Ma Bhuvneshvari: मां भुवनेश्वरी सनातन धर्म की दस महाविद्याओं में चौथे स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। उन्हें संपूर्ण ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री शक्ति, जगतजननी और सृष्टि की मूल चेतना माना जाता है।
Ma Bhuvneshvari: मां भुवनेश्वरी सनातन धर्म की दस महाविद्याओं में चौथे स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। उन्हें संपूर्ण ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री शक्ति, जगतजननी और सृष्टि की मूल चेतना माना जाता है। "भुवनेश्वरी" शब्द दो भागों से मिलकर बना है "भुवन" अर्थात संपूर्ण जगत या तीनों लोक, और "ईश्वरी" अर्थात स्वामिनी या अधिष्ठात्री देवी। इस प्रकार मां भुवनेश्वरी का अर्थ है "समस्त भुवनों की स्वामिनी।" उनकी उत्पत्ति किसी सामान्य देवी की तरह नहीं मानी जाती, बल्कि वे स्वयं आदिशक्ति का स्वरूप हैं, जिनसे संपूर्ण सृष्टि का विस्तार हुआ।
मां भुवनेश्वरी की उत्पत्ति
शाक्त परंपरा के अनुसार सृष्टि की रचना से पहले केवल अनंत, निराकार और असीम शक्ति विद्यमान थी। उसी परम शक्ति ने स्वयं को विभिन्न रूपों में प्रकट किया, जिनमें एक दिव्य स्वरूप मां भुवनेश्वरी का भी है। वे समय, दिशा, आकाश, पृथ्वी और समस्त ब्रह्मांड को अपने भीतर धारण करने वाली आदिशक्ति हैं। इसलिए उनकी कोई जन्म कथा सामान्य अर्थों में नहीं मिलती, क्योंकि वे स्वयं सृष्टि से पहले विद्यमान थीं। धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि जब सृष्टि की रचना का समय आया, तब आदिशक्ति ने अपने दिव्य तेज से ब्रह्मांड की रचना के लिए एक विशाल चेतना का विस्तार किया। इसी चेतना का स्वरूप मां भुवनेश्वरी कहलाया। उन्होंने ब्रह्मा को सृष्टि निर्माण की शक्ति, भगवान विष्णु को पालन की शक्ति तथा भगवान शिव को संहार की शक्ति प्रदान की। इस प्रकार सृष्टि के तीनों प्रमुख कार्यों के पीछे भी उनकी ही शक्ति कार्य करती है।
देवी भागवत और तांत्रिक परंपरा में क्या है मां का वर्णन
देवी भागवत पुराण तथा तंत्र ग्रंथों में मां भुवनेश्वरी को परम ब्रह्म की शक्ति कहा गया है। वे केवल पृथ्वी ही नहीं, बल्कि अनंत ब्रह्मांडों की अधिष्ठात्री हैं। उनके बिना कोई भी देवता अपनी शक्ति का उपयोग नहीं कर सकता। यही कारण है कि उन्हें "विश्वमाता" और "जगतजननी" भी कहा जाता है।तांत्रिक मान्यताओं के अनुसार मां भुवनेश्वरी का संबंध आकाश तत्व से है। आकाश सभी तत्वों का आधार है और उसी प्रकार मां भुवनेश्वरी संपूर्ण सृष्टि का आधार हैं। वे अनंत विस्तार, स्वतंत्रता और सृजनात्मक ऊर्जा का प्रतीक हैं।
दस महाविद्याओं में स्थान
दस महाविद्याओं की उत्पत्ति की प्रसिद्ध कथा के अनुसार जब भगवान शिव ने माता सती को दक्ष के यज्ञ में जाने से रोका, तब सती ने अपने दिव्य स्वरूप से दस महाविद्याओं को प्रकट किया। इन्हीं दस स्वरूपों में मां भुवनेश्वरी भी प्रकट हुईं। उन्होंने समस्त दिशाओं को अपने तेज से प्रकाशित कर दिया और यह संदेश दिया कि परम शक्ति को कोई सीमित नहीं कर सकता।महाविद्याओं में मां भुवनेश्वरी को सौम्यता, करुणा, मातृत्व और सार्वभौमिक सत्ता का प्रतीक माना जाता है। उनका स्वरूप भक्तों को यह अनुभव कराता है कि संपूर्ण संसार उनकी गोद में सुरक्षित है।
मां भुवनेश्वरी का दिव्य स्वरूप
मां भुवनेश्वरी का वर्ण प्रातःकालीन सूर्य के समान स्वर्णिम या लालिमा लिए हुए बताया गया है। वे रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान रहती हैं। उनके चार हाथ होते हैं। दो हाथों में वे पाश और अंकुश धारण करती हैं, जबकि अन्य दो हाथों से वरद और अभय मुद्रा में भक्तों को आशीर्वाद देती हैं।पाश का अर्थ है जीव को संसार के बंधनों से जोड़ने और आवश्यकता पड़ने पर मुक्त करने की शक्ति। अंकुश मन और इंद्रियों पर नियंत्रण का प्रतीक है। वरद मुद्रा समृद्धि और इच्छापूर्ति का संकेत देती है, जबकि अभय मुद्रा भय से मुक्ति और सुरक्षा का संदेश देती है।
मां भुवनेश्वरी की उपासना का महत्व
मां भुवनेश्वरी की आराधना से मानसिक शांति, आत्मविश्वास, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से उनकी उपासना करता है, उसके जीवन की अनेक बाधाएं दूर होती हैं और परिवार में सुख, शांति तथा सौभाग्य का वास होता है।तांत्रिक साधनाओं में भी मां भुवनेश्वरी का विशेष स्थान है। उनकी साधना से साधक को आत्मबल, एकाग्रता और आध्यात्मिक चेतना की प्राप्ति होती है। हालांकि तांत्रिक साधनाएं सदैव योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करनी चाहिए।