Shiv Purana: भगवान शिव के शरीर पर सदैव भस्म लगी रहती है। शिव पुराण और अनेक आगम ग्रंथों में भस्म को अत्यंत पवित्र माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार श्मशान की चिता से प्राप्त भस्म को भगवान शिव अपने शरीर पर धारण करते हैं।
Shiv Purana: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस दौरान भक्त शिवलिंग पर जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। भगवान शिव को भोलेनाथ, महादेव, नीलकंठ और महाकाल जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। शिव का स्वरूप जितना अद्भुत है, उतना ही रहस्यमय भी है। उनके गले में सर्प, शरीर पर भस्म, जटाओं में गंगा, मस्तक पर चंद्रमा और हाथ में त्रिशूल होता है, लेकिन इनके स्वरूप का सबसे रहस्यमय पक्ष यह है कि भगवान शिव का निवास कैलाश पर्वत होने के बावजूद उन्हें श्मशानवासी भी कहा जाता है। पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार भगवान शिव को श्मशान अत्यंत प्रिय है और वे वहां निवास करते हैं। शिव पुराण और अन्य पौराणिक ग्रंथों में इसके पीछे कई धार्मिक कारण और कथाएं मिलती हैं।
शिव को क्यों कहा जाता है श्मशानवासी?
शिव पुराण में भगवान शिव को संसार के संहारकर्ता और मृत्यु के अधिपति के रूप में वर्णित किया गया है। जब किसी जीव का शरीर पंचतत्व में विलीन होता है, तब उसका अंतिम संस्कार श्मशान में किया जाता है। यही वह स्थान है जहां शरीर का अंतिम अंत होता है और समस्त सांसारिक पहचान समाप्त हो जाती है।
इसी कारण श्मशान को भगवान शिव का प्रिय स्थान बताया गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार होता है और सभी परिजन वहां से चले जाते हैं, तब भी भगवान शिव उस स्थान पर उपस्थित रहते हैं। वे उस आत्मा की अंतिम यात्रा के साक्षी बनते हैं और अपने गणों सहित वहां निवास करते हैं।
शिव पुराण में वर्णित श्मशान निवास की कथा
शिव पुराण के अनुसार एक बार देवी पार्वती ने भगवान शिव से प्रश्न किया कि तीनों लोकों के स्वामी होने के बावजूद वे कैलाश जैसे दिव्य धाम के स्थान पर श्मशान में समय बिताना क्यों पसंद करते हैं, तब भगवान शिव ने देवी को इस रहस्य का विस्तार से वर्णन किया।
महादेव ने कहा कि संसार में जितने भी स्थान हैं, उनमें श्मशान सबसे पवित्र है, क्योंकि वहां पहुंचने के बाद मनुष्य के सभी सांसारिक संबंध समाप्त हो जाते हैं। वहां न किसी का धन साथ रहता है, न पद, न प्रतिष्ठा और न ही शरीर का अहंकार। शरीर अग्नि को समर्पित होकर पंचतत्व में विलीन हो जाता है। भगवान शिव ने पार्वती से कहा कि जब संसार का प्रत्येक प्राणी अंततः इसी स्थान पर आता है, तब उस अंतिम क्षण में वे स्वयं वहां उपस्थित रहते हैं। इसी कारण उन्होंने श्मशान को अपना निवास बनाया है।
दक्ष यज्ञ के बाद श्मशान से जुड़ी मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार श्मशान से भगवान शिव का गहरा संबंध माता सती की कथा से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। जब राजा दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया, तब उन्होंने भगवान शिव का अपमान करते हुए उन्हें आमंत्रित नहीं किया। माता सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंचीं, लेकिन वहां शिव का अपमान सहन नहीं कर सकीं। उन्होंने यज्ञ अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया।
जब भगवान शिव को यह समाचार मिला तो वे अत्यंत क्रोधित और शोकाकुल हो गए। उन्होंने माता सती के शरीर को अपने कंधों पर उठाया और पूरे ब्रह्मांड में तांडव करने लगे। बाद में भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अनेक खंड कर दिए, जिससे शिव का शोक शांत हो सका। इस घटना के बाद भगवान शिव लंबे समय तक वैराग्य में रहे। अनेक पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वे श्मशान में रहने लगे और वहीं समाधि लगाकर तप करने लगे। इसी कारण उन्हें श्मशानवासी महादेव कहा जाने लगा।
भस्म और श्मशान का संबंध
भगवान शिव के शरीर पर सदैव भस्म लगी रहती है। शिव पुराण और अनेक आगम ग्रंथों में भस्म को अत्यंत पवित्र माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार श्मशान की चिता से प्राप्त भस्म को भगवान शिव अपने शरीर पर धारण करते हैं। यह भस्म किसी साधारण राख के समान नहीं मानी जाती, बल्कि उसे अग्नि द्वारा शुद्ध किए गए पंचतत्व का स्वरूप माना गया है। महादेव का भस्म धारण करना और श्मशान में निवास करना दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए बताए गए हैं, इसलिए शिव के अनेक स्वरूपों में उन्हें भस्म से विभूषित और श्मशान में विराजमान दिखाया जाता है।
महाकाल स्वरूप और श्मशान
भगवान शिव का महाकाल स्वरूप भी श्मशान से जुड़ा हुआ माना जाता है। महाकाल का अर्थ है- काल अर्थात मृत्यु से भी परे स्थित परम सत्ता। शिव पुराण में महाकाल को समय और मृत्यु दोनों का स्वामी कहा गया है। श्मशान वह स्थान है जहां प्रत्येक जीव की सांसारिक यात्रा समाप्त होती है, इसलिए महाकाल स्वरूप में भगवान शिव का वहां निवास करना उनके इस रूप से जुड़ा हुआ माना जाता है। उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की परंपरा में भी भस्म आरती का विशेष महत्व इसी मान्यता से जुड़ा हुआ बताया जाता है।
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।