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Lord Ganesh: गणेश जी का मस्तक कटने के बाद कहां गया था? जानें पौराणिक कथा और धार्मिक मान्यताएं

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Lord Ganesh Story: शिव महापुराण, स्कंद पुराण और गणेश उपपुराण में गणेश जी की कथा विस्तार से वर्णित है। माता पार्वती ने स्नान के समय द्वारपाल बनाने के लिए उबटन से एक बालक की रचना की।

Ganesh Ji Story:
Ganesh Ji Story: श्रीगणेश भगवान की कथा हिंदू धर्म में अत्यंत प्रिय और लोकप्रिय है। हर वर्ष गणेश चतुर्थी पर उनके जन्म की कथा सुनाई और पढ़ी जाती है। माता पार्वती द्वारा स्नान के समय रक्षक के रूप में गणपति की सृष्टि, भगवान शिव द्वारा उनका मस्तक काटे जाने की घटना और फिर गजानन रूप प्रदान किए जाने की पूरी घटना भक्तों के हृदय में बसी हुई है। लेकिन एक गहरा प्रश्न सदैव उठता है कि गणेश जी का वह कटा हुआ मस्तक आखिर गया कहां? विभिन्न पुराणों में इस रहस्य से जुड़ी कथाएं मिलती हैं, जो चंद्रलोक और पृथ्वी दोनों स्थानों की ओर संकेत करती हैं।

गणेश जी के जन्म और मस्तक कटने की पौराणिक कथा

शिव महापुराण, स्कंद पुराण और गणेश उपपुराण में गणेश जी की कथा विस्तार से वर्णित है। माता पार्वती ने स्नान के समय द्वारपाल बनाने के लिए उबटन से एक बालक की रचना की। उन्होंने उसे प्राण प्रदान कर द्वार पर खड़े रहने का आदेश दिया। जब भगवान शिव कैलास पर आए तो बालक ने उन्हें अंदर जाने से रोका। क्रोध में आकर शिव जी ने अपने त्रिशूल से बालक का मस्तक काट दिया।

माता पार्वती जब यह देखा तो अत्यंत क्रोधित और शोकाकुल हो गईं। उन्होंने शिव जी से अपने पुत्र को जीवित करने की मांग की। तब शिव जी ने अपने गणों को आज्ञा दी कि वे किसी भी जीव का मस्तक काटकर लाएं जिसका मुंह उत्तर की ओर हो। गणों ने एक हाथी का मस्तक लाया और शिव जी ने उसे गणेश जी के धड़ पर जोड़ दिया। इस प्रकार गजानन रूप प्राप्त हुआ।

इस कथा में मुख्य प्रश्न यह है कि कटा हुआ मस्तक भगवान शिव के प्रचंड प्रहार से भस्म हो गया था। महादेव के त्रिशूल के आघात से वह मस्तक नष्ट हो चुका था, इसलिए उसे पुनः जोड़ना संभव नहीं रह गया। इसी कारण गज मस्तक की व्यवस्था की गई।

 

Bhagavan Ganesh Ke Avataar:

शनिदेव की कुदृष्टि से संबंधित कथा

एक अन्य प्रसिद्ध कथा शनिदेव से जुड़ी है। गणेश जी के जन्म के पश्चात सभी देवता दर्शन करने आए। शनिदेव भी आए लेकिन उन्होंने गणेश जी की ओर देखने से बचते रहे। माता पार्वती ने कारण पूछा तो शनिदेव ने कहा कि उनकी दृष्टि से किसी को हानि हो सकती है। माता के आग्रह पर जब उन्होंने देखा तो गणेश जी का मस्तक कटकर चंद्रलोक चला गया।

इस घटना के बाद माता पार्वती मूर्छित हो गईं। तब भगवान विष्णु ने एक गज का मस्तक लाकर गणेश जी को पुनर्जीवित किया। इस कथा में भी मस्तक चंद्रलोक पहुंचने का उल्लेख मिलता है।

चंद्रलोक में मस्तक की स्थिति और धार्मिक मान्यता

कई ग्रंथों के अनुसार गणेश जी का कटा हुआ मस्तक चंद्रलोक में जाकर स्थित हो गया। शिव जी द्वारा त्रिशूल प्रहार या शनिदेव की दृष्टि, दोनों ही स्थितियों में मस्तक चंद्रमा के लोक में पहुंचा। वहां यह स्थापित हो गया और चंद्रलोक की महिमा बढ़ गई।

कुछ मान्यताओं में कहा गया है कि चंद्रदेव भगवान शिव के अत्यंत प्रिय हैं और सदैव उनके आश्रय में रहते हैं, इसलिए शिव जी ने मस्तक को चंद्रलोक में ही विराजमान किया। चंद्रमा पर गणेश जी के मस्तक की उपस्थिति से चंद्रमा की शीतलता और पवित्रता भी बढ़ गई मानी जाती है। भक्त इस संबंध को गणेश-चंद्र के पावन संबंध के रूप में देखते हैं।

 

Bhagavan Ganesh Ke Avataar:

स्कंद पुराण में पृथ्वी पर मस्तक की कथा

स्कंद पुराण में एक अन्य महत्वपूर्ण कथा का उल्लेख है। इसमें गणेश जी का कटा हुआ मस्तक मृत्युलोक अर्थात पृथ्वी पर आ गिरा। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में गंगोलीहाट से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर पाताल भुवनेश्वर नामक गुफा है। यह गुफा लगभग एक सौ साठ मीटर लंबी और नब्बे मीटर गहरी है।

धार्मिक मान्यता है कि इसी गुफा के भीतर गणेश जी का वह कटा हुआ मस्तक रखा गया था। यहां एक शिला पर गणेश जी का मस्तक उकेरा गया है जिसके चारों ओर ब्रह्मकमल भी अंकित है। मान्यता है कि यह कमल स्वयं भगवान शिव ने बनाया था। उस मस्तक पर निरंतर जल की बूंदें गिरती रहती हैं, जिन्हें अमृत स्वरूप माना जाता है।

आदि शंकराचार्य जी ने इस गुफा की खोज की थी। शताब्दियों से श्रद्धालु दूर-दूर से यहां गणेश जी के मस्तक के दर्शन करने आते हैं। यह स्थल पाताल भुवनेश्वर के रूप में प्रसिद्ध है और भक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। कुछ मान्यताओं के अनुसार मानव कल्याण के लिए भगवान शिव ने स्वयं इस मस्तक को यहां स्थापित किया।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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