Lord Ganesha Puja: पुराणों के अनुसार भगवान शिव के वरदान के बाद ब्रह्मा, भगवान विष्णु, इंद्र सहित सभी देवताओं ने भगवान गणेश को प्रथम पूज्य के रूप में स्वीकार किया।
Lord Ganesha Mythological Story: सनातन धर्म में किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ, पूजा, विवाह, गृह प्रवेश, व्रत या धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से ही की जाती है। इसी कारण उन्हें "प्रथम पूज्य" और "विघ्नहर्ता" कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में भगवान गणेश को सबसे पहले पूजे जाने के पीछे एक अत्यंत प्रसिद्ध पौराणिक कथा का वर्णन मिलता है। यह कथा भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान कार्तिकेय तथा समस्त देवताओं से जुड़ी हुई है। इसी घटना के बाद भगवान गणेश को यह वरदान प्राप्त हुआ कि संसार में किसी भी शुभ कार्य से पहले उनकी ही पूजा की जाएगी। आइए जानते हैं कि आखिर भगवान गणेश को प्रथम पूज्य बनने का सम्मान कैसे मिला।
माता पार्वती ने कैसे किया भगवान गणेश का सृजन
शिव पुराण के अनुसार एक बार भगवान शिव कैलाश से बाहर गए हुए थे। उसी समय माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने अपने शरीर पर लगे उबटन से एक बालक का निर्माण किया और उसमें प्राण स्थापित कर दिए। यही बालक आगे चलकर भगवान गणेश कहलाए। माता पार्वती ने गणेश को आदेश दिया कि जब तक वह स्नान करके बाहर न आएं, तब तक किसी भी व्यक्ति को भीतर प्रवेश न करने दें। गणेश ने माता की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए द्वार पर पहरा देना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद भगवान शिव कैलाश लौटे और अपने भवन में प्रवेश करना चाहा। गणेश ने उन्हें रोक दिया। भगवान शिव ने स्वयं को घर का स्वामी बताया, लेकिन गणेश ने स्पष्ट कहा कि माता पार्वती की अनुमति के बिना किसी को भी अंदर नहीं जाने दिया जाएगा।
भगवान शिव और गणेश के बीच हुआ संघर्ष
गणेश के रोकने पर भगवान शिव ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, लेकिन गणेश अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे। इसके बाद भगवान शिव के गणों ने भी गणेश को हटाने की कोशिश की, किंतु वे सफल नहीं हो सके। गणेश ने अकेले ही सभी गणों का सामना किया। जब स्थिति अधिक गंभीर हो गई तो स्वयं भगवान शिव को युद्ध करना पड़ा। अंततः भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया। द्वार पर गणेश का शरीर गिर गया।
माता पार्वती का क्रोध और देवताओं की चिंता
जब माता पार्वती स्नान करके बाहर आईं और उन्होंने अपने पुत्र की यह अवस्था देखी तो उनका क्रोध अत्यंत प्रबल हो गया। उन्होंने अपने दिव्य शक्तिरूपों को प्रकट कर दिया। उनके क्रोध से तीनों लोकों में भय का वातावरण बन गया। देवताओं, ऋषियों और समस्त लोकों ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि किसी भी प्रकार माता पार्वती को शांत किया जाए। माता पार्वती ने स्पष्ट कहा कि यदि उनके पुत्र को पुनर्जीवित नहीं किया गया तो वे अपनी शक्ति से संपूर्ण सृष्टि का विनाश कर देंगी।
गज का मस्तक लगाकर भगवान गणेश को मिला नया जीवन
भगवान शिव ने अपने गणों को उत्तर दिशा की ओर भेजा और आदेश दिया कि जो भी पहला जीव दिखाई दे, उसका मस्तक लेकर आएं। गणों को सबसे पहले एक हाथी का शिशु दिखाई दिया। वे उसका मस्तक लेकर कैलाश पहुंचे। भगवान शिव ने उस हाथी का मस्तक गणेश के धड़ पर स्थापित किया और अपने दिव्य वरदान से उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। इस प्रकार भगवान गणेश गजानन स्वरूप में प्रकट हुए। माता पार्वती का क्रोध शांत हुआ और समस्त देवताओं ने भगवान गणेश का अभिनंदन किया।
भगवान शिव ने दिया प्रथम पूज्य होने का वरदान
भगवान शिव ने इस घटना के बाद समस्त देवताओं के समक्ष घोषणा की कि गणेश उनके पुत्र होने के साथ-साथ देवताओं में अग्रपूज्य होंगे। उन्होंने कहा कि पृथ्वी, स्वर्ग और समस्त लोकों में किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ, हवन, पूजा, व्रत, विवाह या मांगलिक कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा के बिना पूर्ण नहीं मानी जाएगी। शिव पुराण में वर्णित है कि भगवान शिव ने यह भी वरदान दिया कि जो व्यक्ति सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करेगा, उसके कार्यों में आने वाले विघ्न दूर होंगे और उसके धार्मिक अनुष्ठान सफलतापूर्वक संपन्न होंगे। इसी घोषणा के बाद भगवान गणेश को "प्रथम पूज्य" के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
एक अन्य पौराणिक कथा भी है प्रसिद्ध
गणेश पुराण और लोक परंपराओं में एक अन्य कथा का भी उल्लेख मिलता है। एक बार भगवान शिव और माता पार्वती ने भगवान गणेश तथा भगवान कार्तिकेय के सामने एक परीक्षा रखी। उन्होंने कहा कि जो पहले संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा करके लौट आएगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा। भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर बैठकर पूरे ब्रह्मांड की यात्रा के लिए निकल पड़े। दूसरी ओर भगवान गणेश ने अपने माता-पिता के चारों ओर सात बार परिक्रमा की।
जब भगवान शिव ने इसका कारण पूछा तो गणेश ने कहा कि शास्त्रों के अनुसार माता-पिता ही संपूर्ण सृष्टि के समान हैं। उनकी परिक्रमा करना पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा के समान माना गया है। भगवान शिव और माता पार्वती गणेश के इस उत्तर से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें श्रेष्ठ घोषित किया और यह वरदान दिया कि समस्त देवताओं से पहले उनकी पूजा की जाएगी। यह कथा भी भगवान गणेश के प्रथम पूज्य होने का एक प्रमुख धार्मिक आधार मानी जाती है।
सभी देवताओं ने स्वीकार किया प्रथम पूज्य का सम्मान
पुराणों के अनुसार भगवान शिव के वरदान के बाद ब्रह्मा, भगवान विष्णु, इंद्र सहित सभी देवताओं ने भगवान गणेश को प्रथम पूज्य के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद से प्रत्येक यज्ञ, देव पूजन, हवन, कथा, संस्कार और मांगलिक कार्य में सबसे पहले गणेश वंदना की परंपरा स्थापित हो गई। यही कारण है कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के प्रारंभ में "श्री गणेशाय नमः" का उच्चारण किया जाता है और गणपति का आह्वान करके ही आगे की पूजा शुरू की जाती है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)