Mahabharata Story: महाभारत के मौसल पर्व तथा श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार महाभारत युद्ध समाप्त होने के कई वर्षों बाद द्वारका में अनेक अपशकुन दिखाई देने लगे।: महाभारत के मौसल पर्व तथा श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार महाभारत युद्ध समाप्त होने के कई वर्षों बाद द्वारका में अनेक अपशकुन दिखाई देने लगे।
Mahabharata Mythological Story: महाभारत और भागवत पुराण में वर्णित यदुवंश के विनाश की कथा भारतीय पौराणिक परंपरा की सबसे मार्मिक घटनाओं में से एक मानी जाती है। द्वापर युग के अंत में जिस यदुवंश ने श्रीकृष्ण के नेतृत्व में अपार वैभव, शक्ति और प्रतिष्ठा प्राप्त की थी, उसी वंश का अंत आपसी संघर्ष में हुआ। यह घटना केवल एक साधारण युद्ध नहीं थी, बल्कि एक ऐसी पौराणिक घटना थी, जिसने द्वापर युग के समापन और कलियुग के आरंभ का मार्ग प्रशस्त किया।
क्या आपको पता है कि आखिर यदुवंशियों के बीच यह भयंकर युद्ध किस स्थान पर हुआ था और किन परिस्थितियों में श्रीकृष्ण के वंश का विनाश हुआ। पौराणिक ग्रंथों में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। आइए जानते हैं इस संपूर्ण कथा के बारे में...
प्रभास क्षेत्र की यात्रा और विनाश की भूमिका
महाभारत के मौसल पर्व तथा श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार महाभारत युद्ध समाप्त होने के कई वर्षों बाद द्वारका में अनेक अपशकुन दिखाई देने लगे। नगर में अशुभ संकेत प्रकट होने लगे थे। श्रीकृष्ण समझ चुके थे कि पृथ्वी पर उनका अवतार कार्य पूर्ण हो चुका है और अब यदुवंश के अंत का समय निकट है।
इसी समय उन्होंने यदुवंशियों को तीर्थ पर जाने का निर्देश दिया, जिसके लिए वे प्रभास क्षेत्र पहुंचे। प्रभास क्षेत्र वर्तमान गुजरात के सोमनाथ क्षेत्र के आसपास माना जाता है। यह स्थान प्राचीन काल से ही अत्यंत पवित्र तीर्थ माना जाता रहा है। यदुवंशी बड़ी संख्या में प्रभास क्षेत्र पहुंचे। वहां उन्होंने स्नान, दान, यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए। प्रारंभ में सब कुछ सामान्य था, लेकिन नियति कुछ और ही लिख चुकी थी।
ऋषियों के शाप से शुरू हुई विनाश की कहानी
यदुवंश के विनाश की कथा का आरंभ एक पुराने शाप से जुड़ा हुआ है। एक बार अनेक महान ऋषि द्वारका आए, जिसके बाद यदुवंश के कुछ युवकों ने मजाक करने की इच्छा से श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को स्त्री का वेश पहनाया। उसके पेट पर वस्त्र बांधकर उसे गर्भवती महिला जैसा बना दिया गया। इसके बाद वे ऋषियों के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि यह स्त्री पुत्र को जन्म देगी या पुत्री को।
ऋषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि से सब जान लिया। वे इस अपमान से अत्यंत क्रोधित हुए और बोले कि यह कोई स्त्री नहीं है, बल्कि सांब है। इसके पेट से लोहे का एक भयंकर मूसल उत्पन्न होगा और उसी के कारण संपूर्ण यदुवंश का नाश होगा। ऋषियों का यह शाप सुनकर सभी भयभीत हो गए।
शाप के अनुसार उत्पन्न हुआ लोहे का मूसल
कुछ समय बाद सांब के पेट से वास्तव में लोहे का एक विशाल मूसल निकला। जब यह बात राजा उग्रसेन तक पहुंची तो उन्होंने आदेश दिया कि उस मूसल को चूर्ण करके समुद्र में फेंक दिया जाए। राजाज्ञा के अनुसार मूसल को पीसकर उसका चूर्ण समुद्र तट पर फेंक दिया गया। केवल एक छोटा लोहे का टुकड़ा बच गया, जिसे भी समुद्र में डाल दिया गया। समुद्र में फेंका गया चूर्ण तट पर उगने वाली एरक नामक घास में परिवर्तित हो गया। वहीं बचा हुआ लोहे का टुकड़ा एक मछली ने निगल लिया। बाद में वह टुकड़ा एक शिकारी के तीर का फल बन गया। यही वस्तुएं आगे चलकर यदुवंश के विनाश का कारण बनीं।
प्रभास क्षेत्र में कैसे शुरू हुआ यदुवंशियों का युद्ध
प्रभास क्षेत्र में यदुवंशी एकत्रित हुए थे। धार्मिक अनुष्ठानों के बाद उन्होंने भोजन और मदिरा का सेवन किया। इसी दौरान उनके बीच पुराने विवाद और कटु स्मृतियां फिर से उभरने लगीं। कहा जाता है कि सबसे पहले सात्यकि और कृतवर्मा के बीच विवाद हुआ। दोनों महाभारत युद्ध के प्रसिद्ध योद्धा थे।
सात्यकि ने कृतवर्मा पर आरोप लगाया कि उसने अश्वत्थामा के साथ मिलकर रात्रि में सोए हुए पांडव पक्ष के योद्धाओं का वध किया था। यह सुनकर कृतवर्मा भी क्रोधित हो उठा और उसने सात्यकि को अपमानजनक बातें कहीं। देखते ही देखते विवाद बढ़ गया। क्रोध में भरकर सात्यकि ने कृतवर्मा का वध कर दिया। इसके बाद कृतवर्मा के समर्थक सात्यकि पर टूट पड़े। कुछ ही क्षणों में पूरा वातावरण युद्धभूमि में बदल गया।
प्रभास क्षेत्र में भड़का भयंकर गृहयुद्ध
जब एक पक्ष ने दूसरे पर आक्रमण किया तो यदुवंश के विभिन्न कुलों और शाखाओं के योद्धा भी आपस में भिड़ गए। अंधक, वृष्णि, भोज, कुकुर और अन्य यदुवंशी वंशों के लोग दो पक्षों में बंट गए। युद्ध इतना उग्र हो गया कि किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि सामने अपना है या पराया। युद्ध के दौरान जब उनके हथियार समाप्त होने लगे तो उन्होंने समुद्र तट पर उगी एरक घास को उखाड़कर हथियार की तरह प्रयोग करना शुरू किया।
पौराणिक वर्णनों के अनुसार वह घास ऋषियों के शाप से उत्पन्न मूसल के चूर्ण से बनी थी। जैसे ही यदुवंशियों ने उसे हाथ में लिया, वह लोहे के मूसल जैसी कठोर और घातक बन गई। अब युद्ध और भी भयंकर हो गया।
यदुवंश के वीर एक-दूसरे का करने लगे संहार
यदुवंश के वीर योद्धा जो कभी बाहरी शत्रुओं के लिए अजेय माने जाते थे, अब आपस में ही एक-दूसरे का संहार करने लगे। महाभारत के मौसल पर्व में वर्णन मिलता है कि युद्ध की आग इतनी तेजी से फैली कि देखते ही देखते हजारों यदुवंशी मारे गए। भाई ने भाई को, मित्र ने मित्र को और संबंधियों ने अपने ही कुल के लोगों को मार डाला। प्रभास क्षेत्र का वह पवित्र तीर्थस्थल रक्तरंजित युद्धभूमि में परिवर्तित हो गया।
श्रीकृष्ण ने देखा यदुवंश का अंत
जब युद्ध चरम पर पहुंच गया तो श्रीकृष्ण ने स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया, लेकिन अब समय निकल चुका था। ऋषियों का शाप और काल की गति अपना कार्य कर रहे थे। कुछ ही समय में यदुवंश के अधिकांश योद्धा मारे गए और पूरा वंश लगभग समाप्त हो गया।
बलराम का प्रस्थान
युद्ध समाप्त होने के बाद श्रीबलराम समुद्र तट पर चले गए। वहां उन्होंने योगबल से अपने प्राणों का त्याग किया। भागवत पुराण में वर्णन है कि उनके शरीर से शेषनाग का दिव्य स्वरूप प्रकट हुआ और समुद्र की ओर चला गया। इस प्रकार बलराम ने पृथ्वी से अपना अवतार कार्य समाप्त किया।
श्रीकृष्ण का अंतिम समय
यदुवंश के विनाश के बाद श्रीकृष्ण एक वन में पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न होकर बैठ गए। उसी समय जरा नामक एक शिकारी वहां पहुंचा। उसने दूर से श्रीकृष्ण के चरणों को हिरण समझ लिया और तीर चला दिया। जिस तीर से श्रीकृष्ण के चरण में आघात हुआ, उसका फल उसी लोहे के टुकड़े से बना था, जो मूसल का अंतिम अंश था और जिसे समुद्र में फेंक दिया गया था। जब शिकारी को अपनी भूल का पता चला तो वह अत्यंत दुखी हुआ। श्रीकृष्ण ने उसे सांत्वना दी और बताया कि यह सब पूर्वनियोजित था। इसके बाद श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य धाम की ओर प्रस्थान किया।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)