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Shiv Ji: भगवान शिव की पूजा में क्यों नहीं बजाया जाता है शंख, शिव पुराण में किया गया है जिक्र

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Shiv Ji: सनातन धर्म में सभी वैदिक कार्यों में शंख का विशेष स्थान है। सुख, समृद्धि और सौभाग्य लाने वाले शंख को भारतीय संस्कृति में शुभ प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया है। शंख भगवान विष्णु का प्रमुख अस्त्र है।

Shiv Ji
Shiv Ji: सनातन धर्म में सभी वैदिक कार्यों में शंख का विशेष स्थान है। सुख, समृद्धि और सौभाग्य लाने वाले शंख को भारतीय संस्कृति में शुभ प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया है। शंख भगवान विष्णु का प्रमुख अस्त्र है। शंख की ध्वनि आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न होती है। शास्त्रों के अनुसार शंख की उत्पत्ति शंखचूर्ण की हड्डियों से हुई है, इसलिए इसे पवित्र वस्तुओं में सबसे पवित्र और सभी शुभ वस्तुओं में सबसे शुभ माना जाता है।

जिस तरह भगवान विष्णु को शंख बहुत प्रिय है और शंख से जल चढ़ाने पर भगवान विष्णु बहुत प्रसन्न होते हैं, उसी तरह भगवान शिव की पूजा में शंख का प्रयोग वर्जित माना जाता है। जिसके कारण न तो महादेव को शंख का जल चढ़ाया जाता है और न ही शिव की पूजा में शंख बजाया जाता है। आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा।

भगवान शिव की पूजा में क्यों नहीं बजाया जाता शंख


 
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शिवपुराण की कथा के अनुसार दैत्यराज दंभ के कोई संतान नहीं थी। उसने संतान प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की थी। दैत्यराज की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वरदान मांगने को कहा। तब दंभ ने पराक्रमी पुत्र का वरदान मांगा। विष्णु जी 'तथास्तु' कहकर अंतर्ध्यान हो गए। इसके बाद दंभ को पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम शंखचूड़ रखा गया।

ब्रह्मा जी ने उसे श्री कृष्ण कवच दिया

युवा होने पर शंखचूड़ ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए पुष्कर में घोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव ने उसे वरदान मांगने को कहा, तब शंखचूड़ ने वरदान मांगा कि वह देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कहकर उसे श्री कृष्ण कवच दिया जिससे तीनों लोकों में सौभाग्य की प्राप्ति होगी। इसके बाद ब्रह्मा जी ने शंखचूड़ की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे धर्मध्वज की पुत्री तुलसी से विवाह करने का आदेश दिया और अंतर्ध्यान हो गए। ब्रह्मा जी की अनुमति से तुलसी और शंखचूड़ का विवाह संपन्न हुआ।

शिवजी भी उसे नहीं मार पाए थे

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ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त करने के बाद शंखचूड़ अहंकारी हो गया और उसने तीनों लोकों पर अपना स्वामित्व स्थापित कर लिया। शंखचूड़ से परेशान देवताओं ने विष्णुजी से सहायता मांगी, लेकिन भगवान विष्णु ने स्वयं अहंकार से ग्रसित शंखचूड़ को पुत्र का वरदान दिया था, इसलिए विष्णुजी ने शंकरजी की आराधना की, जिसके बाद शिवजी देवताओं की रक्षा के लिए निकल पड़े, लेकिन श्री कृष्ण कवच और तुलसी की पतिव्रता के कारण शिवजी भी उसे नहीं मार पाए।

हड्डियों से उत्पन्न हुआ शंख

इसके बाद विष्णुजी ने ब्राह्मण का रूप धारण कर दैत्यराज से श्री कृष्ण कवच दान में ले लिया और शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी के शील का हरण कर लिया। इसके बाद भगवान शिव ने विजय नामक अपने त्रिशूल से शंखचूड़ का वध कर दिया। शंखचूड़ की हड्डियों से शंख उत्पन्न हुआ, जिसका जल शंकर को छोड़कर सभी देवताओं के लिए शुभ माना जाता है।

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