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Ramayana: हनुमान जी ने कैसे किया सुरसा का सामना? जानें बुद्धि और भक्ति की परीक्षा में कैसे हुए सफल

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Ramayana Story: लंका की ओर जाते समय हनुमान जी के मार्ग में कई प्रकार की बाधाएं आईं। इनमें से एक थी नागमाता सुरसा, जिनके साथ हुआ प्रसंग रामायण की सबसे रोचक और प्रसिद्ध घटनाओं में से एक माना जाता है। 

Ramayana Mythological Story:
Ramayana Mythological Story: रामायण के सुंदरकांड में वर्णित हनुमान जी की लंका यात्रा अनेक अद्भुत घटनाओं से भरी हुई है। जब रावण माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले गया, तब भगवान श्रीराम ने उनकी खोज का दायित्व वानर सेना को सौंपा। लंबे प्रयासों के बाद यह ज्ञात हुआ कि माता सीता लंका में हैं, लेकिन उनके पास पहुंचने के लिए सौ योजन विस्तृत समुद्र को पार करना आवश्यक था। ऐसे समय में जाम्बवान के स्मरण कराने पर हनुमान जी ने अपने दिव्य बल को पहचाना और श्रीराम का नाम लेकर समुद्र लांघने के लिए प्रस्थान किया।

लंका की ओर जाते समय हनुमान जी के मार्ग में कई प्रकार की बाधाएं आईं। इनमें से एक थी नागमाता सुरसा, जिनके साथ हुआ प्रसंग रामायण की सबसे रोचक और प्रसिद्ध घटनाओं में से एक माना जाता है। यह कथा उस समय की है, जब श्रीराम के दूत के रूप में हनुमान जी माता सीता की खोज में समुद्र पार करके लंका जा रहे थे। इसी यात्रा के दौरान देवताओं ने उनकी परीक्षा लेने का विचार किया और सुरसा को उनके मार्ग में भेजा। वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में वर्णित यह प्रसंग हनुमान जी की अद्भुत बुद्धि, धैर्य, चतुराई और अपने प्रभु श्रीराम के कार्य के प्रति अटूट समर्पण को दर्शाता है। आइए जानते हैं कि सुरसा कौन थीं और हनुमान जी ने उनका सामना कैसे किया।

सीता की खोज के लिए समुद्र पार करने निकले थे हनुमान जी

जब माता सीता का रावण द्वारा हरण कर लिया गया, तब उनकी खोज के लिए वानर सेना को चारों दिशाओं में भेजा गया। दक्षिण दिशा में गए दल में अंगद, जाम्बवान और हनुमान जी भी शामिल थे। समुद्र तट पर पहुंचने के बाद यह प्रश्न खड़ा हुआ कि विशाल समुद्र को पार करके लंका कौन जाएगा। तब जाम्बवान ने हनुमान जी को उनकी शक्तियों का स्मरण कराया।

अपने बल का स्मरण होते ही हनुमान जी विशाल रूप धारण करके महेंद्र पर्वत पर चढ़े और श्रीराम का स्मरण करते हुए लंका की ओर उड़ चले। उनकी यह यात्रा केवल शारीरिक शक्ति की नहीं थी, बल्कि अनेक परीक्षाओं से भरी हुई थी। देवता भी यह देखना चाहते थे कि श्रीराम के दूत के रूप में हनुमान जी कितनी बुद्धिमत्ता और संयम का परिचय देते हैं।

देवताओं ने क्यों ली हनुमान जी की परीक्षा?

जब हनुमान जी आकाश मार्ग से समुद्र पार कर रहे थे, तब देवताओं, ऋषियों और सिद्धों ने उन्हें देखा। सभी उनके पराक्रम से प्रसन्न थे, लेकिन वे यह भी जानना चाहते थे कि हनुमान जी केवल बलवान ही नहीं, बल्कि बुद्धिमान और धैर्यवान भी हैं या नहीं। इसी उद्देश्य से उन्होंने नागमाता सुरसा से अनुरोध किया कि वे हनुमान जी की परीक्षा लें। देवताओं की आज्ञा पाकर सुरसा समुद्र के मध्य प्रकट हुईं और उन्होंने एक भयंकर राक्षसी का रूप धारण कर लिया।

कौन थीं सुरसा?

पौराणिक कथाओं के अनुसार सुरसा नागों की माता मानी जाती हैं। उनका उल्लेख अनेक ग्रंथों में मिलता है। वे किसी साधारण राक्षसी की तरह नहीं थीं, बल्कि दिव्य शक्तियों से संपन्न थीं। देवताओं के अनुरोध पर उन्होंने हनुमान जी की परीक्षा लेने का दायित्व स्वीकार किया। उनका उद्देश्य हनुमान जी को हानि पहुंचाना नहीं था, बल्कि उनके धैर्य और बुद्धि की परीक्षा लेना था।

समुद्र के बीच प्रकट हुईं सुरसा

जब हनुमान जी तीव्र गति से लंका की ओर बढ़ रहे थे, तभी अचानक समुद्र के बीच एक विशालकाय स्त्री उनके सामने प्रकट हुई। उनका रूप अत्यंत भयावह था। उन्होंने हनुमान जी का मार्ग रोक लिया। सुरसा ने कहा कि उन्हें ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त है कि उनके सामने आने वाला कोई भी प्राणी उनके मुख में प्रवेश किए बिना आगे नहीं जा सकता।,इसलिए हनुमान जी को पहले उनके मुख में प्रवेश करना होगा, तभी वे आगे जा सकेंगे।

हनुमान जी ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया कि वे अयोध्या के राजा श्रीराम के दूत हैं और एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य के लिए जा रहे हैं। उन्होंने सुरसा से अनुरोध किया कि वे उन्हें जाने दें। उन्होंने कहा कि माता सीता की खोज करके लौटने के बाद वे स्वयं उनके मुख में प्रवेश कर लेंगे, लेकिन सुरसा ने उनकी बात स्वीकार नहीं की और कहा कि उन्हें अभी उनके मुख में प्रवेश करना ही होगा।

हनुमान जी ने पहले अपनाया विनम्रता का मार्ग

सुरसा के सामने हनुमान जी ने तुरंत बल का प्रयोग नहीं किया। उन्होंने पहले उन्हें समझाने का प्रयास किया। उन्होंने बार-बार विनती की कि वे श्रीराम का कार्य पूर्ण करने के लिए जा रहे हैं और समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। किन्तु सुरसा अपने निर्णय पर अडिग रहीं। उन्होंने कहा कि ब्रह्मा के वरदान के अनुसार वे किसी को बिना अपने मुख में प्रवेश किए आगे नहीं जाने देंगी। जब हनुमान जी ने देखा कि केवल निवेदन से मार्ग नहीं खुलेगा, तब उन्होंने स्थिति के अनुसार उपाय करने का विचार किया।

शुरू हुई आकार बढ़ाने की अद्भुत लीला

सुरसा ने अपना मुख अत्यंत विशाल कर लिया और कहा कि अब वे उनके मुख में प्रवेश करें। यह देखकर हनुमान जी ने भी अपना शरीर बड़ा कर लिया। उनका रूप कई योजन तक फैल गया। तब सुरसा ने अपना मुख उससे भी बड़ा कर लिया। हनुमान जी ने फिर अपना आकार बढ़ाया। सुरसा ने भी अपने मुख को और विशाल बना लिया।

इस प्रकार दोनों के बीच अद्भुत दृश्य उत्पन्न हो गया। जैसे-जैसे हनुमान जी अपने शरीर का विस्तार करते गए, वैसे-वैसे सुरसा भी अपना मुख बढ़ाती चली गईं।रामायण में वर्णन मिलता है कि हनुमान जी ने अपना शरीर कई योजन लंबा कर लिया और सुरसा ने उससे भी बड़ा मुख बना लिया। यह क्रम लगातार चलता रहा।

बुद्धि से निकाला समाधान

कुछ समय तक यह लीला चलने के बाद हनुमान जी ने समझ लिया कि केवल आकार बढ़ाने से यह परीक्षा समाप्त नहीं होगी, तब उन्होंने अपनी बुद्धि का प्रयोग किया। अचानक उन्होंने अपना विशाल रूप छोड़ दिया और क्षणभर में स्वयं को अत्यंत छोटा बना लिया। उनका आकार अंगूठे के बराबर हो गया। इसके बाद वे तीव्र गति से उड़ते हुए सीधे सुरसा के विशाल मुख में प्रवेश कर गए और उसी क्षण बाहर भी निकल आए। मुख से बाहर आते ही उन्होंने हाथ जोड़कर कहा कि वे उनके मुख में प्रवेश कर चुके हैं, इसलिए उनकी शर्त पूरी हो गई। अब उन्हें श्रीराम के कार्य के लिए आगे जाने की अनुमति दी जाए।

सुरसा ने प्रकट किया अपना वास्तविक स्वरूप

हनुमान जी की चतुराई और बुद्धिमत्ता देखकर सुरसा अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने तुरंत अपना भयंकर रूप त्याग दिया और अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप में प्रकट हुईं। उन्होंने बताया कि वे देवताओं के कहने पर उनकी परीक्षा लेने आई थीं। हनुमान जी ने जिस प्रकार धैर्य, विनम्रता और बुद्धि का परिचय दिया, उससे वे अत्यंत संतुष्ट हैं। सुरसा ने हनुमान जी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि उनका कार्य अवश्य सफल होगा और वे माता सीता का पता लगाकर सकुशल लौटेंगे।

हनुमान जी आगे बढ़े लंका की ओर

सुरसा का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद हनुमान जी पुनः लंका की ओर चल पड़े। उन्होंने मार्ग में आने वाली इस परीक्षा को सफलतापूर्वक पार कर लिया था। इसके बाद भी उनकी यात्रा समाप्त नहीं हुई। आगे उन्हें सिंहिका नामक राक्षसी का सामना करना पड़ा, जिसने उनकी छाया पकड़कर उन्हें रोकने का प्रयास किया। हनुमान जी ने उसका वध किया और अंततः लंका पहुंचकर माता सीता का पता लगाया।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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