Ramayana Mythological Story: जब भगवान विष्णु ने धरती पर मानव रूप में अवतार लिया तो उन्होंने अपनी दिव्य लीला रची, जिसका एकमात्र उद्देश्य था पापी और अत्याचारी रावण का वध करना। रावण ने अपनी तपस्या से इतना बल प्राप्त कर लिया था कि देवता, गंधर्व, यक्ष सभी उससे भयभीत रहते थे। उसके वध के लिए भगवान को मनुष्य रूप में आना पड़ा और मनुष्य रूप में ही उन्हें वनवास भोगना पड़ा। इसी वनवास के दौरान दंडकारण्य में एक ऐसी घटना घटी जो राम-रावण युद्ध की नींव बन गई। वह घटना थी रावण की बहन शूर्पणखा का पंचवटी आगमन।
शूर्पणखा के आने से पहले तक राम, सीता और लक्ष्मण दंडकारण्य में सुखपूर्वक विचर रहे थे। ऋषि-मुनियों के आतंक का नाश कर रहे थे, लेकिन शूर्पणखा का आना एक छोटी-सी कामेच्छा से शुरू होकर राक्षस सेना के संहार और अंततः लंका विजय तक पहुँचा। आइए जानते हैं कि आखिर श्रीराम, लक्ष्मण और शूर्पणखा के बीच क्या-क्या संवाद हुआ और कैसे एक राक्षसी की वासना ने समूचे रामायण के युद्ध का स्वरूप निर्धारित कर दिया।
पंचवटी में शूर्पणखा का आगमन
वनवास के दौरान, चित्रकूट से आगे बढ़ते हुए श्रीराम, सीता और लक्ष्मण गोदावरी नदी के किनारे पंचवटी नामक स्थान पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने सुंदर आश्रम बनाया। फूलों से लदी लताएँ, पक्षियों का कलरव, गोदावरी का मधुर संगीत– सब कुछ इतना रमणीय था कि वनवास भी स्वर्ग सा लगने लगा। राम और लक्ष्मण दिन में ऋषियों की रक्षा करते, रात्रि में आश्रम की सुरक्षा करते। सीता उनके जीवन की धुरी थीं।
एक दिन प्रातःकाल राम और लक्ष्मण गोदावरी स्नान कर लौटे ही थे कि आश्रम के समीप एक विचित्र दृश्य दिखाई दिया। एक अत्यंत कुरूप राक्षसी राम के रूप-सौंदर्य पर मुग्ध होकर उन्हें देख रही थी। उसका नाम था शूर्पणखा, जो रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण की बहन थी। उसके नाखून शूल (सूर्प) जैसे थे, इसी से उसका नाम शूर्पणखा पड़ा। वह इच्छानुसार रूप बदल सकती थी। उसने राम का दिव्य रूप देखा– कमल नेत्र, नीलकमल जैसे शरीर, सुडौल अंग, मधुर वाणी। उसके विपरीत उसका अपना रूप विकट था– लंबा पेट, भयानक आँखें, भयंकर स्वर।
राम के रूप पर मोहित होकर उसके हृदय में कामवासना जागृत हो गई। उसने तुरंत सुंदर स्त्री का रूप धारण किया और राम के समक्ष उपस्थित होकर बोली- “हे पुरुषश्रेष्ठ! आप कौन हैं? राक्षसों के इस भयंकर वन में तपस्वी वेश में कैसे आए? हाथ में धनुष-बाण हैं, साथ में एक स्त्री भी है। ये परस्पर विरोधी बातें हैं। अपना परिचय दीजिए।”
राम ने अपनी सदा की सरलता से उत्तर दिया- “हे देवि! मैं अयोध्या नरेश महाराज दशरथ का ज्येष्ठ पुत्र राम हूँ। मेरे साथ मेरा अनुज लक्ष्मण और मेरी पत्नी, जनक नंदिनी सीता हैं। पिता की आज्ञा से हम चौदह वर्ष के लिए वनवास भोग रहे हैं। अब आप अपना परिचय दें, क्योंकि मुझे प्रतीत होता है कि आप कोई साधारण स्त्री नहीं।”
शूर्पणखा ने सामने रखा विवाह प्रस्ताव
अपना परिचय देते हुए शूर्पणखा ने गर्व से कहा- “मेरा नाम शूर्पणखा है। मैं लंकापति परम प्रतापी रावण की सगी बहन हूँ। मेरे भाई कुम्भकर्ण और विभीषण भी विश्वविख्यात हैं। यहाँ पंचवटी के स्वामी मेरे भाई खर और दूषण हैं, जिनसे संसार में कोई युद्ध करके जीत नहीं सकता। मैं इच्छानुसार सब लोकों में भ्रमण कर सकती हूँ। अब सुनो- तुम्हारी यह पत्नी सीता मेरी दृष्टि में कुरूप, ओछी और विकृत मानवी है। वह तुम्हारे योग्य नहीं। मैं तुम्हारे योग्य हूँ। तुम मेरे पति बन जाओ। मैं तुम्हारे साथ विहार करूँगी और तुम्हारी यह सीता को खा जाऊँगी।”
यह सुनकर श्रीराम मुस्कुराए। उन्होंने कभी क्रोध नहीं किया, केवल हास्य और करुणा से उत्तर दिया – “भद्रे! मैं तो पहले से विवाहित हूँ और मेरी पत्नी मेरे साथ है। परंतु मेरा छोटा भाई लक्ष्मण अविवाहित है। वह युवा, सुंदर, बलवान और शीलवान है। तुम उससे विवाह कर लो। वह तुम्हारे योग्य पति सिद्ध होगा।”
लक्ष्मण के पास प्रस्ताव
राम का इशारा समझकर शूर्पणखा लक्ष्मण के पास पहुँची और बोली- “हे सौंदर्यवान राजकुमार! मैं युवती हूँ और तुम सुंदर हो। मैं तुम्हारे रूप की योग्य पत्नी हूँ। मुझे स्वीकार करो, हम दंडकारण्य में सुखपूर्वक भ्रमण करेंगे।” लक्ष्मण वाक्पटु थे। उन्होंने परिहास में कहा- “हे सुंदरी! मैं तो राम का दास मात्र हूँ। मुझसे विवाह करके तुम दासी बन जाओगी। अच्छा यही होगा कि तुम राम की दासी बन जाओ, अर्थात छोटी रानी बन जाओ। तुम्हारा सौंदर्य राम के ही योग्य है।”
शूर्पणखा ने लक्ष्मण के व्यंग्य को प्रशंसा समझ लिया। वह पुनः राम के पास लौटी और क्रुद्ध होकर बोली- “तुम इस कुरूप सीता के कारण मेरे प्रस्ताव को ठुकरा रहे हो, मेरा अपमान कर रहे हो। पहले मैं इसी को मार डालती हूँ, फिर तुम मेरे पति बनोगे।” यह कहकर उसने विकराल रूप धारण किया और बिजली की गति से सीता पर झपट पड़ी।
शूर्पणखा की नाक काटने का प्रसंग
राम ने तुरंत उसका मार्ग रोक लिया और लक्ष्मण से कहा- “लक्ष्मण! इस दुष्टा से अधिक हास्य-विनोद या वाद-विवाद उचित नहीं। यह जानकी को मार डालती। इस कुलटा और कुरूप राक्षसी को इसके किसी अंग से विहीन कर दो।” लक्ष्मण ने क्षण भर में खड्ग निकाला और शूर्पणखा की नाक और दोनों कान काट दिए। रक्त की धारा बहने लगी। घोर पीड़ा और अपमान से चीत्कार करती हुई शूर्पणखा जंगल की ओर भागी। वह सीधे अपने भाई खर-दूषण के पास जंजीरा नामक स्थान पर पहुँची और उनके चरणों में गिरकर रोने-चीखने लगी।
खर-दूषण ने जब बहन की यह दशा देखी तो क्रोध से पागल हो गए। उन्होंने चौदह हजार राक्षसों की विशाल सेना लेकर पंचवटी पर आक्रमण कर दिया। इसके बाद श्रीराम और लक्ष्मण ने साथ मिलकर अकेले ही राक्षस सेना का संहार किया। दिव्य अस्त्रों से एक-एक करके खर, दूषण, त्रिशिरा आदि सभी महारथी मारे गए। इसके बाद शूर्पणखा रोते हुए लंका चली गई और सारा हाल रावण को बताया। साथ ही अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए कहा और सीता की सुंदरता का बखान करते हुए लंकेश को उन्हें हर लाने के लिए उकसाया।
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(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)