Mahabharata Mythological Story: कुरुक्षेत्र का महायुद्ध अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका था। कौरव सेना के महारथी एक-एक कर युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, शल्य और शकुनि जैसे प्रमुख योद्धाओं के पतन के बाद कौरव पक्ष लगभग समाप्त हो चुका था। ऐसे समय में कौरवों का राजा दुर्योधन अकेला बचा था। महाभारत की कथा में वर्णन मिलता है कि युद्ध के अंतिम दिन दुर्योधन रणभूमि छोड़कर एक सरोवर में जाकर छिप गया था। यह प्रसंग महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण और चर्चित प्रसंगों में से एक माना जाता है।
आखिर वह कौन-सा कारण था, जिसके चलते स्वयं को महान गदायुद्ध योद्धा मानने वाला दुर्योधन जलाशय में जाकर छिप गया? आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा...
युद्ध के अठारहवें दिन की स्थिति
महाभारत के अनुसार अठारह दिनों तक चले युद्ध में कौरव पक्ष को लगातार भारी क्षति उठानी पड़ी। कर्ण के वध के बाद शल्य को सेनापति बनाया गया, लेकिन वह भी युद्धभूमि में मारा गया। इसके बाद शकुनि और उसके पुत्र उलूक का भी अंत हो गया। जब दुर्योधन ने देखा कि उसके सभी प्रमुख योद्धा और भाई युद्ध में मारे जा चुके हैं, तब उसके सामने केवल दो ही विकल्प बचे थे या तो वह अंतिम सांस तक युद्ध करे अथवा अपनी रक्षा का कोई उपाय खोजे। उस समय तक उसकी विशाल सेना नष्ट हो चुकी थी और उसके पास युद्ध करने के लिए पर्याप्त सहयोगी भी नहीं बचे थे।
युद्धभूमि छोड़कर सरोवर की ओर गया दुर्योधन
महाभारत में वर्णन मिलता है कि अपने पक्ष के पूर्ण विनाश को देखकर दुर्योधन युद्धभूमि से निकल गया। वह एक ऐसे सरोवर के पास पहुंचा जिसका नाम द्वैपायन सरोवर बताया गया है। दुर्योधन को जल-स्तंभन विद्या का ज्ञान था। इस विशेष विद्या के प्रभाव से वह जल के भीतर भी सुरक्षित रह सकता था। उसने उसी विद्या का उपयोग करते हुए सरोवर के जल में प्रवेश किया और वहां छिपकर बैठ गया।
पौराणिक कथा के अनुसार दुर्योधन का उद्देश्य तत्काल युद्ध से बचना और कुछ समय के लिए विश्राम करना था। लगातार कई दिनों से चले भीषण युद्ध और अपने सभी प्रियजनों के वध ने उसे मानसिक रूप से भी विचलित कर दिया था।
संजय ने देखी दुर्योधन की स्थिति
महाभारत के अनुसार उसी समय धृतराष्ट्र के सारथी संजय वहां पहुंचे। संजय ने दुर्योधन को सरोवर में छिपा हुआ देखा। दुर्योधन ने संजय से कहा कि उसके सभी भाई और मित्र मारे जा चुके हैं। उसकी सेना का विनाश हो चुका है और वह अत्यंत थक चुका है, इसलिए वह कुछ समय के लिए जल में विश्राम करना चाहता है। संजय ने बाद में यह समाचार धृतराष्ट्र तक पहुंचाया कि दुर्योधन अभी जीवित है और एक सरोवर में छिपा हुआ है।
कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्मा भी पहुंचे
पौराणिक कथा के अनुसार जब कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्मा को दुर्योधन के जीवित होने की जानकारी मिली तो वे भी उस सरोवर के पास पहुंचे। तीनों योद्धाओं ने दुर्योधन से बाहर निकलकर पुनः युद्ध करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि अभी भी वे उसके साथ हैं और युद्ध जारी रखा जा सकता है, लेकिन दुर्योधन ने उत्तर दिया कि उसकी सेना समाप्त हो चुकी है और वह अत्यंत थका हुआ है। उसने कहा कि कुछ समय बाद वह बाहर निकलेगा। अश्वत्थामा ने उसी रात पांडव शिविर पर आक्रमण करने का संकल्प भी इसी समय लिया था।
कैसे पता चला पांडवों को दुर्योधन का ठिकाना
उधर पांडव दुर्योधन की खोज में लगे हुए थे। युद्ध समाप्त होने के बाद भी जब दुर्योधन नहीं मिला तो वे उसे खोजते रहे। महाभारत में वर्णन मिलता है कि कुछ शिकारी उस सरोवर के निकट पहुंचे थे। उन्होंने कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्मा की बातचीत सुन ली। इससे उन्हें ज्ञात हो गया कि दुर्योधन जलाशय में छिपा हुआ है। बाद में उन्होंने यह सूचना पांडवों को दी। सूचना मिलते ही युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा श्रीकृष्ण उस सरोवर के पास पहुंचे।
युधिष्ठिर ने दुर्योधन को ललकारा
सरोवर के निकट पहुंचकर युधिष्ठिर ने दुर्योधन को आवाज लगाई। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं को महान क्षत्रिय और पराक्रमी योद्धा कहता था, वह अब जल में छिपकर क्यों बैठा है। युधिष्ठिर ने दुर्योधन को बाहर आकर युद्ध करने की चुनौती दी। उन्होंने कहा कि अब युद्ध का अंतिम निर्णय होना बाकी है। दुर्योधन ने जल के भीतर से उत्तर दिया कि वह भय के कारण नहीं छिपा है, बल्कि युद्ध की थकान दूर करने के लिए वहां विश्राम कर रहा है। उसने यह भी कहा कि उसके सभी प्रियजन मारे जा चुके हैं और अब उसे राज्य की कोई इच्छा नहीं रही।
राज्य त्यागने की बात
कथा के अनुसार दुर्योधन ने युधिष्ठिर से कहा कि यदि वे चाहें तो पूरा राज्य ले सकते हैं। अब उसके लिए राज्य का कोई महत्व नहीं है क्योंकि उसके भाई, मित्र और सहयोगी सभी युद्ध में मारे जा चुके हैं, लेकिन युधिष्ठिर ने उसका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि युद्ध का समापन तभी माना जाएगा, जब दुर्योधन स्वयं युद्धभूमि में उतरकर अंतिम मुकाबला करेगा।
सरोवर से बाहर आया दुर्योधन
युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण की बातों से प्रेरित होकर दुर्योधन अंततः सरोवर से बाहर निकल आया। जल से बाहर आने के बाद उसने पुनः अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करने की घोषणा की। उसने कहा कि वह अकेला ही पांडवों में से किसी एक के साथ युद्ध करेगा। उस समय दुर्योधन के हाथ में उसकी प्रिय गदा थी। गदायुद्ध में उसे अत्यंत निपुण माना जाता था।
भीम और दुर्योधन का गदायुद्ध
दुर्योधन ने गदायुद्ध के लिए चुनौती दी। पांडवों की ओर से भीमसेन उसके सामने आए। इसके बाद कुरुक्षेत्र में महाभारत का अंतिम और निर्णायक युद्ध आरंभ हुआ। दोनों योद्धा गदा लेकर आमने-सामने खड़े हुए। महाभारत में वर्णन मिलता है कि यह गदायुद्ध अत्यंत भीषण था। दोनों योद्धा समान रूप से बलवान और युद्धकला में निपुण थे। लंबे समय तक दोनों के बीच घमासान संघर्ष चलता रहा।
दुर्योधन को प्राप्त था विशेष संरक्षण
पौराणिक कथा के अनुसार दुर्योधन की माता गांधारी ने अपने तपबल से उसके शरीर को वज्र के समान कठोर बनाने का प्रयास किया था। इसी कारण उसके शरीर का अधिकांश भाग अभेद्य माना जाता था। गदायुद्ध के दौरान भीम को दुर्योधन पर विजय प्राप्त करने में कठिनाई हो रही थी, तब श्रीकृष्ण ने भीम को उनकी प्रतिज्ञा की याद दिलाई।
भीम ने पूरी की अपनी प्रतिज्ञा