Ramayana Mythological Story: सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों रामायण, पुराणों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में लंकापति रावण का वर्णन एक अत्यंत विद्वान, पराक्रमी और शिवभक्त राजा के रूप में मिलता है। रावण केवल एक साधारण राक्षस राजा नहीं था, बल्कि वह वेदों का ज्ञाता, महान तपस्वी और असाधारण शक्तियों का स्वामी था। उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक की कथा अनेक रहस्यों और घटनाओं से जुड़ी हुई है।
रामायण की कथा में रावण को अधर्म का प्रतीक माना जाता है, किंतु उसके जन्म का रहस्य और उसकी मृत्यु के पीछे छिपा श्राप भी उतना ही रोचक है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार रावण का जन्म केवल एक राक्षस के रूप में नहीं हुआ था, बल्कि उसके पूर्वजन्म और अनेक श्रापों का संबंध उसके जीवन से जुड़ा हुआ था। आइए विस्तार से जानते हैं कि रावण का जन्म कैसे हुआ और कौन सा श्राप अंततः उसकी मृत्यु का कारण बना।
कौन थे रावण के माता-पिता?
पौराणिक कथाओं के अनुसार रावण के पिता महर्षि विश्रवा थे। महर्षि विश्रवा महान ऋषि पुलस्त्य के पुत्र थे। पुलस्त्य ब्रह्माजी के मानस पुत्रों में से एक माने जाते हैं। इस प्रकार रावण का वंश ब्रह्मा से जुड़ा हुआ था। रावण की माता का नाम कैकसी था। कैकसी राक्षसराज सुमाली की पुत्री थीं। सुमाली चाहता था कि उसके वंश में ऐसा पुत्र जन्म ले जो अत्यंत शक्तिशाली हो और देवताओं को पराजित करने में सक्षम हो। इसी उद्देश्य से उसने अपनी पुत्री कैकसी को महर्षि विश्रवा के पास भेजा। कैकसी ने महर्षि विश्रवा से विवाह किया और उनसे चार संतानें उत्पन्न हुईं- रावण, कुंभकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा।
रावण के जन्म की कथा
कथा के अनुसार जब कैकसी महर्षि विश्रवा के पास पहुंचीं, उस समय संध्या का समय था। धार्मिक मान्यताओं में संध्या काल को तप और साधना का समय माना जाता है। महर्षि विश्रवा ने कैकसी से कहा कि वह ऐसे समय पर पुत्र प्राप्ति की इच्छा लेकर आई हैं जो शुभ नहीं माना जाता। महर्षि ने बताया कि इस समय की गई कामना से उत्पन्न संतानें अत्यंत बलशाली तो होंगी, लेकिन उनमें उग्र स्वभाव भी होगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उनकी एक संतान धर्मनिष्ठ और सदाचारी होगी। समय आने पर कैकसी ने रावण को जन्म दिया। उसके बाद कुंभकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा का जन्म हुआ। महर्षि की भविष्यवाणी के अनुसार विभीषण धर्मपरायण निकले, जबकि रावण और कुंभकर्ण अत्यंत शक्तिशाली तथा उग्र स्वभाव वाले बने।
रावण का वास्तविक नाम क्या था?
धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि रावण का वास्तविक नाम दशग्रीव था। जन्म के समय उसके दस सिर नहीं थे, लेकिन वह असाधारण प्रतिभा और ज्ञान का स्वामी था। बाद में कठोर तपस्या के दौरान उसने बार-बार अपने सिरों का बलिदान ब्रह्माजी को अर्पित किया। प्रत्येक बार ब्रह्माजी की कृपा से उसका सिर पुनः स्थापित हो जाता था। इसी कारण उसे दशानन भी कहा जाने लगा।
"रावण" नाम उसे बाद में प्राप्त हुआ। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार जब उसने कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया, तब भगवान शिव ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत को दबा दिया। पर्वत के नीचे दबकर वह पीड़ा से जोर-जोर से चिल्लाने लगा। उसकी गर्जना से तीनों लोक गूंज उठे। तब भगवान शिव ने उसे "रावण" नाम दिया, जिसका अर्थ है- जो अपनी गर्जना से संसार को कंपा दे।
कैसे प्राप्त की ब्रह्माजी से वरदान?
युवावस्था में रावण ने अपने भाइयों के साथ घोर तपस्या की। उसने हजारों वर्षों तक कठोर तप कर ब्रह्माजी को प्रसन्न किया। कथा के अनुसार उसने एक-एक करके अपने सिरों को काटकर ब्रह्माजी को अर्पित कर दिया। जब वह अपना अंतिम सिर भी अर्पित करने वाला था, तब ब्रह्माजी प्रकट हुए और उससे वरदान मांगने को कहा। रावण ने अमरता की कामना की, लेकिन ब्रह्माजी ने स्पष्ट किया कि सृष्टि में जन्म लेने वाला कोई भी प्राणी अमर नहीं हो सकता। तब रावण ने देवता, दानव, गंधर्व, यक्ष, नाग और अन्य शक्तिशाली प्राणियों से अवध्य होने का वरदान मांगा।
रावण ने मनुष्यों और वानरों को तुच्छ समझकर उनसे सुरक्षा का वरदान नहीं मांगा। यही उसकी सबसे बड़ी भूल मानी जाती है। ब्रह्माजी ने उसे महान शक्तियां, दिव्य अस्त्र-शस्त्र और अनेक वरदान प्रदान किए। इन वरदानों के कारण रावण अत्यंत शक्तिशाली बन गया।
रावण का पूर्वजन्म क्या था?
वैष्णव परंपरा में रावण के पूर्वजन्म का उल्लेख विशेष रूप से मिलता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के धाम वैकुण्ठ के द्वार पर जय और विजय नामक दो द्वारपाल रहते थे। एक दिन सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार भगवान विष्णु के दर्शन के लिए वैकुण्ठ पहुंचे। उस समय जय और विजय ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। इससे क्रोधित होकर चारों कुमारों ने उन्हें श्राप दिया कि उन्हें वैकुण्ठ छोड़कर मृत्यु लोक में जन्म लेना पड़ेगा।
जब भगवान विष्णु वहां पहुंचे, तब उन्होंने जय और विजय को बताया कि ऋषियों का श्राप निष्फल नहीं हो सकता। इसके बाद उन्हें दो विकल्प दिए गए- सात जन्म तक भगवान के भक्त बनकर पृथ्वी पर जन्म लेना या तीन जन्म तक भगवान के विरोधी बनकर जन्म लेना। जय और विजय ने शीघ्र वैकुण्ठ लौटने की इच्छा से तीन जन्म तक भगवान के शत्रु रूप में जन्म लेने का मार्ग चुना।
कैसे बना जय-विजय का श्राप रावण के जन्म का कारण?
श्राप के प्रभाव से जय और विजय ने पहला जन्म हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में लिया। उस समय भगवान विष्णु ने वराह और नरसिंह अवतार धारण कर उनका अंत किया। दूसरे जन्म में वही जय और विजय रावण और कुंभकर्ण के रूप में जन्मे। इस जन्म में दोनों असाधारण शक्ति और सामर्थ्य के स्वामी बने। रावण ने लंका पर शासन स्थापित किया और तीनों लोकों में अपना प्रभाव बढ़ाया। हालांकि श्राप के अनुसार उनका उद्धार भगवान विष्णु के हाथों ही होना था। यही कारण बताया जाता है कि त्रेतायुग में भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया।
माता सीता के हरण से शुरू हुआ अंतिम संघर्ष
रामायण के अनुसार जब रावण ने माता सीता का हरण किया, तब घटनाओं ने निर्णायक रूप ले लिया। श्रीराम और लक्ष्मण ने सीता की खोज आरंभ की और उनकी भेंट सुग्रीव तथा श्रीहनुमान जी से हुई। इसके बाद वानर सेना की सहायता से समुद्र पर सेतु का निर्माण किया गया और लंका पर चढ़ाई की गई। युद्ध में रावण के अनेक प्रमुख योद्धा और पुत्र मारे गए। कुंभकर्ण और मेघनाद जैसे पराक्रमी योद्धाओं के निधन के बाद भी रावण युद्ध करता रहा।
कौन सा श्राप बना रावण की मृत्यु की वजह?