Vishnu Purana: सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु अनादि और अनंत हैं। वे समय, जन्म और मृत्यु के बंधनों से परे माने जाते हैं, इसलिए उनका चार भुजाओं वाला स्वरूप भी किसी एक घटना के बाद प्राप्त हुआ स्वरूप नहीं है, बल्कि उनका सनातन दिव्य रूप है।
Vishnu Purana: सनातन धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनकर्ता और जगत के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। मंदिरों में स्थापित उनकी अधिकांश प्रतिमाओं और चित्रों में वे चार भुजाओं वाले दिव्य स्वरूप में विराजमान दिखाई देते हैं। यह स्वरूप केवल एक कलात्मक कल्पना नहीं, बल्कि वेदों, पुराणों और वैष्णव परंपरा में वर्णित गहन धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ है। भगवान विष्णु की प्रत्येक भुजा में धारण किए गए दिव्य आयुध और उनका चार भुजाओं वाला स्वरूप उनके परम दिव्य स्वरूप का प्रतीक माना गया है। विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण, पद्म पुराण और अन्य वैष्णव ग्रंथों में इस स्वरूप का विशेष वर्णन मिलता है।
भगवान विष्णु का चार भुजाओं वाला स्वरूप कब से माना जाता है?
सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु अनादि और अनंत हैं। वे समय, जन्म और मृत्यु के बंधनों से परे माने जाते हैं, इसलिए उनका चार भुजाओं वाला स्वरूप भी किसी एक घटना के बाद प्राप्त हुआ स्वरूप नहीं है, बल्कि उनका सनातन दिव्य रूप है।
श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णन मिलता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब उन्होंने देवकी और वसुदेव को अपने चतुर्भुज स्वरूप का दर्शन कराया था। उस समय उनके चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल सुशोभित थे। बाद में माता-पिता की प्रार्थना पर उन्होंने बालक का सामान्य रूप धारण कर लिया। इस प्रसंग से भी यह स्पष्ट होता है कि चतुर्भुज स्वरूप भगवान विष्णु का मूल दिव्य स्वरूप माना जाता है। इसी प्रकार क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर विराजमान भगवान विष्णु का भी वर्णन चार भुजाओं वाले रूप में ही मिलता है।
चार भुजाओं का धार्मिक रहस्य क्या है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की चार भुजाएं उनकी सर्वशक्तिमान सत्ता और दिव्य सामर्थ्य का प्रतीक हैं। सामान्य मनुष्य की दो भुजाएं उसकी सीमित शक्ति को दर्शाती हैं, जबकि भगवान विष्णु की चार भुजाएं यह बताती हैं कि वे सम्पूर्ण ब्रह्मांड का पालन करने में समर्थ हैं।
वैष्णव ग्रंथों में यह भी वर्णित है कि उनकी चार भुजाएं चारों दिशाओं में उनकी सर्वव्यापक उपस्थिति का प्रतीक हैं। वे एक साथ समस्त लोकों, जीवों और सृष्टि के प्रत्येक भाग का पालन करते हैं। यही कारण है कि उनका स्वरूप सामान्य मानव से भिन्न और दिव्य माना गया है।
भगवान विष्णु की चार भुजाओं में क्या-क्या होता है?
भगवान विष्णु की चारों भुजाओं में चार दिव्य आयुध और चिह्न सुशोभित रहते हैं। प्रत्येक का अपना अलग धार्मिक महत्व बताया गया है।
शंख
भगवान विष्णु के एक हाथ में पांचजन्य शंख रहता है। पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन और अनेक दिव्य कथाओं में शंख का विशेष महत्व बताया गया है। पांचजन्य शंख की ध्वनि को अत्यंत पवित्र माना गया है। महाभारत में वर्णन है कि श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र युद्ध के आरंभ में पांचजन्य शंख का नाद किया था। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह शंख धर्म की स्थापना और अधर्म के अंत की घोषणा का प्रतीक माना जाता है।
सुदर्शन चक्र
दूसरी भुजा में भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र धारण करते हैं। पुराणों के अनुसार यह दिव्य चक्र अत्यंत तेजस्वी और अजेय है। अनेक कथाओं में भगवान विष्णु ने इसी चक्र से दैत्यों का संहार किया। श्रीमद्भागवत और विष्णु पुराण में सुदर्शन चक्र का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। शिशुपाल वध, राहु का सिर अलग करने तथा अनेक असुरों के विनाश में इसी दिव्य चक्र का प्रयोग बताया गया है। सुदर्शन चक्र को भगवान की अचूक दिव्य शक्ति का प्रतीक माना गया है, जो कभी अपने लक्ष्य से नहीं चूकता।
कौमोदकी गदा
तीसरी भुजा में भगवान विष्णु कौमोदकी नामक दिव्य गदा धारण करते हैं। पुराणों में इसे अत्यंत शक्तिशाली आयुध बताया गया है। जब भी किसी दैत्य का बल अत्यधिक बढ़ जाता था और वह देवताओं तथा ऋषियों को कष्ट देता था, तब भगवान विष्णु अपनी कौमोदकी गदा से उसका दमन करते थे। यह गदा उनके पराक्रम और दिव्य शक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
कमल पुष्प
चौथी भुजा में भगवान विष्णु कमल का पुष्प धारण करते हैं। कमल का संबंध स्वयं श्री लक्ष्मी से भी माना गया है, क्योंकि माता लक्ष्मी कमल पर विराजमान रहती हैं। पद्म पुराण में कमल को अत्यंत पवित्र पुष्प बताया गया है। भगवान विष्णु के हाथ में कमल उनके दिव्य स्वरूप की शोभा बढ़ाता है और वैष्णव परंपरा में इसे उनके शाश्वत स्वरूप का अभिन्न अंग माना गया है।
श्रीमद्भागवत में चतुर्भुज स्वरूप का वर्णन
दशम स्कंध में वर्णन मिलता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने कारागार में जन्म लिया, तब वे चार भुजाओं वाले दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए। उनके शरीर पर पीताम्बर, वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न, कौस्तुभ मणि और चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा कमल सुशोभित थे। देवकी और वसुदेव ने जब इस दिव्य स्वरूप का दर्शन किया, तब उन्होंने भगवान की स्तुति की और प्रार्थना की कि वे अपने इस अद्भुत रूप को छिपाकर सामान्य शिशु का रूप धारण करें। भगवान ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। यह प्रसंग चतुर्भुज स्वरूप की प्राचीन धार्मिक मान्यता का प्रमुख आधार माना जाता है।
विष्णु पुराण में भगवान के दिव्य स्वरूप का वर्णन
विष्णु पुराण में भगवान विष्णु को पीताम्बरधारी, वनमाला से अलंकृत, कौस्तुभ मणि धारण करने वाले तथा चार भुजाओं से युक्त बताया गया है। उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न अंकित रहता है और चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा कमल सुशोभित रहते हैं। ग्रंथ में यह भी वर्णन मिलता है कि यही स्वरूप वैकुण्ठ में भगवान का नित्य स्वरूप माना जाता है और भक्त इसी रूप का ध्यान एवं पूजन करते हैं।
समुद्र मंथन के प्रसंग में भी इसी स्वरूप का वर्णन
समुद्र मंथन की कथा में जब देवता और दैत्य अमृत प्राप्त करने के लिए मंथन कर रहे थे, तब भगवान विष्णु अनेक बार अपने चतुर्भुज स्वरूप में प्रकट हुए। चाहे देवताओं को आश्वस्त करना हो या बाद में मोहिनी अवतार धारण करने से पहले अपना वास्तविक दिव्य स्वरूप दिखाना हो, पुराणों में उनका मूल रूप चार भुजाओं वाला ही बताया गया है। इसी कारण वैष्णव परंपरा में यह स्वरूप भगवान विष्णु की शाश्वत पहचान माना जाता है।
मंदिरों में भगवान विष्णु की प्रतिमा इसी स्वरूप में क्यों स्थापित होती है?
भारत के प्राचीन वैष्णव मंदिरों में भगवान विष्णु की प्रतिमाएं प्रायः चार भुजाओं के साथ ही स्थापित की जाती हैं। चाहे बद्रीनाथ धाम हो, श्रीरंगम का श्री रंगनाथस्वामी मंदिर हो, तिरुमला के श्री वेंकटेश्वर भगवान हों या अन्य वैष्णव तीर्थ, मूर्ति निर्माण की परंपरा आगम शास्त्रों और शिल्पशास्त्रों के अनुसार की जाती है। इन शास्त्रों में भगवान विष्णु के चतुर्भुज स्वरूप का स्पष्ट विधान दिया गया है, इसलिए मंदिरों में स्थापित प्रतिमाओं में उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल अवश्य बनाए जाते हैं। यही स्वरूप सनातन परंपरा में भगवान विष्णु के दिव्य, शाश्वत और पालनकर्ता रूप का प्रामाणिक स्वरूप माना जाता है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)