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Varada Chaturthi: क्यों मनाई जाती है वरदा चतुर्थी? जानें पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Varada Chaturthi Story: पुराणों और शास्त्रों के अनुसार, शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायकी चतुर्थी कहा जाता है जबकि कृष्ण पक्ष की चतुर्थी संकष्टी चतुर्थी के नाम से जानी जाती है।

Varada Chaturthi Mythological Story: 
Varada Chaturthi Mythological Story: हिंदू धर्म में प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि भगवान गणेश से विशेष रूप से जुड़ी हुई मानी जाती है। इनमें वरदा चतुर्थी का अपना विशिष्ट स्थान है। इसे वरद विनायक चतुर्थी, तिलकुंद चतुर्थी या विनायकी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि पर भगवान गणेश की पूजा-अर्चना और व्रत करने से भक्तों को वरदान प्राप्त होता है, विघ्न दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शास्त्रों में इस चतुर्थी को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ प्रदान करने वाला बताया गया है।

यह तिथि विभिन्न मासों में अलग-अलग नामों से मनाई जाती है, लेकिन इसका मूल उद्देश्य भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करना ही है। भक्त इस दिन मध्याह्न काल में विशेष पूजन करते हैं और व्रत का पालन करते हैं।

वरदा चतुर्थी का धार्मिक महत्व

पुराणों और शास्त्रों के अनुसार, शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायकी चतुर्थी कहा जाता है जबकि कृष्ण पक्ष की चतुर्थी संकष्टी चतुर्थी के नाम से जानी जाती है। वरदा चतुर्थी का अर्थ है वरदान देने वाली चतुर्थी। भगवान गणेश का एक नाम वरद भी है, जो भक्तों को भयमुक्ति और सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं।

इस तिथि पर गणेश पूजन से घर में सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य और बुद्धि की वृद्धि होती है। भगवान गणेश विघ्नहर्ता हैं, अतः उनकी आराधना से सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। माघ मास की वरद चतुर्थी को तिलकुंद चतुर्थी भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन तिल से संबंधित वस्तुओं का विशेष महत्व होता है। 

शास्त्रों में उल्लेख है कि इस दिन सच्चे मन से गणेश जी की पूजा करने से हर प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। यह तिथि मनोवांछित फल प्रदान करने वाली है। भक्त इस दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व रखते हैं। गणेश जी को मोदक, लड्डू और दूर्वा अर्पित की जाती है। प्रत्येक मास की शुक्ल चतुर्थी गणेश उपासना के लिए शुभ होती है, लेकिन वरदा चतुर्थी का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि यह भगवान गणेश द्वारा आशीर्वाद देने वाली तिथि मानी जाती है।

 

Varada Chaturthi Mythological Story: 

शिव-पार्वती और लंगड़े बालक की कथा

श्री गणेश चतुर्थी व्रत की एक प्रमुख पौराणिक कथा इस प्रकार है। एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर बैठे थे। समय व्यतीत करने के लिए माता पार्वती ने भगवान शिव से चौपड़ खेलने का प्रस्ताव रखा। भगवान शिव तैयार हो गए, लेकिन हार-जीत का फैसला कौन करेगा, यह प्रश्न उठा।

भगवान शिव ने कुछ तिनके एकत्रित करके उनका एक पुतला बनाया और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा कर दी। उन्होंने उस बालक रूपी पुतले से कहा कि तुम हम दोनों के खेल का फैसला करो कि कौन जीता और कौन हारा।

चौपड़ का खेल शुरू हुआ। तीन बार खेला गया और तीनों बार माता पार्वती जीत गईं। खेल समाप्त होने पर बालक से फैसला पूछा गया तो उसने भगवान शिव को विजयी बताया। यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गईं और उन्होंने बालक को श्राप दे दिया कि वह लंगड़ा हो जाए और कीचड़ में पड़ा रहे।

बालक ने माता से क्षमा मांगी और कहा कि यह अज्ञानतावश हुआ है, किसी द्वेष से नहीं। माता पार्वती ने कहा कि यहां नागकन्याएं गणेश पूजन के लिए आएंगी। उनके बताए अनुसार तुम गणेश व्रत करो, इससे तुम मुझे प्राप्त कर सकोगे। ऐसा कहकर माता पार्वती शिव के साथ कैलाश पर्वत चली गईं।

एक वर्ष बाद नागकन्याएं आईं। बालक ने उनसे गणेश व्रत की विधि पूछी और 21 दिनों तक लगातार गणेश जी का व्रत किया। उसकी श्रद्धा से गणेश जी प्रसन्न हुए और मनोवांछित वर मांगने को कहा। बालक ने कहा, “हे विनायक! मुझे इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के पास कैलाश पर्वत पहुंच सकूं।” गणेश जी ने वरदान दिया और बालक कैलाश पहुंच गया। वहां उसने अपनी कथा शिव जी को सुनाई।

इस घटना के कारण माता पार्वती शिव जी से रुष्ट थीं। शिव जी ने भी 21 दिनों तक गणेश व्रत किया। व्रत के प्रभाव से पार्वती जी का क्रोध शांत हो गया। फिर शिव जी ने यह व्रत विधि पार्वती जी को बताई। पार्वती जी को भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा हुई। उन्होंने 21 दिन तक गणेश जी का व्रत किया, दूर्वा, फूल और लड्डुओं से पूजन किया। इक्कीसवें दिन कार्तिकेय माता से मिले। तब से यह व्रत समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना जाता है। इससे सभी कष्ट दूर होते हैं और सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं।

 

Varada Chaturthi Mythological Story: 

दूसरी पौराणिक कथा

एक अन्य कथा अधिक मास से संबंधित है। प्राचीन काल में आंध्र प्रदेश में राजा सुषेण राज्य करते थे। वे धर्मात्मा और दानवीर थे। उनके राज्य में अचानक विषैले सर्पों का प्रकोप बढ़ गया। कई लोग सर्पदंश से मारे गए। राजा व्याकुल हो गए। नाग पंचमी व्रत और अन्य उपाय किए गए, लेकिन सर्प शांत नहीं हुए। राजा अपने गुरु ऋषि जैमिनी के पास गए।
 
ऋषि जैमिनी ने बताया कि राज्य में चतुर्थी व्रत का लोप हो गया है, इसी कारण यह विपत्ति आई है। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी वरदा है क्योंकि यह चार पुरुषार्थ प्रदान करती है। राजा ने व्रत किया और प्रजा को करवाया। वरदा चतुर्थी के प्रभाव से सर्प प्रकोप समाप्त हो गया। राज्य में सुख-समृद्धि छा गई। राजा ने गणेश जी की निरंतर आराधना की और अंत में मोक्ष प्राप्त किया। यह कथा चतुर्थी व्रत के महात्म्य को दर्शाती है।

पूजा विधि और व्रत का महत्व

वरदा चतुर्थी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि नित्य कर्म करने के बाद लाल वस्त्र धारण करें। मध्याह्न काल में शिव और गणेश की प्रतिमा स्थापित कर पूजन करें। दूर्वा, चंदन, सिंदूर, अबीर-गुलाल चढ़ाएं। ॐ गं गणपतये नमः मंत्र से 21 दूर्वा अर्पित करें।

गणेश जी को बूंदी के लड्डू, मालपुआ आदि का भोग लगाएं। आरती करें, गणेश अथर्वशीर्ष, संकटनाशक स्तोत्र का पाठ करें। ब्राह्मण को भोजन कराएं और दान दें। इस दिन तिल संबंधित वस्तुओं का उपयोग शुभ माना जाता है। व्रत रखने वाले शाम को या फलाहार से निर्वाह करते हैं। कथा श्रवण करने से विशेष फल प्राप्त होता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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