Mahabharata Story: कर्ण की मृत्यु के बाद भी कौरवों को अंतिम दिन युद्ध लड़ना था और इसके लिए एक नए सेनापति की आवश्यकता थी। ऐसे में आइए जानते हैं कि कर्ण की मृत्यु के बाद दुर्योधन ने अपनी सेना का सेनापति किसे नियुक्त किया था।
Mahabharata Mythological Story: महाभारत के युद्ध में कर्ण का स्थान कौरव पक्ष के सबसे महान योद्धाओं में माना जाता है। भीष्म और द्रोणाचार्य के बाद कौरव सेना की सबसे बड़ी आशा कर्ण ही था। युद्ध के सत्रहवें दिन जब अर्जुन के हाथों कर्ण का वध हुआ, तब कौरव पक्ष की शक्ति लगभग टूट चुकी थी। दुर्योधन अपने सबसे विश्वसनीय मित्र और महान योद्धा को खो चुका था, लेकिन युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ था। कर्ण की मृत्यु के बाद भी कौरवों को अंतिम दिन युद्ध लड़ना था और इसके लिए एक नए सेनापति की आवश्यकता थी। ऐसे में आइए जानते हैं कि कर्ण की मृत्यु के बाद दुर्योधन ने अपनी सेना का सेनापति किसे नियुक्त किया था।
कर्ण की मृत्यु से कौरव शिविर में छाया शोक
महाभारत युद्ध के सत्रहवें दिन कर्ण और अर्जुन के बीच भीषण युद्ध हुआ। दोनों महायोद्धाओं के बीच लंबे समय तक चले संघर्ष ने पूरे रणक्षेत्र को स्तब्ध कर दिया। अंततः जब कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया और वह उसे निकालने का प्रयास करने लगा, तब श्रीकृष्ण के संकेत पर अर्जुन ने अपने दिव्य अस्त्र से कर्ण का वध कर दिया।
कर्ण की मृत्यु का समाचार जैसे ही कौरव शिविर पहुंचा, वहां शोक की लहर दौड़ गई। दुर्योधन के लिए यह आघात अत्यंत बड़ा था क्योंकि कर्ण केवल उसका सेनापति ही नहीं, बल्कि उसका सबसे प्रिय मित्र भी था। कौरव पक्ष के अनेक महारथी पहले ही युद्धभूमि में मारे जा चुके थे। भीष्म, द्रोणाचार्य, जयद्रथ, दुःशासन और अब कर्ण के निधन ने कौरव सेना को लगभग नेतृत्वविहीन कर दिया था।
कौरव सेना को नए सेनापति की आवश्यकता
कर्ण की मृत्यु के बाद कौरव सेना के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि अब सेना का नेतृत्व कौन करेगा। युद्ध का अठारहवां दिन शेष था और दुर्योधन किसी भी स्थिति में युद्ध छोड़ने को तैयार नहीं था। कौरव पक्ष में अब बहुत कम बड़े योद्धा बचे थे। कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कृतवर्मा और शल्य प्रमुख योद्धाओं में शामिल थे। इनमें से शल्य को सबसे अधिक अनुभवी और विशाल सेना का नेतृत्व करने योग्य माना गया, इसलिए दुर्योधन ने विचार-विमर्श के बाद शल्य को कौरव सेना का नया सेनापति बनाने का निर्णय लिया।
कौन थे शल्य?
शल्य मद्र देश के राजा थे। वे नकुल और सहदेव के मामा भी थे, क्योंकि उनकी बहन माद्री पांडु की पत्नी थीं। इस प्रकार शल्य का संबंध पांडवों से था, लेकिन परिस्थितियों के कारण वे कौरव पक्ष में शामिल हुए। महाभारत के अनुसार जब शल्य पांडवों की सहायता के लिए अपनी सेना लेकर निकल रहे थे, तब दुर्योधन ने मार्ग में उनके लिए भव्य स्वागत और अतिथि-सत्कार की व्यवस्था कर दी।
शल्य को लगा कि यह सब व्यवस्था युधिष्ठिर ने कराई है। जब उन्हें वास्तविकता का पता चला, तब उन्होंने दुर्योधन को वचन दे दिया कि वे उसके पक्ष में युद्ध करेंगे। यद्यपि शल्य कौरव पक्ष में थे, लेकिन उनके मन में पांडवों के प्रति स्नेह बना रहा। इसके बावजूद उन्होंने क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए कौरव सेना के लिए युद्ध किया।
कर्ण के सारथी के रूप में शल्य
युद्ध के सत्रहवें दिन शल्य ने कर्ण के सारथी की भूमिका निभाई थी। दुर्योधन का मानना था कि जिस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी हैं, उसी प्रकार शल्य जैसे महान योद्धा के सारथी बनने से कर्ण को लाभ मिलेगा। हालांकि, युद्ध के दौरान शल्य कई बार कर्ण का उत्साह बढ़ाने के बजाय उसके मनोबल को कमजोर करने वाले शब्द कहते दिखाई देते हैं। फिर भी उन्होंने सारथी का कर्तव्य निभाया और कर्ण के अंतिम युद्ध में उसके साथ रहे। कर्ण की मृत्यु के बाद दुर्योधन ने इसी शल्य को कौरव सेना का सेनापति नियुक्त किया।
शल्य बने कौरवों के अंतिम सेनापति
सत्रहवें दिन के युद्ध के समाप्त होने के बाद दुर्योधन ने शेष बचे योद्धाओं की सभा बुलाई। इस सभा में निर्णय लिया गया कि अठारहवें दिन के युद्ध के लिए शल्य को सेनापति बनाया जाएगा। शल्य का अभिषेक विधिपूर्वक किया गया। कौरव सेना ने उन्हें अपना नया सेनापति स्वीकार किया। उस समय तक कौरवों की अधिकांश सेना नष्ट हो चुकी थी, लेकिन दुर्योधन को विश्वास था कि शल्य अपने पराक्रम से युद्ध की दिशा बदल सकते हैं। इस प्रकार शल्य महाभारत युद्ध के अंतिम और कौरव पक्ष के तीसरे सेनापति बने जिन्होंने युद्ध के अंतिम दिन सेना का नेतृत्व किया।
अठारहवें दिन शल्य का युद्ध
अठारहवें दिन शल्य ने अत्यंत पराक्रम के साथ युद्ध किया। उन्होंने पांडव सेना पर भीषण आक्रमण किया और अनेक योद्धाओं को परास्त किया। उनकी युद्धकला और शौर्य को देखकर पांडव पक्ष भी सावधान हो गया। शल्य विशेष रूप से रथ संचालन और गदा तथा धनुष चलाने की कला में निपुण थे। उन्होंने युद्धभूमि में ऐसा प्रदर्शन किया कि कुछ समय के लिए पांडव सेना को कठिनाई का सामना करना पड़ा।
युधिष्ठिर और शल्य का आमना-सामना
महाभारत के अनुसार शल्य के वध का दायित्व युधिष्ठिर ने अपने ऊपर लिया। सामान्यतः युधिष्ठिर को युद्ध में शांत और संयमित योद्धा माना जाता है, लेकिन उस दिन उन्होंने स्वयं शल्य का सामना किया। दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ। शल्य ने अपने अस्त्रों से युधिष्ठिर को कई बार घायल किया, लेकिन युधिष्ठिर भी दृढ़ता से डटे रहे। अंततः युधिष्ठिर ने एक शक्तिशाली दिव्य अस्त्र का प्रयोग किया, जो सीधे शल्य के वक्षस्थल में जाकर लगा। उस प्रहार से शल्य गंभीर रूप से घायल होकर रथ से नीचे गिर पड़े। कुछ ही क्षणों बाद उन्होंने रणभूमि में प्राण त्याग दिए।