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Mangala Gauri Vrat: मंगला गौरी व्रत पर करें इस कथा का पाठ? भगवान शिव और मां पार्वती की होगी विशेष कृपा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mangala Gauri Vrat Katha: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंगला गौरी व्रत के दिन स्नान और पूजा की तैयारी के बाद मां गौरी की प्रतिमा या चित्र के सामने विधिपूर्वक पूजा की जाती है। इसके बाद व्रत कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है।

Mangala Gauri Vrat Story
Mangala Gauri Vrat Story: सावन का महीना भगवान शिव और मां पार्वती की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इसी महीने आने वाला मंगला गौरी व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन मां गौरी की विधिपूर्वक पूजा करने और व्रत कथा का पाठ करने से दांपत्य जीवन सुखमय होता है, अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है और भगवान शिव के साथ मां पार्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मंगला गौरी व्रत केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि पूजा, कथा श्रवण और श्रद्धा से की गई आराधना ही इस व्रत को पूर्ण बनाती है। ऐसे में क्या आप जानते हैं कि मंगला गौरी व्रत की कथा क्या है? इस कथा का पाठ क्यों किया जाता है और इसके पीछे कौन-सी धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है? आइए जानते हैं।

मंगला गौरी व्रत का धार्मिक महत्व

मंगला गौरी व्रत सावन महीने के प्रत्येक मंगलवार को रखा जाता है। इस दिन मां पार्वती के मंगलमयी स्वरूप यानी मां गौरी की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। उनके तप, समर्पण और अटूट विश्वास के कारण ही उन्हें भगवान शिव का वरदान प्राप्त हुआ। इसी कारण मंगला गौरी व्रत को सुहाग, सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन का प्रतीक माना जाता है। विवाहित महिलाएं पति की लंबी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए यह व्रत रखती हैं, जबकि कई स्थानों पर अविवाहित कन्याएं भी योग्य जीवनसाथी की कामना से इस व्रत का पालन करती हैं।

 

Mangala Gauri Vrat Story

मंगला गौरी व्रत में कथा का पाठ क्यों किया जाता है?

किसी भी व्रत में कथा का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि केवल उपवास रखने से व्रत पूर्ण नहीं होता, बल्कि उससे जुड़ी कथा का श्रवण या पाठ करना भी आवश्यक माना जाता है। मंगला गौरी व्रत की कथा माता गौरी की कृपा, श्रद्धा, विश्वास और भक्ति का संदेश देती है। मान्यता है कि जो श्रद्धापूर्वक इस कथा का पाठ करता है या सुनता है, उसके जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और भगवान शिव तथा मां पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

मंगला गौरी व्रत कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार एक समय एक नगर में धर्मपाल नाम का एक धनी व्यापारी रहता था। उसके पास धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसके जीवन में सबसे बड़ा दुख यह था कि उसकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की इच्छा में वह और उसकी पत्नी निरंतर देवी-देवताओं की पूजा करते थे। एक दिन एक साधु उनके घर पहुंचे। व्यापारी ने उनकी सेवा की। साधु ने व्यापारी से कहा कि यदि वह मां गौरी की सच्चे मन से आराधना करेगा तो उसकी मनोकामना पूरी हो सकती है।

साधु के बताए अनुसार व्यापारी ने मां गौरी की आराधना शुरू कर दी। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां गौरी ने उसे पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पुत्र अल्पायु होगा और विवाह के कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। समय बीतने पर व्यापारी के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम शिव रखा गया। जब वह बड़ा हुआ तो उसके विवाह की तैयारी होने लगी। इसी दौरान उसका विवाह एक धर्मपरायण और पतिव्रता कन्या सुशीला से तय हुआ।

सुशीला की भक्ति ने बदल दी नियति

सुशीला बचपन से ही मां गौरी की परम भक्त थी। वह नियमित रूप से मंगला गौरी का व्रत रखती थी और पूरी श्रद्धा से उनकी पूजा करती थी। विवाह के बाद जब वह अपने पति के साथ थी, तभी नियति के अनुसार उसके पति की मृत्यु का समय आ गया। लेकिन मां गौरी अपनी भक्त की भक्ति से प्रसन्न थीं।

कथा के अनुसार, मां गौरी ने स्वप्न में सुशीला को पहले ही सावधान कर दिया था। देवी के बताए अनुसार उसने अपने पति की रक्षा के लिए आवश्यक उपाय किए। जब यमदूत उसके पति के प्राण लेने पहुंचे तो मां गौरी की कृपा और सुशीला की अटूट भक्ति के कारण वे सफल नहीं हो सके।

इस प्रकार उसके पति के प्राण बच गए और उसकी अल्पायु समाप्त होकर दीर्घायु में बदल गई। तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि मंगला गौरी व्रत और कथा का श्रद्धापूर्वक पालन करने से अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

 

Lord Shiva and Parvati

भगवान शिव और मां पार्वती की कृपा

इस कथा में भगवान शिव और मां पार्वती दोनों की कृपा का वर्णन मिलता है। माता गौरी अपनी भक्त की श्रद्धा से प्रसन्न होकर उसके पति के प्राणों की रक्षा करती हैं, जबकि भगवान शिव की कृपा से परिवार में सुख, शांति और मंगल बना रहता है। इसी कारण मंगला गौरी व्रत में शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा के दौरान मां गौरी के साथ भगवान शिव का भी ध्यान किया जाता है।

व्रत कथा का पाठ कब करना चाहिए?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंगला गौरी व्रत के दिन स्नान और पूजा की तैयारी के बाद मां गौरी की प्रतिमा या चित्र के सामने विधिपूर्वक पूजा की जाती है। इसके बाद व्रत कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है। कई स्थानों पर महिलाएं समूह में बैठकर कथा सुनती हैं और अंत में मां गौरी की आरती करती हैं। यदि किसी कारणवश स्वयं कथा पढ़ना संभव न हो तो श्रद्धा के साथ कथा सुनना भी शुभ माना जाता है। महत्वपूर्ण बात यह मानी जाती है कि कथा पूरे मन, श्रद्धा और विश्वास के साथ सुनी या पढ़ी जाए।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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