Yogini Ekadashi: आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली योगिनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित प्रमुख एकादशियों में से एक मानी जाती है। हर वर्ष इस व्रत को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहता है, लेकिन वर्ष 2026 में योगिनी एकादशी की तिथि को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। कई लोग जानना चाहते हैं कि व्रत 10 जुलाई को रखा जाए या 11 जुलाई को। इसकी वजह इस बार एकादशी तिथि का सूर्योदय से पहले समाप्त होना है। ऐसे में पंचांग और धर्मशास्त्र के अनुसार जानते हैं कि योगिनी एकादशी का व्रत किस दिन रखा जाएगा, पूजा का शुभ समय क्या रहेगा और इस व्रत का धार्मिक महत्व क्या है।
योगिनी एकादशी कब है?
वैदिक पंचांग के अनुसार आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 10 जुलाई 2026 को सुबह 8 बजकर 10 मिनट पर प्रारंभ होगी। यह तिथि 11 जुलाई 2026 को सुबह 5 बजकर 23 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। यही कारण है कि इस बार एकादशी तिथि 11 जुलाई के सूर्योदय तक नहीं रहेगी। इसी वजह से लोगों के बीच व्रत की सही तिथि को लेकर संशय बना हुआ है।
10 या 11 जुलाई, किस दिन रखा जाएगा व्रत?
धर्मशास्त्रों के अनुसार सामान्य स्थिति में एकादशी व्रत उदया तिथि के आधार पर रखा जाता है, यानी जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि विद्यमान हो, उसी दिन व्रत किया जाता है, लेकिन इस वर्ष स्थिति अलग है। एकादशी तिथि 11 जुलाई के सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो रही है। इसे धर्मशास्त्रों में एकादशी क्षय की स्थिति माना जाता है। ऐसे में गृहस्थ लोगों के लिए 10 जुलाई 2026, शुक्रवार को योगिनी एकादशी का व्रत रखना श्रेष्ठ माना गया है।
वहीं, वैष्णव परंपरा का पालन करने वाले श्रद्धालु अपने संप्रदाय के नियमों के अनुसार 11 जुलाई को भी व्रत रख सकते हैं। इसलिए व्रत की तिथि का निर्णय अपनी धार्मिक परंपरा और गुरु के निर्देशानुसार करना उचित माना गया है।
योगिनी एकादशी का शुभ पूजा मुहूर्त
योगिनी एकादशी के दिन प्रातः स्नान के बाद भगवान विष्णु की पूजा करना शुभ माना जाता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लें और शुभ समय में भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी का पूजन करें। पूजा के दौरान भगवान को पीले पुष्प, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य और तुलसी दल अर्पित करें। इसके साथ ही "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप तथा विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना भी शुभ माना गया है।
योगिनी एकादशी व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक ग्रंथों में योगिनी एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु की पूजा और उपवास करने से भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। पद्म पुराण में योगिनी एकादशी का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इस व्रत के प्रभाव से अनेक प्रकार के पापों का क्षय होता है और साधक को शुभ फलों की प्राप्ति होती है। इसलिए भगवान विष्णु के भक्त इस एकादशी का पूरे नियम और श्रद्धा के साथ पालन करते हैं।
योगिनी एकादशी की पूजा विधि
- योगिनी एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ और सात्विक वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल को शुद्ध करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं, यदि संभव न हो तो गंगाजल अर्पित करें।
- इसके बाद चंदन, अक्षत, पीले पुष्प, तुलसी दल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। भगवान विष्णु की आरती करें तथा विष्णु सहस्रनाम, विष्णु चालीसा अथवा श्रीहरि के मंत्रों का जाप करें।
- दिनभर यथाशक्ति उपवास रखें। अनेक श्रद्धालु निर्जल व्रत भी रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार के साथ व्रत का पालन करते हैं। रात्रि में भगवान विष्णु के नाम का कीर्तन और भजन करना भी शुभ माना जाता है।
योगिनी एकादशी व्रत में क्या करें?
- योगिनी एकादशी पर भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करें।
- तुलसी दल अर्पित करना न भूलें, क्योंकि भगवान विष्णु की पूजा तुलसी के बिना अधूरी मानी जाती है।
- पूरे दिन सात्विक आहार-विहार का पालन करें और मन को भगवान के स्मरण में लगाएं।
- सामर्थ्य के अनुसार गरीब और जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र अथवा अन्य वस्तुओं का दान करें।
योगिनी एकादशी के दिन किन बातों का रखें ध्यान?
- एकादशी के दिन चावल का सेवन नहीं किया जाता।
- लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से परहेज करें।
- क्रोध, विवाद, असत्य भाषण और किसी का अपमान करने से बचें।
- व्रत के दौरान मन, वचन और कर्म की शुद्धता बनाए रखना धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है।
योगिनी एकादशी व्रत कथा
पद्म पुराण के अनुसार प्राचीन समय में अलकापुरी के राजा कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे। उनके उद्यान की देखभाल हेम नामक यक्ष करता था। उसका कार्य प्रतिदिन मानसरोवर से पुष्प लाकर भगवान शिव की पूजा के लिए प्रस्तुत करना था। एक दिन हेम अपनी पत्नी विशालाक्षी के साथ समय बिताने में इतना मग्न हो गया कि समय पर पुष्प नहीं पहुंचा सका। इससे भगवान शिव की पूजा में विलंब हो गया।
कुबेर को जब इसका पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर हेम को कुष्ठ रोग होने और पृथ्वी पर कष्ट भोगने का श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से हेम पृथ्वी पर भटकता रहा। एक दिन उसकी भेंट महर्षि मार्कण्डेय से हुई। ऋषि ने उसकी व्यथा सुनकर आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का व्रत करने का उपदेश दिया।
हेम ने पूरी श्रद्धा और नियम के साथ योगिनी एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से वह कुष्ठ रोग से मुक्त हो गया और उसे श्राप से भी छुटकारा मिल गया। इसके बाद वह पुनः अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त कर अलकापुरी लौट गया। इसी कारण धार्मिक ग्रंथों में योगिनी एकादशी को अत्यंत फलदायी और पापों का नाश करने वाली एकादशी माना गया है।