Lord Jagannath: जगन्नाथ मंदिर में जब श्रद्धालु भगवान के दर्शन करते हैं तो सबसे पहले उनकी नजर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा की अनोखी मूर्तियों पर जाती है। ये मूर्तियां पत्थर, धातु या संगमरमर की नहीं, बल्कि लकड़ी की बनी होती हैं। यही कारण है कि सदियों से लोगों के मन में यह प्रश्न उठता रहा है कि आखिर भगवान जगन्नाथ लकड़ी की मूर्ति में ही क्यों विराजते हैं। इस प्रश्न का उत्तर एक ऐसी पौराणिक कथा में मिलता है, जो भगवान श्रीकृष्ण के अंतिम समय, राजा इंद्रद्युम्न की भक्ति और स्वयं भगवान की इच्छा से जुड़ी हुई है।
पुरी की इस परंपरा को केवल एक धार्मिक विधान नहीं माना जाता, बल्कि इसे भगवान के दिव्य स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ ने स्वयं लकड़ी के रूप में प्रकट होकर अपने भक्तों को दर्शन देने का निर्णय लिया था।
राजा इंद्रद्युम्न को मिला दिव्य संकेत
पौराणिक कथा के अनुसार मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक दिन उन्होंने एक अद्भुत देवता “नीलमाधव” के बारे में सुना, जिनकी पूजा वन क्षेत्र में गुप्त रूप से की जाती थी। राजा ने अपने दूतों को नीलमाधव की खोज के लिए भेजा। काफी खोजबीन के बाद विद्यापति नामक ब्राह्मण को नीलमाधव के दर्शन हुए। जब राजा स्वयं वहां पहुंचे तो नीलमाधव अदृश्य हो चुके थे। राजा अत्यंत दुखी हुए और कठोर तपस्या करने लगे। तब उन्हें स्वप्न में भगवान विष्णु ने दर्शन देकर कहा कि वे समुद्र तट पर आने वाली दिव्य लकड़ी से उनकी मूर्ति बनवाएं।
समुद्र से निकला दिव्य दारु
कथा में वर्णन मिलता है कि कुछ समय बाद पुरी के समुद्र तट पर एक विशाल लकड़ी का लट्ठा बहकर आया। उस लकड़ी से अद्भुत सुगंध निकल रही थी और उसे कोई साधारण व्यक्ति हिला नहीं पा रहा था। राजा इंद्रद्युम्न ने वैदिक मंत्रों के साथ पूजा की। तब वह लकड़ी सहज ही उठ गई। इसे “दिव्य दारु” कहा गया और माना गया कि यही भगवान का स्वयं प्रकट हुआ स्वरूप है। राजा ने निश्चय किया कि इसी लकड़ी से भगवान की मूर्तियां बनाई जाएंगी।
रहस्यमय वृद्ध शिल्पकार
जब मूर्ति निर्माण का प्रश्न आया तो एक वृद्ध बढ़ई राजा के सामने उपस्थित हुआ। उसने कहा कि वह मूर्तियां बनाएगा, लेकिन एक शर्त होगी, जब तक निर्माण कार्य पूरा न हो जाए, कोई भी कक्ष का द्वार नहीं खोलेगा। राजा ने शर्त स्वीकार कर ली। वृद्ध शिल्पकार भीतर चला गया और कई दिनों तक भीतर से केवल औजारों की आवाज आती रही। कुछ समय बाद अचानक आवाज आनी बंद हो गई। रानी गुंडिचा को चिंता हुई कि कहीं वृद्ध को कुछ हो न गया हो। उनकी आग्रह पर राजा ने द्वार खुलवा दिया।
अधूरी मूर्तियों में ही प्रकट हुए भगवान
जैसे ही द्वार खोला गया, भीतर कोई शिल्पकार नहीं था। वहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां विराजमान थीं, लेकिन उनके हाथ-पैर पूर्ण रूप से बने नहीं थे। राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ और वे दुखी हो गए। तभी आकाशवाणी हुई कि यह सब भगवान की इच्छा से हुआ है। वे इसी रूप में पूजे जाना चाहते हैं, तब से जगन्नाथ जी की मूर्तियां उसी विशेष स्वरूप में स्थापित हैं और यही स्वरूप आज पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।
श्रीकृष्ण के शरीर से जुड़ी मान्यता
एक अन्य पौराणिक मान्यता महाभारत के बाद की घटनाओं से जुड़ी है। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने देह त्याग की, तब उनका शरीर अग्नि को समर्पित किया गया। किंतु उनका हृदय पूर्ण रूप से अग्नि में नहीं जला। दैवीय आदेश के अनुसार उस दिव्य अवशेष को समुद्र में प्रवाहित कर दिया गया। बाद में वही समुद्र तट पर लकड़ी के रूप में प्रकट हुआ और उससे भगवान जगन्नाथ की मूर्ति बनाई गई। इसी कारण जगन्नाथ जी को श्रीकृष्ण का साकार रूप माना जाता है।
लकड़ी की मूर्ति बदलने की अनोखी परंपरा
जगन्नाथ मंदिर की सबसे अद्भुत परंपराओं में से एक है “नवकलेवर”। लगभग 12 से 19 वर्ष के अंतराल पर, जब विशेष ज्योतिषीय योग बनते हैं, तब भगवान की पुरानी लकड़ी की मूर्तियों को बदलकर नई मूर्तियां बनाई जाती हैं। इसके लिए विशेष नीम के वृक्षों की खोज की जाती है, जिन्हें “दारु ब्रह्म” कहा जाता है। इन वृक्षों में कई दिव्य लक्षण देखे जाते हैं, जैसे शंख, चक्र, गदा या पद्म के चिह्न। नई मूर्तियां बनने के बाद एक अत्यंत गोपनीय अनुष्ठान में पुराने विग्रह से दिव्य तत्व को नए विग्रह में स्थानांतरित किया जाता है।
मूर्ति का यह रूप क्यों माना जाता है विशेष?