गए थे। सावित्री ने उन्हें संपूर्ण घटना बताई और दोनों आश्रम लौट आए।
द्युमत्सेन की दृष्टि और राज्य दोनों लौट आए
उधर उसी समय द्युमत्सेन की आंखों की ज्योति वापस आ चुकी थी। कुछ समय बाद उनके राज्य के लोगों ने आकर उन्हें सूचना दी कि शत्रु पराजित हो चुके हैं और वे पुनः अपने राज्य के सिंहासन पर विराजमान हो सकते हैं। इस प्रकार यमराज के दिए हुए सभी वरदान पूर्ण हुए। राजा अश्वपति को भी आगे चलकर योग्य पुत्रों की प्राप्ति हुई और सावित्री तथा सत्यवान का दांपत्य जीवन सुखपूर्वक चलता रहा।
वट पूर्णिमा व्रत में इस कथा का पाठ क्यों किया जाता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार वट पूर्णिमा व्रत के दिन वट वृक्ष की पूजा के बाद सावित्री-सत्यवान की इस संपूर्ण कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ या श्रवण किया जाता है। व्रत की पूजा-विधि में इस कथा का विशेष स्थान बताया गया है। अनेक पुराणों और व्रत-परंपराओं में वर्णन मिलता है कि सावित्री ने वट वृक्ष के समीप ही अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा के लिए तप, धैर्य और धर्मयुक्त वाणी का परिचय दिया था। इसी कारण वट वृक्ष की पूजा के साथ इस कथा का पाठ वट पूर्णिमा व्रत का प्रमुख धार्मिक अंग माना जाता है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)