Shiva Purana: भगवान कार्तिकेय अल्प आयु में ही अद्भुत पराक्रम और दिव्य शक्तियों से युक्त हो गए। देवताओं ने उन्हें अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया। इसी कारण उन्हें देवसेनापति भी कहा जाता है।
Shiva Purana Mythological Story: सनातन धर्म के अनेक पुराणों में भगवान शिव, माता पार्वती और देवताओं से जुड़ी ऐसी कथाएं वर्णित हैं, जिनमें गहरे धार्मिक रहस्य छिपे हुए हैं। इन्हीं कथाओं में एक कथा माता पार्वती द्वारा देवताओं को निसंतान रहने का श्राप देने की भी मिलती है। यह प्रसंग मुख्य रूप से भगवान कार्तिकेय के जन्म और तारकासुर वध की कथा से जुड़ा हुआ है। पौराणिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि एक समय ऐसा आया, जब माता पार्वती देवताओं के व्यवहार से अत्यंत क्रोधित हो गईं और उन्होंने उन्हें निसंतान रहने का श्राप दे दिया। आइए जानते हैं ये पौराणिक कथा...
देवताओं पर संकट और तारकासुर का अत्याचार
पौराणिक कथाओं के अनुसार तारकासुर नामक एक असुर ने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त कर लिया था। उसने ऐसा वर मांगा था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सके। ब्रह्माजी ने उसे यह वरदान दे दिया।
उस समय स्थिति यह थी कि माता सती के देहत्याग के बाद भगवान शिव गहन तपस्या में लीन थे और संसार से विरक्त हो चुके थे। देवताओं को विश्वास था कि भगवान शिव कभी विवाह नहीं करेंगे और न ही उनकी कोई संतान होगी। इसी कारण तारकासुर स्वयं को लगभग अमर समझने लगा।
वरदान प्राप्त करने के बाद उसने तीनों लोकों में उत्पात मचाना शुरू कर दिया। देवताओं, ऋषियों और मनुष्यों का जीवन संकट में पड़ गया। स्वर्ग लोक पर भी उसका आतंक बढ़ता चला गया। अंततः सभी देवता ब्रह्माजी और भगवान विष्णु के पास पहुंचे और इस संकट से मुक्ति का उपाय पूछा।
माता पार्वती का तप और शिव विवाह
देवताओं को ज्ञात था कि तारकासुर का अंत केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही संभव है। इसी उद्देश्य से उन्होंने हिमालय की पुत्री पार्वती को भगवान शिव की आराधना और तपस्या के लिए प्रेरित किया।
माता पार्वती ने वर्षों तक कठिन तप किया। उनकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद शिव और पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ, जिसे देवताओं ने बड़े उत्साह से देखा क्योंकि उन्हें विश्वास था कि अब शिव पुत्र का जन्म होगा और तारकासुर का अंत संभव हो सकेगा।
शिव-पार्वती के एकांत में देवताओं की चिंता
विवाह के बाद भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर एकांत जीवन व्यतीत करने लगे। पुराणों में वर्णन मिलता है कि दोनों दिव्य दंपति लंबे समय तक एकांत में रहे। इस दौरान देवताओं की चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी, क्योंकि तारकासुर का अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा था।
देवताओं को प्रतीक्षा थी कि शिव पुत्र का जन्म हो और वह तारकासुर का वध करें, लेकिन काफी समय बीतने के बाद भी कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई। इससे देवगण व्याकुल हो उठे।
देवताओं ने अग्निदेव को भेजा
जब देवताओं की चिंता अत्यधिक बढ़ गई तो उन्होंने विचार किया कि किसी प्रकार भगवान शिव से निवेदन किया जाए। किंतु भगवान शिव के एकांत में प्रवेश करने का साहस किसी में नहीं था, तब देवताओं ने अग्निदेव को यह दायित्व सौंपा। अग्निदेव एक कपोत अर्थात कबूतर का रूप धारण करके उस स्थान पर पहुंचे जहां भगवान शिव और माता पार्वती विराजमान थे।
कथा के अनुसार अग्निदेव के पहुंचने से भगवान शिव को देवताओं की चिंता और उद्देश्य का आभास हो गया। उन्होंने अपने दिव्य तेज को बाहर प्रकट किया। यह तेज इतना प्रचंड था कि उसे धारण करना किसी के लिए भी संभव नहीं था।
अग्निदेव ने उस दिव्य तेज को ग्रहण किया, लेकिन वे भी उसकी उष्णता को सहन नहीं कर सके। बाद में वह तेज गंगा को सौंपा गया और अंततः सरवन नामक वन में पहुंचा, जहां से भगवान कार्तिकेय के जन्म की प्रक्रिया पूर्ण हुई।
जब माता पार्वती को हुआ क्रोध
पौराणिक वर्णनों के अनुसार जब माता पार्वती को यह ज्ञात हुआ कि देवताओं ने उनके और भगवान शिव के एकांत में हस्तक्षेप किया है, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गईं। माता पार्वती का मानना था कि देवताओं ने अपने स्वार्थ के कारण उनके निजी जीवन में बाधा उत्पन्न की।
इस बात से भी अप्रसन्न थीं कि देवताओं ने उनके दांपत्य जीवन के प्रति सम्मान नहीं दिखाया और अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए ऐसा कदम उठाया। देवी के क्रोध का वर्णन अनेक पुराणों में मिलता है। कहा जाता है कि उनके तेज से संपूर्ण दिशाएं कांप उठीं और देवताओं में भय व्याप्त हो गया।
माता पार्वती ने दिया निसंतान रहने का श्राप
अपने क्रोध में माता पार्वती ने देवताओं को श्राप दे दिया कि वे संतान सुख से वंचित रहेंगे। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार देवताओं ने उनके मातृत्व के मार्ग में बाधा उत्पन्न की है, उसी प्रकार वे भी संतान प्राप्ति के सुख से दूर रहेंगे। इस श्राप के कारण देवगण भयभीत हो गए। उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ, लेकिन तब तक माता पार्वती का श्राप निकल चुका था।
पौराणिक कथाओं में उल्लेख मिलता है कि माता पार्वती के इस श्राप का प्रभाव देवताओं पर पड़ा और वे प्राकृतिक रूप से संतान उत्पन्न करने की क्षमता से वंचित हो गए। यही कारण बताया जाता है कि अधिकांश देवताओं की संतानों की कथाएं सामान्य जन्म प्रक्रिया से भिन्न दिव्य या विशेष परिस्थितियों में वर्णित हैं।
भगवान कार्तिकेय का दिव्य प्राकट्य
दूसरी ओर भगवान शिव का दिव्य तेज विभिन्न चरणों से गुजरते हुए सरवन वन में पहुंचा। वहां छह कृत्तिका देवियों ने उस तेज की रक्षा और पालन-पोषण किया। बाद में उस दिव्य तेज से छह मुखों वाले बालक का प्राकट्य हुआ। यही बालक आगे चलकर कार्तिकेय, स्कंद, षण्मुख और कुमारस्वामी के नाम से प्रसिद्ध हुए, क्योंकि छह कृत्तिका देवियों ने उनका पालन-पोषण किया था, इसलिए उनका नाम कार्तिकेय पड़ा। भगवान शिव और माता पार्वती ने उन्हें अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया।
कार्तिकेय ने किया तारकासुर का वध
भगवान कार्तिकेय अल्प आयु में ही अद्भुत पराक्रम और दिव्य शक्तियों से युक्त हो गए। देवताओं ने उन्हें अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया। इसी कारण उन्हें देवसेनापति भी कहा जाता है। जब समय आया तो भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर के विरुद्ध युद्ध किया। यह युद्ध अत्यंत भीषण बताया गया है। अंततः कार्तिकेय ने अपने दिव्य शस्त्र से तारकासुर का वध कर दिया और देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। इस प्रकार ब्रह्माजी का वरदान भी सत्य सिद्ध हुआ और भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही तारकासुर का अंत हुआ।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)