facebook pixel
विज्ञापन
Home  dharm  religious stories  mahabharata me dhrishtadyumna ne kyon kiya tha dronacharya ka vadh janiye pauranik katha

Mahabharata: महाभारत में धृष्टद्युम्न ने क्यों किया था द्रोणाचार्य का वध? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata Story: धृष्टद्युम्न और द्रोणाचार्य की कथा का आरंभ राजा द्रुपद और द्रोणाचार्य की मित्रता से होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार द्रोणाचार्य और पांचाल नरेश द्रुपद ने बचपन में एक ही आश्रम में शिक्षा प्राप्त की थी।

Mahabharata Mythological
Mahabharata Mythological Story: महाभारत का युद्ध केवल दो पक्षों के बीच राज्य प्राप्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह अनेक प्रतिज्ञाओं, शापों, वरदानों और पूर्व निर्धारित घटनाओं का भी संगम था। इस महायुद्ध में कई ऐसे पात्र थे, जिनका जन्म ही किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ था। उन्हीं में से एक थे धृष्टद्युम्न। पौराणिक कथाओं के अनुसार धृष्टद्युम्न का जन्म ही द्रोणाचार्य के वध के लिए हुआ था। यही कारण है कि जब कुरुक्षेत्र में युद्ध अपने चरम पर पहुंचा, तब वही धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्य की मृत्यु का कारण बने।

धृष्टद्युम्न और द्रोणाचार्य की कथा महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण प्रसंगों में से एक मानी जाती है। आइए जानते हैं कि आखिर धृष्टद्युम्न ने द्रोणाचार्य का वध क्यों किया था और इसके पीछे क्या पौराणिक कारण बताए जाते हैं।

राजा द्रुपद और द्रोणाचार्य की मित्रता

धृष्टद्युम्न और द्रोणाचार्य की कथा का आरंभ राजा द्रुपद और द्रोणाचार्य की मित्रता से होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार द्रोणाचार्य और पांचाल नरेश द्रुपद ने बचपन में एक ही आश्रम में शिक्षा प्राप्त की थी। उस समय दोनों के बीच गहरी मित्रता थी।

कहा जाता है कि द्रुपद ने द्रोण से कहा था कि जब वह पांचाल का राजा बनेगा तो अपने राज्य और वैभव में द्रोण को भी सहभागी बनाएगा। समय बीतने के साथ द्रुपद पांचाल के राजा बन गए, जबकि द्रोणाचार्य का जीवन आर्थिक कठिनाइयों में बीतने लगा।

एक दिन द्रोणाचार्य अपने पुराने मित्र द्रुपद के पास सहायता की आशा से पहुंचे, लेकिन राजा बनने के बाद द्रुपद का व्यवहार बदल चुका था। उन्होंने द्रोणाचार्य का अपमान करते हुए कहा कि मित्रता केवल समान लोगों के बीच होती है। एक राजा और एक निर्धन ब्राह्मण मित्र नहीं हो सकते। द्रुपद के इन शब्दों ने द्रोणाचार्य के हृदय को गहरा आघात पहुंचाया और उन्होंने इस अपमान का प्रतिशोध लेने का संकल्प कर लिया।

 

द्रोणाचार्य

द्रोणाचार्य ने लिया द्रुपद से प्रतिशोध

बाद में द्रोणाचार्य हस्तिनापुर के राजकुमारों के गुरु बने। उन्होंने कौरवों और पांडवों को शस्त्र विद्या का प्रशिक्षण दिया। जब शिक्षा पूर्ण हुई तो गुरु दक्षिणा के रूप में उन्होंने अपने शिष्यों से राजा द्रुपद को बंदी बनाकर लाने को कहा।

कौरव इस कार्य में सफल नहीं हो सके, लेकिन अर्जुन ने द्रुपद को पराजित कर बंदी बना लिया और उन्हें द्रोणाचार्य के सामने प्रस्तुत किया। द्रोणाचार्य ने द्रुपद को उनके अपमान की याद दिलाई और उनका आधा राज्य अपने अधिकार में ले लिया। इसके बाद आधा राज्य लौटाते हुए कहा कि अब दोनों समान स्तर पर हैं और मित्रता संभव है। हालांकि, द्रुपद ने अपना आधा राज्य तो वापस पा लिया, लेकिन यह पराजय और अपमान उनके मन में गहरी पीड़ा बनकर रह गया।

द्रुपद ने किया पुत्रेष्टि यज्ञ

द्रोणाचार्य से मिली पराजय के बाद राजा द्रुपद प्रतिशोध की अग्नि में जलने लगे। उन्होंने निश्चय किया कि उन्हें ऐसा पुत्र चाहिए जो युद्ध में द्रोणाचार्य का वध कर सके। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी उद्देश्य से द्रुपद ने महान ऋषियों की सहायता से एक विशेष यज्ञ कराया। यह यज्ञ पुत्र प्राप्ति के लिए किया गया था, लेकिन इसके पीछे मुख्य उद्देश्य द्रोणाचार्य के संहारक को जन्म देना था।

जब यज्ञ की पूर्णाहुति हुई तो यज्ञ अग्नि से एक तेजस्वी युवक प्रकट हुआ। उसके शरीर पर कवच था और हाथों में अस्त्र-शस्त्र सुशोभित थे। आकाशवाणी हुई कि यह बालक द्रोणाचार्य के वध के लिए उत्पन्न हुआ है। यही बालक आगे चलकर धृष्टद्युम्न कहलाया।

यज्ञ से हुआ था धृष्टद्युम्न का जन्म

धृष्टद्युम्न का जन्म सामान्य मनुष्यों की तरह नहीं हुआ था। वे सीधे यज्ञ कुंड से प्रकट हुए थे। इसी यज्ञ से उनकी बहन द्रौपदी का भी प्राकट्य हुआ था। जब धृष्टद्युम्न के जन्म के समय आकाशवाणी हुई कि यह द्रोणाचार्य के वध का कारण बनेगा, तब यह बात दूर-दूर तक फैल गई। स्वयं द्रोणाचार्य को भी इस भविष्यवाणी की जानकारी थी। इसके बावजूद उन्होंने धृष्टद्युम्न के प्रति कोई शत्रुता नहीं दिखाई।

द्रोणाचार्य ने स्वयं धृष्टद्युम्न को दी शिक्षा

महाभारत की कथा का यह प्रसंग अत्यंत रोचक माना जाता है। द्रोणाचार्य जानते थे कि धृष्टद्युम्न भविष्य में उनके वध का कारण बनेंगे, फिर भी उन्होंने उन्हें शस्त्र विद्या सिखाई। जब धृष्टद्युम्न शिक्षा प्राप्त करने के लिए द्रोणाचार्य के पास पहुंचे, तब गुरु ने उन्हें स्वीकार कर लिया। उन्होंने धनुर्वेद और युद्धकला का संपूर्ण ज्ञान प्रदान किया।

पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि द्रोणाचार्य अपने धर्म और गुरु कर्तव्य से कभी पीछे नहीं हटे। उनके लिए शिष्य को शिक्षा देना सर्वोच्च दायित्व था, इसलिए उन्होंने भविष्य की चिंता किए बिना धृष्टद्युम्न को भी अन्य शिष्यों की तरह प्रशिक्षित किया।

 

Mahabharata Mythological

कुरुक्षेत्र युद्ध में धृष्टद्युम्न की भूमिका

जब महाभारत का युद्ध आरंभ हुआ, तब धृष्टद्युम्न पांडव सेना के प्रधान सेनापति बनाए गए। यह निर्णय भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि वे पांचाल नरेश द्रुपद के पुत्र थे और महान योद्धा माने जाते थे। युद्ध के दौरान धृष्टद्युम्न ने कई प्रमुख कौरव योद्धाओं से युद्ध किया। लेकिन उनके जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य वही था जिसके लिए उनका जन्म हुआ था- द्रोणाचार्य का वध। दूसरी ओर द्रोणाचार्य भी कौरव सेना के प्रमुख सेनापति बने और उन्होंने अपने अद्भुत पराक्रम से पांडव सेना को भारी क्षति पहुंचाई।

द्रोणाचार्य को पराजित करना क्यों कठिन था?

महाभारत के अनुसार द्रोणाचार्य उस समय के सबसे महान योद्धाओं में गिने जाते थे। वे दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता थे और युद्धभूमि में उनका सामना करना अत्यंत कठिन था। कई दिनों तक उन्होंने पांडव सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। पांडव पक्ष के योद्धा समझ गए कि जब तक द्रोणाचार्य युद्धभूमि में सक्रिय रहेंगे, तब तक विजय प्राप्त करना अत्यंत कठिन होगा, तब श्रीकृष्ण ने ऐसी योजना बनाई, जिससे द्रोणाचार्य को शस्त्र त्यागने के लिए विवश किया जा सके।

अश्वत्थामा की मृत्यु का समाचार

द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामा से अत्यंत प्रेम करते थे। श्रीकृष्ण जानते थे कि यदि उन्हें यह विश्वास हो जाए कि अश्वत्थामा की मृत्यु हो गई है, तो उनका मन युद्ध से हट जाएगा। इसी उद्देश्य से भीम ने अश्वत्थामा नामक एक हाथी का वध कर दिया। इसके बाद घोषणा की गई कि अश्वत्थामा मारा गया।

द्रोणाचार्य को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने सत्य जानने के लिए धर्मराज युधिष्ठिर से पूछा, क्योंकि उन्हें पता था कि युधिष्ठिर कभी असत्य नहीं बोलते, तब युधिष्ठिर ने कहा- “अश्वत्थामा हतः” अर्थात अश्वत्थामा मारा गया और इसके बाद धीरे से कहा “नरो वा कुंजरो वा” अर्थात वह मनुष्य था या हाथी, यह स्पष्ट नहीं है। कहा जाता है कि शंख और नगाड़ों के शोर में द्रोणाचार्य केवल पहला भाग ही सुन सके और उन्हें विश्वास हो गया कि उनका पुत्र मारा गया है।

द्रोणाचार्य ने त्याग दिए अस्त्र-शस्त्र

पुत्र की मृत्यु का समाचार सुनकर द्रोणाचार्य अत्यंत दुखी हो गए। उनका मन युद्ध से विरक्त हो गया। उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए और युद्धभूमि में ध्यानमग्न होकर बैठ गए। उस समय वे किसी से युद्ध नहीं कर रहे थे। उनका ध्यान आध्यात्मिक चिंतन में लगा हुआ था। यही वह क्षण था, जिसका लंबे समय से इंतजार किया जा रहा था।

धृष्टद्युम्न ने किया द्रोणाचार्य का वध

जब द्रोणाचार्य शस्त्र त्यागकर ध्यान में लीन थे, तब धृष्टद्युम्न उनके समीप पहुंचे। महाभारत के विभिन्न वर्णनों में उल्लेख मिलता है कि धृष्टद्युम्न ने उसी अवस्था में द्रोणाचार्य पर प्रहार किया। कुछ कथाओं के अनुसार उन्होंने तलवार से द्रोणाचार्य का सिर धड़ से अलग कर दिया। इस प्रकार द्रोणाचार्य का अंत हुआ। धृष्टद्युम्न ने वही कार्य किया जिसके लिए उनका जन्म हुआ था। राजा द्रुपद के प्रतिशोध की अग्नि, यज्ञ की आकाशवाणी और वर्षों पुरानी भविष्यवाणी उसी क्षण पूर्ण हुई।


यह भी पढ़ें:- 

Ramayan Ki Kahani: रामायण की रचना क्यों हुई? जानें रामायण की मुख्य घटनाएं, कथा और धार्मिक महत्व 

Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 

Hanuman Ji Story: कलियुग में कहां रहते हैं हनुमान जी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 
 
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel