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Mahabharata: भगवान शिव से वरदान प्राप्त कर चुका था जयद्रथ, फिर कैसे हुआ उसका वध?

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata: जयद्रथ सिंधु देश का राजा था। उसका विवाह धृतराष्ट्र और गांधारी की पुत्री दुशला से हुआ था। इस प्रकार वह कौरवों का बहनोई था। महाभारत के वनपर्व में वर्णन मिलता है कि जब पांडव वनवास में थे, तब जयद्रथ ने द्रौपदी का हरण करने का प्रयास किया था। 

कैसे हुआ था जयद्रथ का वध?
Mahabharata Mythological Story: महाभारत के युद्ध में अनेक ऐसे योद्धा थे जिनके पास असाधारण शक्तियां, दिव्य अस्त्र और देवताओं के वरदान थे। इन्हीं में से एक था सिंधु देश का राजा जयद्रथ। वह केवल कौरवों का सहयोगी ही नहीं था, बल्कि दुर्योधन का बहनोई भी था। जयद्रथ का नाम महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण प्रसंगों में लिया जाता है, क्योंकि अभिमन्यु के वध में उसकी भूमिका निर्णायक मानी जाती है। यही कारण था कि अभिमन्यु की मृत्यु के बाद अर्जुन ने प्रतिज्ञा की थी कि यदि अगले दिन सूर्यास्त से पहले वह जयद्रथ का वध नहीं कर पाए तो स्वयं अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्याग देगा।

जयद्रथ कोई साधारण योद्धा नहीं था। उसने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था और उनसे ऐसा वरदान प्राप्त किया था जिसके कारण उसे युद्धभूमि में पराजित करना अत्यंत कठिन हो गया था। फिर भी कुरुक्षेत्र के युद्ध के चौदहवें दिन अर्जुन ने उसका वध कर दिया। यह घटना महाभारत के सबसे रोमांचक और चर्चित प्रसंगों में से एक मानी जाती है।

जयद्रथ कौन था?

जयद्रथ सिंधु देश का राजा था। उसका विवाह धृतराष्ट्र और गांधारी की पुत्री दुशला से हुआ था। इस प्रकार वह कौरवों का बहनोई था। महाभारत के वनपर्व में वर्णन मिलता है कि जब पांडव वनवास में थे, तब जयद्रथ ने द्रौपदी का हरण करने का प्रयास किया था। उस समय भीम और अर्जुन ने उसका पीछा करके उसे पराजित किया था और बंदी बनाकर युधिष्ठिर के सामने प्रस्तुत किया था।

युधिष्ठिर के आदेश पर उसका वध नहीं किया गया, लेकिन उसे अपमानित करके छोड़ दिया गया। इस अपमान को जयद्रथ कभी भूल नहीं पाया। उसके मन में पांडवों के प्रति गहरी शत्रुता उत्पन्न हो गई और उसने प्रतिशोध लेने का निश्चय कर लिया।

पांडवों से बदला लेने के लिए की कठोर तपस्या

द्रौपदी हरण के प्रयास में मिली पराजय और अपमान के बाद जयद्रथ ने वन में जाकर कठोर तपस्या आरंभ कर दी। उसने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए लंबे समय तक घोर तप किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उसे वर मांगने को कहा। जयद्रथ ने शिवजी से प्रार्थना की कि वह युद्ध में सभी पांडवों को पराजित करने की शक्ति प्राप्त करना चाहता है।

भगवान शिव ने कहा कि अर्जुन को पराजित करना किसी साधारण योद्धा के लिए संभव नहीं है, क्योंकि उसकी रक्षा स्वयं श्रीकृष्ण करते हैं और वह महान धनुर्धर है। इसलिए जयद्रथ की यह इच्छा पूरी नहीं हो सकती। इसके बाद शिवजी ने उसे एक विशेष वरदान दिया। उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान एक दिन के लिए वह अर्जुन को छोड़कर शेष चारों पांडवों को रोकने में सफल होगा। यह वरदान आगे चलकर अभिमन्यु वध के प्रसंग में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

चक्रव्यूह और अभिमन्यु का प्रवेश

महाभारत युद्ध के तेरहवें दिन आचार्य द्रोण ने चक्रव्यूह की रचना की। उस दिन अर्जुन को युद्धभूमि के दूसरे भाग में उलझा दिया गया था। पांडव सेना में केवल अभिमन्यु ही ऐसा योद्धा था जिसे चक्रव्यूह में प्रवेश करना आता था। अभिमन्यु ने चक्रव्यूह को भेदकर भीतर प्रवेश किया। योजना यह थी कि उसके पीछे-पीछे भीम, युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव भी प्रवेश करेंगे। लेकिन उसी समय भगवान शिव के वरदान के प्रभाव से जयद्रथ ने पांडवों को रोक लिया।

कहा जाता है कि उस दिन जयद्रथ ने अद्भुत पराक्रम दिखाया। उसने भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव और अन्य अनेक योद्धाओं को चक्रव्यूह में प्रवेश नहीं करने दिया। परिणामस्वरूप अभिमन्यु अकेला भीतर फंस गया। इसके बाद कौरव पक्ष के अनेक महारथियों ने मिलकर अभिमन्यु पर आक्रमण किया। अंततः अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुआ। इस घटना ने पांडवों को शोक और क्रोध से भर दिया।

अर्जुन की भयंकर प्रतिज्ञा

जब अर्जुन को अपने पुत्र अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार मिला तो वह अत्यंत व्यथित हुआ। उसे पता चला कि अभिमन्यु के अकेले पड़ जाने का मुख्य कारण जयद्रथ था, तब अर्जुन ने समस्त सेना के सामने प्रतिज्ञा की कि अगले दिन सूर्यास्त से पहले वह जयद्रथ का वध करेगा। यदि वह ऐसा नहीं कर पाया तो स्वयं अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्याग देगा। अर्जुन की इस प्रतिज्ञा ने दोनों पक्षों को चिंतित कर दिया। कौरवों ने निश्चय किया कि किसी भी प्रकार जयद्रथ को सूर्यास्त तक सुरक्षित रखा जाएगा।

जयद्रथ की रक्षा के लिए बनाई गई विशेष योजना

चौदहवें दिन द्रोणाचार्य, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, शल्य और अन्य महारथियों को जयद्रथ की रक्षा का दायित्व सौंपा गया। उसे सेना के अत्यंत सुरक्षित भाग में रखा गया। दुर्योधन जानता था कि यदि अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर लेता है तो कौरवों का मनोबल टूट जाएगा। इसलिए पूरे दिन अर्जुन का मार्ग रोकने के लिए लगातार युद्ध होता रहा। अर्जुन और श्रीकृष्ण भी अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने के लिए आगे बढ़ते रहे। दिन भर भीषण युद्ध हुआ। अर्जुन ने रास्ते में आने वाले अनेक महारथियों को परास्त किया, लेकिन समय तेजी से बीत रहा था।

जयद्रथ के पिता को मिला हुआ वरदान

जयद्रथ के पिता का नाम वृद्धक्षत्र था। उन्होंने भी कठोर तपस्या करके एक विशेष वरदान प्राप्त किया था। उन्हें ज्ञात था कि भविष्य में उनके पुत्र की मृत्यु युद्धभूमि में हो सकती है। कथा के अनुसार वृद्धक्षत्र ने वरदान प्राप्त किया था कि जो भी व्यक्ति जयद्रथ का सिर भूमि पर गिराएगा, उसका सिर तत्काल सौ टुकड़ों में विभाजित हो जाएगा। इस वरदान के कारण जयद्रथ का वध करना और भी कठिन हो गया था। अर्जुन को केवल उसे मारना ही नहीं था, बल्कि ऐसा उपाय भी करना था जिससे उसका सिर धरती पर न गिरे।

श्रीकृष्ण की लीला और सूर्यास्त का भ्रम

युद्ध के दौरान सूर्यास्त का समय निकट आने लगा। कौरव पक्ष को लगने लगा कि अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं कर पाएगा। जयद्रथ भी अब कुछ निश्चिंत हो गया था, तब श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से सूर्य को कुछ समय के लिए ढक दिया। चारों ओर ऐसा प्रतीत हुआ मानो सूर्यास्त हो चुका हो। कौरव सेना में आनंद की लहर दौड़ गई।

जयद्रथ भी अपने सुरक्षित स्थान से बाहर निकल आया। उसे लगा कि अर्जुन की प्रतिज्ञा असफल हो गई है और अब वह आत्मदाह करने को विवश होगा, लेकिन उसी समय श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि यही अवसर है। उन्होंने बताया कि सूर्यास्त वास्तव में नहीं हुआ है और जयद्रथ सामने उपस्थित है।

कैसे हुआ जयद्रथ का वध?

श्रीकृष्ण के संकेत पर अर्जुन ने तुरंत गांडीव पर दिव्य बाण चढ़ाया। उन्होंने ऐसा बाण छोड़ा जिसने जयद्रथ का सिर धड़ से अलग कर दिया, लेकिन अर्जुन यहीं नहीं रुके। उन्हें वृद्धक्षत्र के वरदान की जानकारी थी। इसलिए उन्होंने अपने दिव्य अस्त्र के प्रभाव से जयद्रथ के कटे हुए सिर को आकाश मार्ग से उड़ाते हुए उसके पिता के पास पहुंचा दिया। उस समय वृद्धक्षत्र तपस्या में लीन थे। जयद्रथ का सिर जाकर उनकी गोद में गिरा। कुछ समय बाद जब वे उठे तो वह सिर उनकी गोद से नीचे गिर गया।

जैसे ही सिर भूमि पर गिरा, वरदान के प्रभाव से वृद्धक्षत्र का सिर भी अनेक टुकड़ों में विभाजित हो गया। इस प्रकार अर्जुन ने न केवल जयद्रथ का वध किया, बल्कि उसके पिता के वरदान को भी निष्फल कर दिया।

अर्जुन की प्रतिज्ञा हुई पूर्ण

जयद्रथ के वध के साथ ही अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरी हुई। सूर्य भी उसी समय पुनः दिखाई देने लगा। तब कौरवों को ज्ञात हुआ कि वे श्रीकृष्ण की योगमाया के कारण भ्रमित हो गए थे। जयद्रथ की मृत्यु ने कौरव सेना को गहरा आघात पहुंचाया। अभिमन्यु के वध का प्रतिशोध पूरा हो चुका था और पांडव सेना का मनोबल पुनः ऊंचा हो गया।

महाभारत के युद्ध में यह घटना इसलिए विशेष मानी जाती है, क्योंकि इसमें भगवान शिव के वरदान, वृद्धक्षत्र के वरदान, अर्जुन की प्रतिज्ञा और श्रीकृष्ण की रणनीति सभी एक साथ दिखाई देते हैं। शिवजी के वरदान के कारण जयद्रथ ने तेरहवें दिन पांडवों को रोककर अभिमन्यु को अकेला कर दिया था, लेकिन चौदहवें दिन अर्जुन ने श्रीकृष्ण की सहायता से सभी बाधाओं को पार करते हुए उसका वध कर दिया और अपने पुत्र की मृत्यु का प्रतिशोध लिया।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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