Lord Ganesha: भगवान गणेश को प्रथम पुज्य देवता का अधिकार प्राप्त है। गजानन, विघ्नहर्ता, एकदंत, लंबोदर– ये सभी नाम उस देवता के हैं, जिन्हें हर शुभ कार्य की शुरुआत में सबसे पहले पूजा जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि गणेश जी को 'विघ्नहर्ता' की उपाधि कैसे मिली? आखिर क्या है वो पौराणिक कथा, जो उन्हें हर बाधा को दूर करने वाला बनाती है? चलिए, इस रहस्यमयी और रोचक कहानी को जानते हैं...
गणेश जी का जन्म
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान गणेश का जन्म अपने आप में एक चमत्कार था। एक बार माता पार्वती स्नान करने की तैयारी कर रही थीं, लेकिन उन्हें द्वार पर कोई विश्वसनीय प्रहरी नहीं मिला, जो उनकी गोपनीयता की रक्षा कर सके, तब माता पार्वती ने अपनी उबटन से एक सुंदर बालक की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण फूंक दिए। इस तरह भगवान गणेश का जन्म हुआ। माता ने उन्हें आदेश दिया कि वे द्वार पर पहरा दें और किसी को भी अंदर न आने दें।
गणेश जी उस समय एक छोटे बालक थे, वे माता के आदेश को गंभीरता से लेते हुए द्वार पर खड़े हो गए, तभी वहां भगवान शिव पहुंचे, जो उस समय माता पार्वती से मिलने आए थे। गणेश जी ने उन्हें रोका और कहा- माता के आदेश के बिना कोई भी अंदर नहीं जा सकता। शिवजी उस समय गणेश के जन्म से अनजान थे, वे क्रोधित हो गए। एक भयंकर युद्ध छिड़ गया, जिसमें शिव ने अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर काट दिया।
जब माता पार्वती को यह पता चला तो वे क्रोधित और दुखी हो गईं। उन्होंने शिव से अपने पुत्र को जीवित करने की प्रार्थना की, तब शिव ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा में जाएं और जो पहला प्राणी मिले, उसका सिर लेकर आएं। गणों को एक गज का बच्चा मिला, जिसका सिर वे ले आए। शिव ने उस सिर को गणेश के धड़ से जोड़ा और उन्हें पुनर्जनन का वरदान दिया। इस तरह गणेश जी गजानन बन गए।
विघ्नहर्ता बनने की कथा
गणेश जी को विघ्नहर्ता की उपाधि मिलने की कहानी भी उतनी ही रोचक है। एक बार देवताओं और असुरों के बीच एक अनोखी प्रतियोगिता हुई। यह प्रतियोगिता थी कि कौन सबसे पहले तीनों लोकों- स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल की परिक्रमा करके वापस लौट सकता है। सभी देवता अपने-अपने वाहनों के साथ इस दौड़ में शामिल हुए। गणेश जी का वाहन मूषक चूहा था, जो गति में अन्य देवताओं के वाहनों, जैसे गरुड़ या नंदी से कहीं पीछे था।
जब दौड़ शुरू हुई, सभी देवता तेजी से तीनों लोकों की परिक्रमा के लिए निकल पड़े, लेकिन गणेश जी ने अपनी बुद्धि का परिचय दिया। उन्होंने अपने माता-पिता, शिव और पार्वती की परिक्रमा शुरू की। जब अन्य देवता थक-हारकर वापस लौटे तो देखा कि गणेश जी पहले ही वहां मौजूद थे। आश्चर्यचकित देवताओं ने पूछा- तुमने तो कहीं यात्रा की ही नहीं, फिर कैसे जीत गए?
गणेश जी ने मुस्कुराते हुए कहा- मेरे लिए मेरे माता-पिता ही तीनों लोक हैं। उनकी परिक्रमा करने से मैंने संपूर्ण विश्व की परिक्रमा कर ली। उनकी इस बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर शिव और पार्वती ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे हर शुभ कार्य की शुरुआत में पूजे जाएंगे और किसी भी कार्य में आने वाली बाधाओं को दूर करने की शक्ति उन्हें प्राप्त होगी। इस तरह गणेश जी 'विघ्नहर्ता' कहलाए।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)