Jitiya Vrat: जितिया व्रत में भगवान जीमूतवाहन की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। संतान की लंबी आयु और उसके सुखी जीवन की कामना से माताएं यह व्रत रखती हैं। इस दिन पूजा के दौरान कई जगह मिट्टी से जीमूतवाहन की प्रतिमा बनाई जाती है। कुछ परंपराओं में कुशा से उनकी प्रतीकात्मक आकृति बनाने का भी विधान है। जीमूतवाहन की पूजा के साथ मिट्टी की प्रतिमा बनाने की परंपरा आखिर क्यों जुड़ी है? इसके पीछे कौन-सी धार्मिक मान्यता है और इसका क्या महत्व है? आइए जानते हैं...
मिट्टी से क्यों बनाते हैं जीमूतवाहन की प्रतिमा?
जितिया व्रत में मिट्टी से प्रतिमा बनाने की परंपरा का संबंध भगवान जीमूतवाहन के प्रति श्रद्धा और उनकी पूजा से है। कई क्षेत्रों में व्रत के दौरान मिट्टी से जीमूतवाहन की प्रतीकात्मक आकृति बनाई जाती है और उसे पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है। इसके बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। मिट्टी को प्रकृति से जुड़ा पवित्र तत्व माना जाता है। इससे प्रतिमा बनाकर पूजा करना श्रद्धालुओं की आस्था और पारंपरिक पूजा पद्धति का हिस्सा है।
हालांकि, हर क्षेत्र में जीमूतवाहन की प्रतिमा बनाने का तरीका एक जैसा नहीं है। कुछ जगहों पर मिट्टी के बजाय कुशा से उनकी आकृति बनाई जाती है, जबकि कई परिवारों में प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करके पूजा की जाती है, इसलिए मिट्टी की प्रतिमा बनाने की परंपरा को जितिया व्रत की एक प्रचलित क्षेत्रीय परंपरा के रूप में समझना चाहिए। इसका मुख्य उद्देश्य भगवान जीमूतवाहन का स्मरण करना और संतान की रक्षा के लिए उनसे प्रार्थना करना है।
कौन थे भगवान जीमूतवाहन?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जीमूतवाहन गंधर्व वंश के एक धर्मपरायण और परोपकारी राजकुमार थे। वह दूसरों की सहायता करने में विश्वास रखते थे। उनके जीवन से जुड़ी कथा त्याग, करुणा और दूसरों के प्राणों की रक्षा करने की भावना को दर्शाती है। कथा के अनुसार, जीमूतवाहन ने एक नाग माता के पुत्र शंखचूड़ की जान बचाने के लिए अपना जीवन संकट में डाल दिया था। उस समय नागों और पक्षीराज गरुड़ के बीच एक ऐसा समझौता था, जिसके कारण नागों को गरुड़ के सामने अपना जीवन गंवाना पड़ता था। जब जीमूतवाहन को एक मां की पीड़ा के बारे में पता चला, तो उन्होंने उसके पुत्र को बचाने का संकल्प लिया।
जीमूतवाहन ने क्यों किया था त्याग?
पौराणिक कथा के अनुसार, जीमूतवाहन वन में एक दुखी नाग माता से मिले। वह अपने पुत्र शंखचूड़ को लेकर चिंतित थी, क्योंकि उसे गरुड़ के सामने जाना था। मां की पीड़ा देखकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने नाग माता को भरोसा दिलाया कि वह उसके पुत्र की रक्षा करेंगे। इसके बाद जीमूतवाहन स्वयं गरुड़ के सामने पहुंच गए। गरुड़ ने उन्हें नाग समझकर अपने पंजों में पकड़ लिया।
जीमूतवाहन ने अपनी जान बचाने के लिए विरोध नहीं किया। जब गरुड़ को उनके वास्तविक परिचय और इस त्याग के पीछे की वजह का पता चला, तो वह उनके परोपकार से प्रभावित हुए। कथा के अनुसार, गरुड़ ने जीमूतवाहन को मुक्त कर दिया और नागों की रक्षा का वचन दिया। इस तरह जीमूतवाहन ने एक मां के पुत्र को बचाने के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया। इसी त्याग की स्मृति जितिया व्रत की धार्मिक मान्यताओं में विशेष स्थान रखती है।
प्रतिमा बनाने का क्या है धार्मिक महत्व?
जितिया व्रत में जीमूतवाहन की प्रतिमा बनाकर पूजा करने के पीछे उनकी त्याग और परोपकार की भावना का स्मरण करना प्रमुख माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जीमूतवाहन की पूजा करने से संतान पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। माताएं अपने बच्चों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना के साथ उनकी आराधना करती हैं। जीमूतवाहन की कथा में एक मां के दुख को समझने और उसकी संतान की रक्षा के लिए आगे आने का प्रसंग है। यही वजह है कि उन्हें संतान की रक्षा से जुड़ी आस्था के साथ याद किया जाता है। पूजा के दौरान उनकी प्रतीकात्मक प्रतिमा स्थापित करना इसी श्रद्धा को व्यक्त करने का एक तरीका है।
चील और सियारिन की भी बनती है प्रतिमा
जितिया व्रत की पूजा में केवल जीमूतवाहन ही नहीं, बल्कि चील और सियारिन की आकृतियां बनाने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। इन्हें सामान्यतः मिट्टी और गाय के गोबर से बनाया जाता है। इनके माथे पर सिंदूर लगाया जाता है और पूजा के दौरान व्रत कथा सुनी जाती है। चील और सियारिन से जुड़ी एक लोककथा भी जितिया व्रत के अवसर पर सुनाई जाती है। इस कथा में दोनों के व्रत रखने और उनके आचरण का वर्णन मिलता है। हालांकि, ध्यान देने वाली बात यह है कि जीमूतवाहन की प्रतिमा और चील-सियारिन की आकृतियां पूजा की अलग-अलग परंपराओं से जुड़ी हैं। कई जगह इन सभी को पूजा में शामिल किया जाता है, जबकि कुछ स्थानों पर पूजा की विधि अलग होती है।
कैसे की जाती है जीमूतवाहन की पूजा?
जितिया व्रत के दिन महिलाएं स्नान के बाद पूजा स्थल पर भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करती हैं। जिन क्षेत्रों में मिट्टी की प्रतिमा बनाने की परंपरा है, वहां इसे पूजा स्थल पर रखकर श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। कुछ जगहों पर कुशा से बनी प्रतिमा का इस्तेमाल किया जाता है। पूजा के दौरान धूप, दीप, अक्षत और फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद भगवान जीमूतवाहन का स्मरण कर संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। व्रत कथा सुनने की भी परंपरा है। पूजा की सामग्री और प्रतिमा बनाने की विधि परिवार तथा क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
जितिया व्रत में जीमूतवाहन की पूजा का महत्व
जितिया व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। इस व्रत में जीमूतवाहन की पूजा उनकी त्यागमयी कथा से जुड़ी है। जिस तरह उन्होंने एक नाग माता के पुत्र की रक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया था, उसी तरह माताएं अपनी संतान की रक्षा और लंबी आयु की प्रार्थना करती हैं। मिट्टी या कुशा से उनकी प्रतिमा बनाना इसी आस्था को पूजा का रूप देने की परंपरा है। जीमूतवाहन की कथा और उनकी पूजा जितिया व्रत के धार्मिक महत्व का प्रमुख हिस्सा मानी जाती है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)