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Importance Of Paramdham: परमधाम क्या है? जानिए परमधाम कैसे प्राप्त किया जाता है?

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Paramdham Kya Hai: "परमधाम"  नाम से ही पता चलता है कि यह सभी धामों में सबसे ऊँचा है। भगवद गीता में परमधाम का वर्णन करते हुए श्री कृष्ण कहते हैं

Paramdham Kya Hai:
Paramdham Kya Hai: "परमधाम"  नाम से ही पता चलता है कि यह सभी धामों में सबसे ऊँचा है। भगवद गीता में परमधाम का वर्णन करते हुए श्री कृष्ण कहते हैं "न तो सूर्य, न चंद्रमा और न ही अग्नि इसे प्रकाशित करते हैं; वहाँ पहुँचने के बाद कोई वापस नहीं आतावही मेरा सर्वोच्च धाम है।" इसका अर्थ है कि परमधाम एक ऐसा धाम है जो न तो सूर्य, न चंद्रमा और न ही अग्नि से प्रकाशित होता है। एक बार जब कोई आत्मा वहाँ पहुँच जाती है, तो वह भौतिक संसार में वापस नहीं आती। शास्त्रों के अनुसार, परमधाम ईश्वर का सर्वोच्च धाम है एक ऐसी अवस्था जिसे मोक्ष, सद्गति, या जीवात्मा का परमात्मा से मिलन भी कहा जाता है। इसे प्राप्त करने पर आत्मा का संसार में पुनर्जन्म नहीं होता। वैष्णव परंपरा में इसे "गोलोक धाम" कहा जाता है, जबकि शैव परंपरा में इसे "कैवल्य पद" के नाम से जाना जाता है।

परमधाम क्या है?

"परमधाम" की अवधारणा विभिन्न दर्शनों में थोड़े अलग-अलग रूपों में मिलती है। कुछ विचारधाराओं के अनुसार, परमधाम केवल मृत्यु के बाद प्राप्त होने वाला स्थान नहीं है, बल्कि परम शांति और ईश्वर-साक्षात्कार की वह अवस्था है जिसे इसी जीवन में प्राप्त किया जा सकता है। परमधाम की व्याख्या मोक्ष,ब्रह्मलोक, वैकुंठ, गोलोक या शिवधाम के रूप में की जाती है। यह वह अवस्था है जहाँ आत्मा कर्मों के बंधन से मुक्त होकर परमात्मा में विलीन हो जाती है। उपनिषदों के अनुसार, "ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति"अर्थात्, "जो ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है।" यही परमधाम की प्राप्ति है। भक्ति परंपरा में, परमधाम वह दिव्य लोक है जहाँ भक्त को ईश्वर की शाश्वत सेवा और सान्निध्य प्राप्त होता है। आध्यात्मिक दृष्टि से, परमधाम कोई भौतिक स्थान नहीं बल्कि चेतना की सर्वोच्च अवस्था है। इसे भक्ति, ज्ञान, निस्वार्थ कर्म और योग के माध्यम से प्राप्त किया जाता है।

परमधाम कैसे प्राप्त किया जाता है?

परमधाम एक आध्यात्मिक अवधारणा है जो परमात्मा के निवास स्थान को दर्शाती है वह सर्वोच्च अवस्था या लोक जहाँ जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर आत्मा शाश्वत शांति, आनंद और सत्य में स्थित हो जाती है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।" इसका अर्थ है, "सभी कर्तव्यों या धार्मिक अनुष्ठानों को त्यागकर केवल मेरीशरण में आओ; मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा।" इसका तात्पर्य यह है कि जीव 'अनन्य भक्ति' के माध्यम से परमधाम को प्राप्त करता है। दिव्य नाम के जप, कीर्तन , ध्यान और सत्संग के माध्यम से साधक स्वयं को परमधाम प्राप्त करने के योग्य बना सकता है। दूसरा मार्ग ज्ञान का मार्ग है। आत्मा अपने अहंकार और अज्ञान को मिटाकर ही ब्रह्म में विलीन हो सकती है।

अद्वैत वेदांत में, परमधाम का अर्थ ब्रह्म-ज्ञान की अवस्था को प्राप्त करना है। परमधाम प्राप्त करने का तीसरा मार्ग कर्म योग है। शास्त्रों के अनुसार, निष्काम कर्म अर्थात फल की आसक्ति के बिना कर्म करने के माध्यम से परमधाम प्राप्त किया जा सकता है। शुद्ध कर्म आंतरिक चेतना को शुद्ध करता है, और आत्मा परमधाम की ओर अग्रसर होती है। चौथा मार्ग योग का मार्ग है। ध्यान, प्राणायाम  और समाधि  जैसी साधनाएँ मन को स्थिर करती हैं और आत्मा को परमात्मा से जोड़ती हैं। योगी मृत्यु के समय परमात्मा का स्मरण करके परमधाम को प्राप्त करता है। केवल वही व्यक्ति परमधाम का अधिकारी बनता है जो भक्ति, ज्ञान, कर्म और योग का संतुलित समन्वय अपनाता है।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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