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Udhhav Aur Krishan Story : कौन थे उद्धव? वो गोपियों के पास संदेशवाहक बनकर क्यों गए

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Udhhav Kaun The : श्री कृष्ण के जीवन में कई महत्वपूर्ण लोग थे, और यदुवंश कुल के उद्धव उनमें से एक थे। हालाँकि उनके बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है,

Udhhav Kaun The
Udhhav Kaun The : श्री कृष्ण के जीवन में कई महत्वपूर्ण लोग थे, और यदुवंश कुल के उद्धव उनमें से एक थे। हालाँकि उनके बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, फिर भी उद्धव को श्री कृष्ण का मित्र, साथी और रिश्तेदार माना जाता है; कुछ धर्मग्रंथों में तो उन्हें श्री कृष्ण के चाचा का बेटा भी बताया गया है।

उद्धव कौन थे?

उद्धव बहुत विद्वान व्यक्ति थे और देवताओं के गुरु बृहस्पति के शिष्य थे। जहाँ उन्हें *ज्ञान-योग* (ज्ञान का मार्ग) का विशेषज्ञ माना जाता था, वहीं श्री कृष्ण की दिव्य लीला के दौरान उन्होंने भक्ति की महिमा को भी समझा। उद्धव का रूप-रंग, स्वभाव और बुद्धि श्री कृष्ण से बहुत मिलती-जुलती थी, इसलिए उन्हें स्वयं कृष्ण का ही प्रतिबिंब कहा जाता था। उन्होंने श्री कृष्ण के मुख्य मंत्री और सलाहकार के रूप में भी काम किया। महाभारत के अंत में, जब द्वारका के विनाश का समय निकट आया, तो श्री कृष्ण ने उद्धव को विशेष उपदेश दिए जिन्हें "उद्धव गीता" के नाम से जाना जाता है इनमें भक्ति, वैराग्य और जीवन-मुक्ति से जुड़े गहरे रहस्य बताए गए हैं।

जब उद्धव संदेशवाहक बनकर गोपियों के पास गए

जब श्री कृष्ण मथुरा चले गए और ब्रज की गोपियाँ उनसे मिलने के लिए व्याकुल हो उठीं, तो कृष्ण ने उद्धव को एक संदेश पहुँचाने के लिए भेजा। उद्धव ने गोपियों को ज्ञान-योग का दर्शन समझाने की कोशिश की, लेकिन उनके गहरे प्रेम और भक्ति को देखकर उन्हें एहसास हुआ कि ईश्वर तक पहुँचने का सर्वोच्च मार्ग प्रेम ही है। इस घटना को "उद्धव-संदेश" के नाम से जाना जाता है। कथा के अनुसार, जब उद्धव अपने रथ पर सवार होकर ब्रज पहुँचे, तो उन्होंने पूरे क्षेत्र को कृष्ण से बिछड़ने के दुख में डूबा हुआ पाया। उन्हें देखकर गोपियाँ हैरान रह गईं, क्योंकि उनका रूप और पहनावा काफी हद तक कृष्ण जैसा था। वे दूर से ही उनकी ओर दौड़ीं, लेकिन पास आने पर उन्हें पता चला कि वे कृष्ण नहीं, बल्कि कोई और हैं। तब उद्धव ने अपना परिचय दिया। जब गोपियों ने श्री कृष्ण का हाल-चाल पूछा और उनसे मिलने की अपनी गहरी इच्छा ज़ाहिर की, तो उद्धव ने उन्हें सलाह दी कि वे कृष्ण के प्रति शारीरिक लगाव से ऊपर उठें और मोक्ष पाने के लिए ज्ञान-योग का रास्ता अपनाएँ।

गोपियों की भक्ति देख भावुक हुए उद्धव

ज्ञान-योग  पर उद्धव की बातें सुनकर गोपियाँ मुस्कुराईं और बोलीं, "उद्धव! हम जीवात्मा और परमात्मा के बीच का फ़र्क नहीं समझतीं। हम बस इतना जानती हैं कि परमेश्वर जिन्हें योगी भी नहीं पा सकते गोपियों के प्रेम से खिंचे चले आते हैं और ब्रज में आकर लीलाएँ करते हैं। हम तो बस उस श्याम-सुंदर के चरणों की धूल बनना चाहती हैं जिन्होंने हमारे दिलों में प्रेम का दीपक जलाया है। योग तो उन लोगों के लिए है जिनके दिलों में प्रेम नहीं है।" उन्होंने आगे कहा कि उन्हें मोक्ष नहीं, बल्कि कृष्ण का प्रेम चाहिए। गोपियों की इस निष्कपट, निस्वार्थ और अनन्य भक्ति को देखकर उद्धव की आँखों से आँसू बहने लगे; उन्हें एहसास हुआ कि प्रेम की महिमा ज्ञान से कहीं ज़्यादा है। उद्धव गोपियों की भक्ति से इतने प्रभावित हुए कि वे बोल पड़े, "काश! मैं वृंदावन में कोई झाड़ी या घास का तिनका बन पाता, ताकि मुझे गोपियों के चरणों की धूल मिल पाती।" जब उद्धव वापस लौटे, तो वे सिर्फ़ एक संदेशवाहक नहीं रह गए थे; वे प्रेम-भक्ति के साधक बन चुके थे। मथुरा लौटने पर उन्होंने श्री कृष्ण से कहा, "प्रभु, मुझे ब्रज भेजकर आपने मुझे प्रेम का असली अर्थ समझाया। अब मैं समझ गया हूँ कि सच्चा योग प्रेम का योग ही है।"

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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