Masik Krishna Janmashtami: सनातन धर्म में प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित मानी जाती है। इस तिथि को मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। आषाढ़ मास की मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का भी विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। इस दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं, रात्रि में भजन-कीर्तन करते हैं और श्रीकृष्ण जन्म से जुड़ी पौराणिक कथा का श्रवण एवं पाठ करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत कथा का पाठ करने और भगवान श्रीकृष्ण की विधिवत आराधना करने से घर में सुख-शांति, समृद्धि और भगवान की कृपा बनी रहती है। आइए जानते हैं मासिक कृष्ण जन्माष्टमी की व्रत कथा।
मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का पौराणिक आधार
मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य अवतार से जुड़ा हुआ है। यद्यपि भाद्रपद मास की कृष्ण अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य दिवस माना जाता है, लेकिन प्रत्येक माह आने वाली कृष्ण अष्टमी पर भी भक्त उसी दिव्य जन्म लीला का स्मरण करते हैं। इस दिन भगवान के जन्म, उनके अवतार के उद्देश्य और बाल लीलाओं का वर्णन सुनना एवं सुनाना अत्यंत शुभ माना गया है।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि जब पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ गया, धर्म का पतन होने लगा और अधर्म का प्रभाव चारों ओर फैल गया, तब पृथ्वी देवी ने गौ का रूप धारण कर देवताओं के साथ भगवान विष्णु की शरण ली। सभी देवता ब्रह्माजी को साथ लेकर क्षीरसागर पहुंचे, जहां भगवान विष्णु योगनिद्रा में विराजमान थे। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि पृथ्वी दैत्यों और अत्याचारी राजाओं के भार से पीड़ित हो चुकी है। विशेष रूप से मथुरा का राजा कंस अपने अत्याचारों से समस्त प्रजा को कष्ट दे रहा है। तब भगवान विष्णु ने आश्वासन दिया कि वे स्वयं पृथ्वी पर अवतार लेकर धर्म की पुनः स्थापना करेंगे और अधर्म का नाश करेंगे।
कंस को मिला भविष्यवाणी का श्राप
मथुरा के राजा उग्रसेन का पुत्र कंस अत्यंत पराक्रमी था, लेकिन उसका स्वभाव अत्याचारी और क्रूर था। उसकी बहन देवकी का विवाह यदुवंशी राजकुमार वसुदेव के साथ संपन्न हुआ। विवाह के बाद जब कंस स्वयं अपनी बहन की विदाई कर रहा था, तभी आकाशवाणी हुई- "हे कंस, जिस देवकी को तुम बड़े प्रेम से विदा कर रहे हो, उसी के गर्भ से उत्पन्न होने वाला आठवां पुत्र तुम्हारे वध का कारण बनेगा।" यह आकाशवाणी सुनते ही कंस का हृदय क्रोध से भर उठा। उसने तत्काल अपनी तलवार निकालकर देवकी का वध करने का प्रयास किया, तब वसुदेव ने कंस को समझाया कि देवकी से नहीं, बल्कि उसके आठवें पुत्र से उसे भय है। उन्होंने वचन दिया कि देवकी की प्रत्येक संतान जन्म लेते ही वे स्वयं कंस को सौंप देंगे। वसुदेव के इस वचन पर कंस ने देवकी और वसुदेव को जीवित तो छोड़ दिया, लेकिन दोनों को कारागार में बंद कर दिया।
छह पुत्रों का वध और सातवें गर्भ का रहस्य
समय बीतता गया और देवकी की संतानें जन्म लेने लगीं। वसुदेव अपने वचन के अनुसार प्रत्येक नवजात शिशु को कंस के पास ले जाते रहे। कंस ने एक-एक करके देवकी के छह पुत्रों का निर्दयतापूर्वक वध कर दिया। जब देवकी के गर्भ में सातवीं संतान आई, तब भगवान विष्णु की योगमाया ने अपनी दिव्य शक्ति से उस गर्भ को देवकी से निकालकर वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया। यही बालक आगे चलकर बलराम के नाम से प्रसिद्ध हुए। लोगों को ऐसा प्रतीत हुआ कि देवकी का गर्भपात हो गया है। इसके बाद भगवान विष्णु ने स्वयं देवकी के आठवें गर्भ में अवतार धारण किया।
भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य प्राकट्य
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और मध्यरात्रि के समय भगवान श्रीकृष्ण ने कारागार में देवकी के गर्भ से जन्म लिया। श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णन मिलता है कि जन्म लेते ही भगवान ने अपने चतुर्भुज दिव्य स्वरूप में माता देवकी और पिता वसुदेव को दर्शन दिए। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे। उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न और कौस्तुभ मणि शोभा दे रही थी। भगवान ने माता-पिता से कहा कि वे अब उनके बाल रूप को धारण करेंगे और उन्हें तत्काल गोकुल में नंद बाबा के घर पहुंचा दिया जाए, जहां उसी समय योगमाया ने कन्या के रूप में जन्म लिया है।
वसुदेव का गोकुल जाना
भगवान की आज्ञा मिलते ही कारागार के सभी बंधन स्वयं खुल गए। पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए और कारागार के विशाल द्वार अपने आप खुल गए। वसुदेव ने बालक श्रीकृष्ण को एक टोकरी में रखा और गोकुल की ओर चल पड़े। उस समय मूसलाधार वर्षा हो रही थी। भगवान शेषनाग ने अपने विशाल फनों से बालक श्रीकृष्ण के ऊपर छत्र बनाकर उनकी रक्षा की।
जब वसुदेव यमुना नदी के तट पर पहुंचे तो यमुना उफान पर थी। जैसे ही वे जल में उतरे, यमुना का जल उनके लिए मार्ग बनाता चला गया। एक स्थान पर यमुना का जल भगवान श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श करने के लिए ऊपर उठा और उनके चरण स्पर्श करते ही शांत हो गया। गोकुल पहुंचकर वसुदेव ने नंद बाबा के घर जन्मी कन्या को उठाया और भगवान श्रीकृष्ण को वहां शैया पर सुला दिया। इसके बाद वे कन्या को लेकर पुनः कारागार लौट आए। लौटते ही कारागार के द्वार पुनः बंद हो गए और बेड़ियां पहले की तरह बंध गईं।
योगमाया का दिव्य स्वरूप
जब कंस को आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला, तो वह तुरंत कारागार पहुंचा। उसने देवकी के हाथों से नवजात कन्या को छीन लिया और उसे पत्थर पर पटकने का प्रयास किया। किन्तु वह कन्या उसके हाथों से छूटकर आकाश में चली गई और दिव्य देवी के स्वरूप में प्रकट होकर बोली- "हे कंस! तेरा काल जन्म ले चुका है। वह सुरक्षित स्थान पर पहुंच चुका है। अब तेरा अंत निश्चित है।" यह कहकर देवी अंतर्ध्यान हो गईं। इसके बाद कंस का भय और अधिक बढ़ गया। उसने पूरे राज्य में नवजात बालकों की हत्या कराने का आदेश दे दिया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण गोकुल में सुरक्षित रूप से अपनी बाल लीलाएं करने लगे।
यही कथा मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के व्रत में क्यों पढ़ी जाती है?