Ashwin Guru Pradosh Vrat: हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना जाता है। हर महीने कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत रखा जाता है। आश्विन मास का कृष्ण पक्ष भी शिव भक्तों के लिए विशेष माना जा रहा है, क्योंकि इस बार त्रयोदशी तिथि गुरुवार को पड़ रही है। इसी वजह से इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाएगा। क्या आपको पता है आश्विन मास में गुरु प्रदोष व्रत किस दिन रखा जाएगा और इसका धार्मिक महत्व क्या है? आइए जानते हैं।
कब रखा जाएगा गुरु प्रदोष व्रत?
पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 7 अक्टूबर 2026 की रात करीब 11:17 बजे शुरू होगी और 8 अक्टूबर 2026 की रात करीब 10:16 बजे तक रहेगी। प्रदोष काल में त्रयोदशी तिथि होने के कारण व्रत 8 अक्टूबर, गुरुवार को रखा जाएगा। गुरुवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने का विधान है।
प्रदोष काल में होती है पूजा
प्रदोष व्रत में प्रदोष काल का विशेष महत्व माना गया है। सूर्यास्त के आसपास का यह समय भगवान शिव की पूजा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। भक्त इस दौरान स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान शिव का ध्यान करते हैं और विधि-विधान से पूजा करते हैं। पूजा में भगवान शिव को जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और सफेद फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके साथ ही शिवलिंग पर जल चढ़ाकर भगवान शिव के मंत्रों का जाप किया जाता है।
गुरु प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रदोष व्रत भगवान शिव को प्रसन्न करने वाला व्रत माना जाता है। त्रयोदशी तिथि पर शिव पूजा और व्रत करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। गुरुवार को पड़ने के कारण इस प्रदोष व्रत में भगवान शिव की आराधना के साथ गुरुवार से जुड़े धार्मिक नियमों का भी ध्यान रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा के साथ भगवान शिव का पूजन करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
कैसे करें भगवान शिव की पूजा?
गुरु प्रदोष व्रत के दिन सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान किया जाता है। शाम के समय प्रदोष काल में शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। शिवलिंग पर गंगाजल, दूध और जल अर्पित करने के बाद बेलपत्र, फूल और फल चढ़ाए जाते हैं। इसके बाद भगवान शिव को भोग लगाया जाता है और धूप-दीप जलाकर आरती की जाती है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार शिव मंत्र या ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप कर सकते हैं।
शिव-पार्वती की पूजा का महत्व
प्रदोष व्रत में भगवान शिव के साथ माता पार्वती की पूजा करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता में शिव और शक्ति को एक-दूसरे का पूरक माना गया है। इसलिए प्रदोष काल में शिव-पार्वती का ध्यान करके पूजा करने से पारिवारिक सुख और शांति की कामना की जाती है। गुरु प्रदोष व्रत के दिन श्रद्धालु अपनी मनोकामना के अनुसार भगवान शिव की आराधना करते हैं। कई भक्त इस दिन उपवास रखते हैं और शाम की पूजा के बाद व्रत खोलते हैं।
इस दिन क्या करें?
गुरु प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव का ध्यान करना, शिवलिंग पर जल चढ़ाना और शिव मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है। जरूरतमंद व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देना भी धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। इस दिन मन, वचन और कर्म से संयम रखने तथा भगवान शिव की भक्ति में समय बिताने की मान्यता है। पूजा के दौरान बेलपत्र अर्पित करते समय उसके तीनों पत्तों को साफ और साबुत रखने की परंपरा भी प्रचलित है।
यह भी पढ़ें-
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)