Lord Jagannath: पुरी की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि अनेक पौराणिक परंपराओं और दिव्य कथाओं का संगम मानी जाती है। इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वह होता है जब भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ श्रीमंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। जनमानस में गुंडिचा मंदिर को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर कहा जाता है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस दिव्य यात्रा के साक्षी बनते हैं और मान्यता है कि भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आने तथा मौसी के घर कुछ दिनों तक विश्राम करने के लिए रथयात्रा करते हैं।
गुंडिचा मंदिर में भगवान का नौ दिनों तक निवास करना रथयात्रा की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में गिना जाता है। इस दौरान श्रीमंदिर की नियमित पूजा-पद्धति से अलग विशेष अनुष्ठान संपन्न होते हैं। पुराणों और ओड़िया परंपराओं में इस यात्रा के पीछे कई धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें सबसे प्रमुख कथा गुंडिचा देवी और भगवान जगन्नाथ के स्नेहपूर्ण संबंध से जुड़ी मानी जाती है।
गुंडिचा मंदिर को क्यों कहा जाता है मौसी का घर?
पुरी में स्थित गुंडिचा मंदिर को स्थानीय परंपरा में भगवान जगन्नाथ का मौसी घर कहा जाता है। शास्त्रों में गुंडिचा देवी को राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी बताया गया है, लेकिन ओड़िशा की लोकमान्यता में भगवान जगन्नाथ उन्हें अपनी मौसी के समान सम्मान देते हैं। इसी कारण श्रद्धालु भी इस मंदिर को प्रेमपूर्वक मौसी घर के नाम से पुकारते हैं। रथयात्रा के समय भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपने भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। वहां नौ दिनों तक निवास करने के बाद पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। इस वापसी यात्रा को 'बहुदा यात्रा' कहा जाता है।
राजा इंद्रद्युम्न और गुंडिचा देवी से जुड़ी पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्हें एक दिन नीलमाधव के दिव्य स्वरूप के दर्शन की इच्छा हुई। अनेक प्रयासों के बाद भगवान की प्रेरणा से उन्होंने पुरी में भव्य मंदिर निर्माण का संकल्प लिया। जब मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ तब भगवान ने दिव्य आदेश दिया कि वे दारु ब्रह्म अर्थात दिव्य काष्ठ रूप में प्रकट होंगे। समुद्र से प्राप्त पवित्र नीम की लकड़ी से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाओं का निर्माण कराया गया।
कथा के अनुसार राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी महारानी गुंडिचा देवी भी भगवान की अनन्य भक्त थीं। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि वर्ष में एक बार वे उनके निवास स्थान पर अवश्य पधारें ताकि वे स्वयं उनकी सेवा और पूजा कर सकें। भगवान ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर यह वरदान स्वीकार किया कि प्रत्येक वर्ष वे कुछ दिनों के लिए उनके भवन में निवास करेंगे। यही भवन आगे चलकर गुंडिचा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ और लोक परंपरा में इसे भगवान का मौसी घर कहा जाने लगा। इसी मान्यता के कारण आज भी रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ गुंडिचा मंदिर में नौ दिनों तक विराजमान रहते हैं।
रथयात्रा का शुभारंभ कैसे होता है?
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन रथयात्रा का शुभारंभ होता है। इससे पहले भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का विशेष श्रृंगार किया जाता है। तीनों विग्रहों को गर्भगृह से बाहर लाकर विशाल रथों पर विराजमान किया जाता है। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष, बलभद्र का रथ तालध्वज और माता सुभद्रा का रथ दर्पदलन कहलाता है। लाखों श्रद्धालु इन रथों की रस्सियां खींचकर भगवान को गुंडिचा मंदिर तक ले जाते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
गुंडिचा मंदिर पहुंचने के बाद क्या होता है?
गुंडिचा मंदिर पहुंचने पर भगवान का विशेष विधि-विधान से स्वागत किया जाता है। मंदिर में प्रवेश से पहले वैदिक मंत्रों, शंखध्वनि और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ उनका अभिनंदन होता है। इसके बाद भगवान नौ दिनों तक यहीं विराजमान रहते हैं। इस अवधि में प्रतिदिन विशेष पूजा, भोग और आरती होती है। श्रद्धालु श्रीमंदिर के बजाय गुंडिचा मंदिर में भगवान के दर्शन करते हैं। इसे भगवान के विश्राम काल के रूप में भी देखा जाता है। इन नौ दिनों में भगवान की सेवा का स्वरूप भी कुछ अलग होता है। यहां स्थानीय परंपराओं के अनुसार विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं।
मौसी घर में भगवान को कौन-सा विशेष भोग लगाया जाता है?
गुंडिचा मंदिर प्रवास के दौरान भगवान को अनेक प्रकार के पारंपरिक व्यंजन अर्पित किए जाते हैं। ओड़िशा की प्राचीन परंपरा के अनुसार यहां भगवान को स्थानीय व्यंजनों का विशेष भोग लगाया जाता है। रथयात्रा के दौरान एक विशेष परंपरा 'पोडा पीठा' से भी जुड़ी हुई है। यह ओड़िशा का प्रसिद्ध पारंपरिक पकवान है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ को यह व्यंजन अत्यंत प्रिय है। इसलिए गुंडिचा प्रवास के समय विशेष अवसरों पर उन्हें पोडा पीठा का भोग भी अर्पित किया जाता है।
गुंडिचा मंदिर का धार्मिक महत्व
गुंडिचा मंदिर केवल रथयात्रा का पड़ाव नहीं है, बल्कि इसका अपना विशेष धार्मिक महत्व भी है। पूरे वर्ष मंदिर अपेक्षाकृत शांत रहता है, लेकिन रथयात्रा के नौ दिनों में यही स्थान भगवान जगन्नाथ का मुख्य निवास बन जाता है। मंदिर का वातावरण इन दिनों वैदिक मंत्रोच्चार, भजन-कीर्तन और विशेष पूजन से भक्तिमय हो उठता है। देश-विदेश से आए श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं।
हेरा पंचमी की रोचक परंपरा
भगवान जगन्नाथ के गुंडिचा मंदिर में रहने के दौरान एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा हेरा पंचमी भी मनाई जाती है। लोकमान्यता के अनुसार जब भगवान जगन्नाथ कई दिनों तक श्रीमंदिर नहीं लौटते, तब माता लक्ष्मी उन्हें देखने के लिए गुंडिचा मंदिर तक आती हैं। वहां भगवान के दर्शन करने के बाद वे पुनः श्रीमंदिर लौट जाती हैं। इस पूरे आयोजन का मंदिर परंपरा में विशेष महत्व है और इसे अत्यंत विधिपूर्वक संपन्न किया जाता है।
बहुदा यात्रा से होती है वापसी