Krishnapingala Sankashti Chaturthi: पुराणों में वर्णित एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार एक समय असुरों का अत्याचार तीनों लोकों में अत्यधिक बढ़ गया था। अनेक राक्षस कठिन तपस्या करके ऐसे वरदान प्राप्त कर चुके थे कि देवताओं के लिए उनका सामना करना कठिन हो गया था।
Krishnapingala Sankashti Chaturthi: सनातन धर्म में भगवान गणेश के अनेक स्वरूपों और नामों का उल्लेख मिलता है। प्रत्येक नाम के पीछे कोई न कोई पौराणिक प्रसंग, दिव्य गुण या विशेष स्वरूप जुड़ा हुआ है। इन्हीं नामों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाम है 'कृष्णपिंगल'। कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी के अवसर पर भक्त विशेष रूप से इस स्वरूप की पूजा करते हैं और भगवान गणेश का स्मरण कर अपने जीवन के विघ्नों को दूर करने की कामना करते हैं। धार्मिक ग्रंथों में कृष्णपिंगल नाम केवल एक संबोधन नहीं, बल्कि भगवान गणेश के अद्भुत तेज, स्वरूप और शक्तियों का परिचायक माना गया है। आइए जानते हैं कि भगवान गणेश को कृष्णपिंगल क्यों कहा जाता है, इस नाम के पीछे कौन-सी पौराणिक कथा प्रचलित है और कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व क्या है।
कृष्णपिंगल नाम का अर्थ क्या है?
संस्कृत में 'कृष्ण' शब्द का अर्थ गहरा श्याम अथवा काला वर्ण होता है, जबकि 'पिंगल' का अर्थ ताम्रवर्ण, सुनहरा-भूरा अथवा अग्नि के समान तेजस्वी आभा वाला माना गया है। जब इन दोनों शब्दों को एक साथ रखा जाता है तो 'कृष्णपिंगल' ऐसा दिव्य स्वरूप बनता है, जिसमें गहन श्याम आभा के साथ अग्नि के समान तेज भी विद्यमान हो। धार्मिक व्याख्याओं के अनुसार भगवान गणेश का यह स्वरूप अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। उनके शरीर की आभा गहन मेघ के समान श्याम और उनके नेत्र, मुखमंडल तथा दिव्य तेज अग्नि के समान पिंगल वर्ण के बताए गए हैं। इसी कारण उन्हें कृष्णपिंगल कहा गया।
गणपति अथर्वशीर्ष में भी मिलता है उल्लेख
भगवान गणेश के इस नाम का उल्लेख प्रसिद्ध वैदिक स्तोत्र 'गणपति अथर्वशीर्ष' में मिलता है। इसमें भगवान गणेश का ध्यान करते हुए कहा गया है- "त्वं रक्तोऽसि, त्वं शुक्लोऽसि, त्वं कृष्णोऽसि, त्वं पिंगलोऽसि।" अर्थात भगवान गणेश अनेक वर्णों और स्वरूपों में विद्यमान हैं। वे रक्तवर्ण भी हैं, श्वेत भी हैं, कृष्ण भी हैं और पिंगल भी हैं। इसी आधार पर उनके कृष्ण और पिंगल स्वरूप का संयुक्त नाम 'कृष्णपिंगल' माना गया है। यह नाम उनके सर्वव्यापक और बहुरूपी दिव्य स्वरूप का प्रतीक है।
कृष्णपिंगल नाम से जुड़ी पौराणिक कथा
पुराणों में वर्णित एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार एक समय असुरों का अत्याचार तीनों लोकों में अत्यधिक बढ़ गया था। अनेक राक्षस कठिन तपस्या करके ऐसे वरदान प्राप्त कर चुके थे कि देवताओं के लिए उनका सामना करना कठिन हो गया था। यज्ञ बाधित होने लगे, ऋषि-मुनियों का तप भंग किया जाने लगा और पृथ्वी पर धर्म का संतुलन डगमगाने लगा। देवताओं ने इस संकट से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की शरण ली। देवताओं ने प्रार्थना की कि ऐसा दिव्य स्वरूप प्रकट हो जो केवल बल से ही नहीं, बल्कि बुद्धि, तेज और दिव्य शक्ति से भी अधर्म का नाश कर सके, तब माता पार्वती ने भगवान गणेश का स्मरण किया। उसी समय भगवान गणेश ने एक अद्भुत रूप धारण किया। उनका शरीर वर्षा ऋतु के काले बादलों के समान गहन श्याम दिखाई दे रहा था, जबकि उनके नेत्र, सूंड का अग्रभाग, मुखमंडल और शरीर से निकलने वाला दिव्य तेज अग्नि के समान पिंगल आभा बिखेर रहा था।
भगवान गणेश के इस अद्भुत रूप को देखकर देवता आश्चर्यचकित रह गए। उनके शरीर से निकलने वाला प्रकाश इतना प्रचंड था कि असुरों की मायाएं स्वयं नष्ट होने लगीं। भगवान गणेश ने अपने दिव्य तेज और बुद्धि से असुरों के सभी छल-कपट को समाप्त कर दिया। युद्ध के दौरान भगवान गणेश का यह स्वरूप कभी श्याम दिखाई देता तो कभी अग्नि की ज्वाला के समान प्रज्वलित हो उठता। देवताओं ने इस दिव्य रूप की स्तुति करते हुए उन्हें 'कृष्णपिंगल' नाम से संबोधित किया। इसके बाद से भगवान गणेश का यह नाम व्यापक रूप से प्रसिद्ध हो गया। धार्मिक मान्यता है कि भगवान गणेश का कृष्णपिंगल स्वरूप विशेष रूप से उन बाधाओं का नाश करता है, जो छल, भ्रम, मायाजाल अथवा अदृश्य विघ्नों के रूप में जीवन में उपस्थित होती हैं।
मुद्गल पुराण में गणेश के विविध स्वरूप
मुद्गल पुराण में भगवान गणेश के अनेक अवतारों और स्वरूपों का वर्णन मिलता है। यद्यपि वहां कृष्णपिंगल को स्वतंत्र अवतार के रूप में नहीं बताया गया है, लेकिन गणेश के तेजस्वी, उग्र और विघ्ननाशक स्वरूपों का विस्तार से उल्लेख मिलता है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार कृष्णपिंगल नाम इन्हीं तेजस्वी रूपों की विशेष उपाधि है, जो भगवान गणेश के दिव्य तेज और अद्भुत वर्ण का वर्णन करती है। यह नाम उनके उस स्वरूप का स्मरण कराता है, जिसमें वे एक साथ करुणामय भी हैं और अधर्म का संहार करने वाले भी।
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी क्यों कहलाती है?
हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। वर्ष भर आने वाली प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी का एक विशेष नाम और धार्मिक महत्व माना गया है। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली संकष्टी चतुर्थी को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन भगवान गणेश के कृष्णपिंगल स्वरूप की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि इस तिथि पर भगवान गणेश के इसी स्वरूप का स्मरण करने से विघ्नों और संकटों का नाश होता है।
कृष्णपिंगल स्वरूप की पूजा का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कृष्णपिंगल स्वरूप भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त करने का दिन माना जाता है। इस दिन प्रातः स्नान के बाद भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया जाता है। भगवान को दूर्वा, लाल अथवा पीले पुष्प, सिंदूर, अक्षत और मोदक अर्पित किए जाते हैं। गणपति अथर्वशीर्ष, गणेश स्तोत्र तथा 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का जप भी किया जाता है। संध्या के समय चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण करने की परंपरा है। कई स्थानों पर भक्त इस दिन विशेष रूप से भगवान गणेश के कृष्णपिंगल नाम का जप करते हैं और गणेश सहस्रनाम का पाठ भी करते हैं।
कृष्णपिंगल स्वरूप का धार्मिक वर्णन
धार्मिक ग्रंथों में कृष्णपिंगल स्वरूप का वर्णन अत्यंत आकर्षक रूप में मिलता है। भगवान गणेश का विशाल मस्तक ज्ञान का प्रतीक माना गया है। उनकी वक्र सूंड सभी दिशाओं में कार्य करने की क्षमता का संकेत देती है। इस स्वरूप में उनके शरीर का वर्ण गहन श्याम बताया गया है, जबकि मुखमंडल और नेत्रों की आभा पिंगल अर्थात अग्नि के समान तेजस्वी मानी जाती है। उनके चार भुजाओं में पाश, अंकुश, मोदक और अभय मुद्रा का वर्णन मिलता है। उनका वाहन मूषक सदैव उनके साथ रहता है।
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी की पूजा में अथर्वशीर्ष का महत्व