Krishna Pingala Sankashti Chaturthi: हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। आषाढ़ माह में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। यह दिन भगवान गणेश की पूजा-अर्चना और व्रत के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान गणपति की आराधना करने और व्रत रखने से जीवन के संकट दूर होते हैं तथा मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। हालांकि, इस व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है, जब पूजा-व्रत के दौरान कुछ विशेष नियमों का पालन किया जाए और कुछ कार्यों से बचा जाए। आइए जानते हैं कि कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी के दिन क्या करना चाहिए और किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी पर क्या करें
प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें- इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के बाद स्नान करके स्वच्छ एवं सात्विक वस्त्र पहनें। इसके बाद भगवान गणेश का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। संकल्प करते समय अपने परिवार की सुख-समृद्धि और विघ्नों के नाश की कामना करें।
भगवान गणेश की विधिपूर्वक पूजा करें- पूजा स्थान को साफ करके भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद उन्हें जल, अक्षत, रोली, दूर्वा, लाल पुष्प, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। गणेश जी को विशेष रूप से दूर्वा और मोदक अति प्रिय माने जाते हैं, इसलिए पूजा में इनका समावेश अवश्य करें।
दूर्वा अवश्य अर्पित करें- कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी की पूजा में दूर्वा का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित करने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं। दूर्वा साफ और ताजी होनी चाहिए तथा श्रद्धापूर्वक अर्पित करनी चाहिए।
गणेश मंत्रों का जप करें- पूजा के दौरान "ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करें। इसके अलावा गणेश अथर्वशीर्ष, गणेश चालीसा या संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। मंत्र जाप और स्तोत्र पाठ से पूजा का महत्व और बढ़ जाता है।
मोदक और लड्डू का भोग लगाएं- भगवान गणेश को मोदक, बेसन के लड्डू या बूंदी के लड्डू का भोग लगाना शुभ माना जाता है। भोग लगाने के बाद प्रसाद को परिवार के सदस्यों और अन्य श्रद्धालुओं में बांटें।
चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें- संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा के दर्शन के बाद ही पूर्ण माना जाता है। रात्रि में चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें जल, अक्षत और पुष्प अर्पित करें। इसके बाद भगवान गणेश की पुनः आरती करें और प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण करें।
जरूरतमंदों को दान करें- इस दिन अपनी श्रद्धा के अनुसार अन्न, वस्त्र, फल या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करना भी शुभ माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दान-पुण्य करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी पर क्या न करें
पूजा में तुलसी का प्रयोग न करें- भगवान गणेश की पूजा में तुलसी दल अर्पित नहीं किया जाता। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गणेश पूजा में तुलसी चढ़ाना वर्जित माना गया है। इसलिए इस दिन पूजा में केवल वे सामग्री ही अर्पित करें जो गणेश जी को प्रिय हैं।
तामसिक भोजन से बचें- यदि आप संकष्टी चतुर्थी का व्रत कर रहे हैं तो इस दिन मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज और अन्य तामसिक खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। सात्विक भोजन और संयम का पालन करना शुभ माना जाता है।
क्रोध और विवाद से दूर रहें- धार्मिक मान्यता के अनुसार व्रत के दिन क्रोध करना, कटु वचन बोलना या किसी से विवाद करना उचित नहीं माना जाता। पूरे दिन शांत मन और सकारात्मक भाव बनाए रखने का प्रयास करें।
किसी का अपमान न करें- इस दिन किसी गरीब, बुजुर्ग, ब्राह्मण, अतिथि या जरूरतमंद व्यक्ति का अपमान नहीं करना चाहिए। सभी के प्रति सम्मान और विनम्र व्यवहार रखने की परंपरा बताई गई है।
पूजा में बासी सामग्री का प्रयोग न करें- भगवान गणेश की पूजा में बासी फूल, दूर्वा, फल या मिठाई का उपयोग नहीं करना चाहिए। पूजा में हमेशा ताजी और स्वच्छ सामग्री का ही प्रयोग करें।
व्रत का नियम बीच में न तोड़ें- यदि आपने व्रत का संकल्प लिया है तो पूरे नियम और श्रद्धा के साथ उसका पालन करें। बिना किसी विशेष कारण के व्रत को बीच में छोड़ना उचित नहीं माना जाता।
पूजा स्थल की स्वच्छता बनाए रखें- पूजा के दौरान और उसके बाद पूजा स्थल को गंदा न छोड़ें। पूजा में प्रयुक्त सामग्री को सम्मानपूर्वक व्यवस्थित करें और धार्मिक सामग्री का अनादर न करें।
व्रत के दौरान रखें इन बातों का विशेष ध्यान
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा का समय शांत और एकाग्र मन से बिताना चाहिए। भगवान गणेश की आरती अवश्य करें और परिवार के सभी सदस्यों को प्रसाद वितरित करें। यदि संभव हो तो दिनभर भगवान गणेश के नाम का स्मरण करते रहें। व्रत रखने वाले व्यक्ति को चंद्र दर्शन से पहले अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। यदि स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या हो तो अपनी क्षमता के अनुसार व्रत का पालन करें और पूजा में श्रद्धा बनाए रखें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नियमपूर्वक किया गया व्रत और विधिपूर्वक की गई पूजा भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने का माध्यम मानी जाती है।
यह भी पढ़ें:-
Ramayan Ki Kahani: रामायण की रचना क्यों हुई? जानें रामायण की मुख्य घटनाएं, कथा और धार्मिक महत्व
Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य
Hanuman Ji Story: कलियुग में कहां रहते हैं हनुमान जी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)