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Bhagvan Vishnu:भगवान विष्णु के पास कौन सी तलवार थी जानिए इस तलवार का उपयोग कब हुआ था

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Bhagvan Vishnu: सनातन हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनकर्ता माना गया है। जब भी संसार में पाप और अधर्म बढ़ता है, तब वे धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेते हैं। 

Bhagvan Vishnu:
Bhagvan Vishnu: सनातन हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनकर्ता माना गया है। जब भी संसार में पाप और अधर्म बढ़ता है, तब वे धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेते हैं। आमतौर पर भगवान विष्णु के हाथों में चार मुख्य आयुध दिखाई देते हैं शंख (पांचजन्य), चक्र, गदा और पद्म । लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इन चारों आयुधों के अलावा भगवान विष्णु के पास एक अत्यंत दिव्य, चमकीली और शक्तिशाली तलवार भी है, जिसका नाम 'नन्दक'  है।

भगवान विष्णु की दिव्य तलवार

भगवान विष्णु की इस तलवार को 'नन्दक' कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है  "आनंद देने वाली" या "प्रसन्नता का स्रोत"। हालांकि यह तलवार असुरों और अधर्मियों के लिए विनाश का काल है, लेकिन धर्मपरायण लोगों और भक्तों के लिए यह आनंद और अभय प्रदान करने वाली है।अग्नि पुराण और विष्णु पुराण जैसे ग्रंथों में नन्दक तलवार का विशेष उल्लेख मिलता है। यह तलवार साधारण लोहे या धातु की नहीं बनी है, बल्कि यह साक्षात 'ज्ञान' का प्रतीक है, जो संसार से अज्ञान रूपी अंधकार को काटती है।

 नन्दक तलवार की उत्पत्ति की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में जब ब्रह्मा जी यज्ञ कर रहे थे, तब 'लोहासुर' नाम का एक भयानक राक्षस उनके यज्ञ में विघ्न डालने आया। वह राक्षस अत्यंत शक्तिशाली था और उसे किसी भी सामान्य अस्त्र-शस्त्र से मारना असंभव था।उस समय भगवान विष्णु यज्ञ की रक्षा के लिए वहां प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने यज्ञ की अग्नि से एक अत्यंत तेजस्वी और चमकीली शक्ति प्रकट की, जिसने एक दिव्य तलवार का रूप ले लिया। ब्रह्मा जी ने वह तलवार भगवान विष्णु को सौंप दी। विष्णु जी ने उस तलवार को धारण किया और पल भर में ही लोहासुर का वध कर दिया। वध के बाद उस असुर के शरीर के हिस्से जहां-जहां गिरे, वहां-वहां पृथ्वी पर विभिन्न धातुओं की खदानें बनीं। इस प्रकार इस दिव्य तलवार का नाम 'नन्दक' पड़ा और यह विष्णु जी के मुख्य अस्त्रों में शामिल हो गई।

नन्दक तलवार का आध्यात्मिक महत्व

 विष्णु पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु की नन्दक तलवार साक्षात विद्या और विवेक का प्रतीक है। जिस प्रकार एक तेज तलवार किसी वस्तु को दो भागों में काट देती है, उसी प्रकार ईश्वर का ज्ञान मनुष्य के भीतर छिपे अज्ञान, मोह और माया के बंधनों को काट देता है। विष्णु पुराण में एक श्लोक आता है जिसमें बताया गया है कि भगवान विष्णु के आभूषण और अस्त्र ब्रह्मांड के अलग-अलग तत्वों को दर्शाते हैं। इसमें नन्दक तलवार को 'ज्ञान' और इसकी म्यान को 'अज्ञान'  का रूप माना गया है। जब तलवार म्यान से बाहर निकलती है, तो ज्ञान का प्रकाश होता है और अज्ञान का अंत हो जाता है।

भगवान विष्णु के किस अवतार ने किया नन्दक का उपयोग?


1. श्री कृष्ण अवतार में नन्दक

महाभारत और श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, श्री कृष्ण के पास उनके प्रसिद्ध सुदर्शन चक्र और कौमोदकी गदा के साथ-साथ नन्दक तलवार भी थी। हालांकि श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध में हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा की थी, लेकिन द्वारका के अन्य युद्धों (जैसे शाल्व और पौंड्रक के विरुद्ध) में इस दिव्य तलवार का संदर्भ आता है।

 2. राम अवतार में कोदंड और तलवार

भगवान श्री राम मुख्य रूप से अपने 'कोदंड' धनुष के लिए जाने जाते हैं। लेकिन रावण के साथ अंतिम युद्ध और राक्षसों के संहार के समय उनके पास भी विष्णु के अंश रूप में इस तलवार की दिव्य शक्ति निहित थी।

 3. भविष्य का कल्कि अवतार

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कलयुग के अंत में जब भगवान विष्णु अपना दसवां अवतार **'कल्कि अवतार'** लेंगे, तब वे देवदत्त नाम के सफेद घोड़े पर सवार होकर आएंगे। उनके हाथ में जो चमचमाती हुई दिव्य तलवार होगी, वह साक्षात 'नन्दक' ही होगी। कल्कि देव इसी तलवार से कलयुग के समस्त पापियों, म्लेच्छों और अधर्म का समूल नाश करके पुनः 'सत्ययुग' की स्थापना करेंगे।

दक्षिण भारत की परंपराओं में नन्दक

दक्षिण भारतीय वैष्णव परंपरा में, विशेषकर अलवार संतों के साहित्य में, भगवान विष्णु के आयुधों को बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है। ऐसा माना जाता है कि महान वैष्णव संत और दार्शनिक **'श्री अनन्ताचार्य'** और कुछ अन्य दक्षिण भारतीय संतों को भगवान विष्णु की इसी 'नन्दक' तलवार का अवतार माना जाता है। तिरुपति बालाजी मंदिर और दक्षिण के अन्य प्रसिद्ध विष्णु मंदिरों की मूर्तियों और उत्सवों में नन्दक तलवार का पूजन विशेष रूप से किया जाता है।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 

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