Mahabharata Mythological Story: महाभारत के पावन ग्रंथ में वर्णित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दिव्य प्रसंग है द्रौपदी का स्वयंवर। पांचाल नरेश द्रुपद की पुत्री द्रौपदी, जो यज्ञ से उत्पन्न हुईं और समस्त संसार में अपनी अनुपम सौंदर्य तथा तेज के लिए विख्यात थीं, उनके स्वयंवर में देश-देश के अनेक राजा और महान योद्धा एकत्र हुए। राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री के लिए एक अत्यंत कठिन धनुर्विद्या की परीक्षा रखी थी, जिसमें एक विशाल और भारी धनुष को उठाना, उस पर प्रत्यंचा चढ़ाना तथा पानी में प्रतिबिंबित मछली की आंख में तीर मारना शामिल था। इस दिव्य आयोजन में कई वीरों ने धनुष उठाने का प्रयास किया, किंतु सफलता केवल एक को ही मिली। यह कथा महाभारत के आदि पर्व के स्वयंवर पर्व में वर्णित है।
द्रुपद का उद्देश्य और स्वयंवर की तैयारी
राजा द्रुपद ने पूर्व में द्रोणाचार्य से अपनी पराजय का बदला लेने के लिए यज्ञ किया था, जिसमें दो पुत्र उत्पन्न हुए– धृष्टद्युम्न और द्रौपदी। द्रौपदी यज्ञकुंड से निकलीं और उनके साथ एक दिव्य आवाज आई कि यह कन्या क्षत्रियों का नाश करने वाली होगी। द्रुपद अपनी पुत्री का विवाह अर्जुन से करना चाहते थे, क्योंकि अर्जुन ने उन्हें युद्ध में पराजित किया था और उनके गुणों से वे प्रभावित थे।
जब पांडवों की लाक्षागृह की घटना का समाचार मिला, तो द्रुपद ने स्वयंवर का आयोजन किया। उन्होंने एक विशाल सभा मंडप तैयार करवाया, जहां ऊपर एक घूमती हुई स्वर्णिम मछली टंगी थी और नीचे तेल भरा पात्र रखा गया था, जिसमें मछली का प्रतिबिंब दिखता था। शर्त थी कि प्रतिबिंब देखते हुए ही तीर से मछली की आंख भेदनी होगी। धनुष अत्यंत भारी और कठिन था, जिसे उठाना और तानना ही महान बल और कौशल की परीक्षा था। धृष्टद्युम्न ने स्वयंवर की घोषणा की और सभी आमंत्रित राजाओं का स्वागत किया।
स्वयंवर सभा में उपस्थित प्रमुख राजा और योद्धा
स्वयंवर में अनेक देशों के नरेश पहुंचे थे। कौरव पक्ष से दुर्योधन, दुःशासन, विकर्ण आदि भाई आए। अंगराज कर्ण भी उपस्थित थे। अन्य प्रमुख राजाओं में शल्य (मद्र देश), शाल्व, जरासंध के पुत्र, शिशुपाल (चेदि), जयद्रथ (सिंधु), कलिंगराज, पाण्ड्य, पौंड्र, विदेह, यवन आदि अनेक थे। श्रीकृष्ण और बलराम भी दर्शक रूप में वहां मौजूद थे, किंतु उन्होंने स्पर्धा में भाग नहीं लिया। पांडव भिक्षु ब्राह्मणों के वेश में छिपे हुए सभा में बैठे थे। द्रौपदी दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से सुशोभित होकर सभा में आईं। उनके हाथ में वरमाला थी।
धनुष उठाने वाले योद्धाओं का प्रयास
सभा में एक-एक करके राजा धनुष की ओर बढ़े। कई राजाओं ने धनुष को उठाने का प्रयास किया, किंतु वह इतना भारी था कि अधिकांश उसे हिला भी नहीं सके। कुछ ने उसे उठा लिया, पर प्रत्यंचा चढ़ाने में असफल रहे। कुछ ने प्रत्यंचा चढ़ाई, किंतु निशाना साधने में चूक गए।
दुर्योधन और कौरव भाइयों का प्रयास: दुर्योधन सबसे पहले या प्रमुखता से प्रयास करने वालों में था। उन्होंने धनुष उठाया, पर उसे तानने में सफलता नहीं मिली। उनके भाई दुःशासन, विकर्ण आदि भी असफल रहे।
अन्य राजाओं का प्रयास: शल्य, शाल्व, कलिंग के राजा, पाण्ड्य नरेश, पौंड्र नरेश, विदेह नरेश, यवन नरेश आदि अनेक योद्धाओं ने धनुष उठाया। महाभारत के अनुसार इनमें से कई ने धनुष को उठा तो लिया, किंतु प्रत्यंचा चढ़ाने या निशाने को भेदने में विफल रहे। अश्वत्थामा, क्राथ, सुनीत, वक्र आदि भी प्रयासरत हुए।
कर्ण का प्रयास: अंगराज कर्ण, जो सूर्यपुत्र और महान धनुर्धर थे, भी आगे बढ़े। वे धनुष उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाने लगे, किंतु द्रौपदी ने कहा कि वे सूतपुत्र हैं, अतः उन्हें स्वीकार नहीं करेंगी। इस प्रकार अनेक शक्तिशाली राजाओं ने धनुष उठाया, पर पूर्ण सफलता किसी को नहीं मिली। सभा में निराशा छा गई।
अर्जुन का दिव्य प्रदर्शन