Yogini Ekadashi: आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित अत्यंत पुण्यदायी एकादशी मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना के साथ-साथ तुलसी और पीपल के वृक्ष की पूजा का भी विशेष विधान बताया गया है। वैष्णव परंपरा, पुराणों और लोकमान्यताओं में इन दोनों को भगवान विष्णु का प्रिय माना गया है। यही कारण है कि योगिनी एकादशी के दिन व्रती भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद तुलसी माता और पीपल देव की भी श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस दिन इन दोनों की पूजा करने से एकादशी व्रत का पुण्य और अधिक फलदायी हो जाता है। आइए जानते हैं कि योगिनी एकादशी पर पीपल और तुलसी की पूजा क्यों की जाती है और इसके पीछे धार्मिक आधार क्या है।
पीपल का भगवान विष्णु से संबंध
सनातन धर्म में पीपल के वृक्ष को अत्यंत पवित्र माना गया है। अनेक पुराणों में उल्लेख मिलता है कि भगवान विष्णु का निवास पीपल में माना जाता है। पद्म पुराण, स्कंद पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण सहित कई धार्मिक ग्रंथों में पीपल को देववृक्ष कहा गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार पीपल के मूल भाग में भगवान विष्णु, तने में केशव स्वरूप और शाखाओं में विभिन्न देवताओं का निवास माना गया है, इसलिए जब भी भगवान विष्णु का विशेष व्रत या पर्व आता है, तब पीपल की पूजा का भी विशेष महत्व बताया जाता है। योगिनी एकादशी भगवान विष्णु की आराधना का प्रमुख दिन होने के कारण इस दिन पीपल के वृक्ष की पूजा करना अत्यंत शुभ माना गया है। श्रद्धालु पीपल के वृक्ष पर जल अर्पित करते हैं, दीपक जलाते हैं और उसकी परिक्रमा करते हुए भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं।
योगिनी एकादशी पर तुलसी पूजन का विशेष महत्व
तुलसी को वैष्णव परंपरा में भगवान विष्णु की सबसे प्रिय माना गया है। कोई भी वैष्णव पूजा तुलसी दल के बिना पूर्ण नहीं मानी जाती। योगिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के पूजन में तुलसी पत्र अवश्य अर्पित किए जाते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु को यदि हजारों प्रकार के पुष्प अर्पित किए जाएं, तब भी तुलसी दल का स्थान सबसे श्रेष्ठ माना गया है। यही कारण है कि योगिनी एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा के साथ तुलसी माता की भी विशेष पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन तुलसी को जल अर्पित करने, दीपदान करने तथा उनकी परिक्रमा करने से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं और व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
तुलसी माता की पौराणिक कथा
तुलसी माता का संबंध वृंदा से माना जाता है, जिनका उल्लेख पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार वृंदा परम पतिव्रता और भगवान विष्णु की महान भक्त थीं। उनका विवाह असुरराज जलंधर से हुआ था। वृंदा के पतिव्रत के प्रभाव से जलंधर को कोई भी देवता युद्ध में पराजित नहीं कर पा रहा था। देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की। धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धारण कर वृंदा के सामने प्रकट होकर उनके पतिव्रत का प्रभाव समाप्त कर दिया। उसी समय भगवान शिव ने युद्ध में जलंधर का वध कर दिया।
जब वृंदा को इस घटना का पता चला तो उन्होंने भगवान विष्णु को शाप दिया कि वे शिला रूप में परिवर्तित हो जाएं। इसी शाप के कारण भगवान विष्णु शालिग्राम स्वरूप में प्रतिष्ठित हुए। इसके बाद वृंदा ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए। भगवान विष्णु ने वृंदा के तप और भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि वे पृथ्वी पर तुलसी के रूप में सदैव पूजित होंगी और मेरी पूजा बिना तुलसी के कभी पूर्ण नहीं मानी जाएगी। तभी से तुलसी भगवान विष्णु की सबसे प्रिय मानी जाती हैं। योगिनी एकादशी के दिन इसी कारण तुलसी माता की पूजा और भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करने की विशेष परंपरा चली आ रही है।
पीपल की पौराणिक महिमा
स्कंद पुराण में वर्णन मिलता है कि पीपल केवल एक वृक्ष नहीं बल्कि देवताओं का निवास स्थान माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसके मूल में भगवान विष्णु, मध्य भाग में भगवान शिव तथा ऊपरी भाग में ब्रह्मा का निवास माना गया है। इसी कारण इसे त्रिदेव स्वरूप भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि देवता विशेष अवसरों पर पीपल में निवास करते हैं। इसलिए भगवान विष्णु के व्रतों में पीपल की पूजा का विधान विशेष रूप से बताया गया है। योगिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के साथ पीपल की पूजा करने का उद्देश्य भगवान के इस दिव्य स्वरूप का सम्मान करना माना गया है।
तुलसी और पीपल की संयुक्त पूजा क्यों होती है?
धार्मिक परंपराओं में तुलसी भगवान विष्णु की प्रिय स्वरूपा मानी जाती हैं, जबकि पीपल को स्वयं भगवान विष्णु का निवास स्थान माना गया है। इसलिए योगिनी एकादशी जैसे विष्णु समर्पित व्रत में इन दोनों की पूजा का विशेष विधान बताया गया है। श्रद्धालु पहले भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। इसके बाद तुलसी माता को जल अर्पित कर दीप प्रज्वलित करते हैं। फिर पीपल के वृक्ष की पूजा कर उसकी परिक्रमा करते हुए भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करते हैं।
पुराणों में वर्णित धार्मिक आधार
पद्म पुराण में भगवान विष्णु ने स्वयं तुलसी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि तुलसी पत्र के बिना उनकी पूजा अधूरी रहती है। स्कंद पुराण में पीपल को विष्णु स्वरूप बताया गया है तथा उसकी पूजा को महान पुण्यदायी माना गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में वृंदा और तुलसी की कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है, जिसमें भगवान विष्णु द्वारा तुलसी को अमर पूजनीय स्थान देने का उल्लेख है। इसी धार्मिक आधार पर योगिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ तुलसी और पीपल की पूजा का विधान स्थापित हुआ।
योगिनी एकादशी की पूजा में तुलसी दल का महत्व
योगिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु का अभिषेक, पूजन और भोग अर्पित करने के बाद तुलसी दल चढ़ाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार तुलसी के बिना भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते। इस दिन श्रीहरि के चरणों में तुलसी पत्र अर्पित करते हुए विष्णु मंत्रों का जप किया जाता है। अनेक स्थानों पर तुलसी के समीप दीपदान और परिक्रमा की भी परंपरा है। वैष्णव संप्रदाय में इसे योगिनी एकादशी व्रत का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है।
पीपल की परिक्रमा का धार्मिक विधान