Jitiya Vrat: जितिया व्रत को जीवित्पुत्रिका और जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से रखा जाता है। इस व्रत से राजा जीमूतवाहन की पौराणिक कथा जुड़ी है, जिन्होंने एक नाग माता के पुत्र की जान बचाने के लिए अपना जीवन तक संकट में डाल दिया था। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इस व्रत का नाम जितिया कैसे पड़ा? जीमूतवाहन की कथा का इस नाम से क्या संबंध है? आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक मान्यता।
कैसे पड़ा जितिया नाम?
धार्मिक मान्यताओं में जितिया व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत कहा गया है। इसके पीछे संतान के जीवित और सुरक्षित रहने की कामना जुड़ी मानी जाती है। वहीं, इस व्रत की कथा में राजा जीमूतवाहन का विशेष स्थान है। कई धार्मिक परंपराओं में उनके त्याग को इस व्रत की कथा का प्रमुख आधार माना गया है।
कौन थे जीमूतवाहन?
पौराणिक कथा के अनुसार, जीमूतवाहन गंधर्व राजकुमार थे। वे दयालु और परोपकारी स्वभाव के थे। उन्हें राजपाट और सुख-सुविधाओं से अधिक अपने पिता की सेवा और दूसरों की मदद करना प्रिय था। उन्होंने राजकाज की जिम्मेदारी अपने भाइयों को सौंप दी और वन में जाकर पिता की सेवा करने लगे। एक दिन वन में घूमते हुए उनकी नजर एक वृद्ध महिला पर पड़ी। वह बहुत दुखी होकर रो रही थी। जीमूतवाहन ने जब उससे रोने का कारण पूछा तो महिला ने अपनी परेशानी बताई।
नाग माता के दुख का कारण
कथा के अनुसार, वह वृद्ध महिला नागवंश से संबंधित थी। उसने बताया कि नागों और पक्षीराज गरुड़ के बीच एक समझौता हुआ था। इसके अनुसार, नागों में से एक को प्रतिदिन गरुड़ के आहार के लिए भेजा जाता था। उस दिन उस वृद्ध महिला के पुत्र शंखचूड़ की बारी थी। अपने इकलौते पुत्र को गरुड़ के हाथों खोने के डर से वह मां विलाप कर रही थी। उसकी पीड़ा देखकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो गया।
बेटे की जगह खुद गए जीमूतवाहन
जीमूतवाहन ने नाग माता को भरोसा दिया कि वह उसके पुत्र को कुछ नहीं होने देंगे। उन्होंने शंखचूड़ की जगह स्वयं गरुड़ के सामने जाने का निर्णय लिया। कथा के अनुसार, जीमूतवाहन लाल वस्त्र धारण करके उस स्थान पर पहुंच गए, जहां गरुड़ नागों को अपना आहार बनाने आते थे। उन्होंने स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया, ताकि नाग माता का पुत्र बच सके। गरुड़ ने जब उन्हें देखा तो वे उन्हें अपने पंजों में लेकर उड़ गए। जीमूतवाहन ने उस समय भी अपने बारे में कुछ नहीं बताया। उनका उद्देश्य केवल शंखचूड़ की जान बचाना था।
गरुड़ ने दिया जीवनदान
जब गरुड़ को पता चला कि उनके सामने कोई नाग नहीं बल्कि जीमूतवाहन हैं और वे एक मां के पुत्र की जान बचाने के लिए स्वयं बलि देने आए हैं, तो वे उनके त्याग से प्रभावित हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया। पौराणिक मान्यता के अनुसार, गरुड़ ने इसके बाद नागों को अपना आहार न बनाने का वचन दिया। कुछ कथा परंपराओं में यह भी वर्णन मिलता है कि गरुड़ ने पहले मारे गए नागों को भी जीवन प्रदान किया। इस तरह जीमूतवाहन के त्याग से नाग माता का पुत्र भी बच गया।
जीमूतवाहन से जुड़ी है मान्यता
जीमूतवाहन की इसी त्याग और परोपकार की कथा को जीवित्पुत्रिका व्रत की प्रमुख कथा परंपराओं में शामिल किया जाता है। माना जाता है कि उनके त्याग में संतान की रक्षा और उसके जीवन के लिए किए जाने वाले व्रत की भावना दिखाई देती है। इसी वजह से जितिया व्रत में जीमूतवाहन की कथा सुनने और उनकी पूजा करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। व्रत रखने वाली महिलाएं अपनी संतान की लंबी आयु और सुरक्षा की कामना करती हैं।
जितिया और जीवित्पुत्रिका
जितिया को जीवित्पुत्रिका व्रत कहे जाने का संबंध भी संतान के जीवित रहने की कामना से जोड़ा जाता है। ‘जीवित्पुत्रिका’ नाम में ही पुत्र के जीवित और सुरक्षित रहने की भावना व्यक्त होती है। समय के साथ अलग-अलग क्षेत्रों की बोलियों में इसका प्रचलित रूप जिउतिया और जितिया हो गया।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)