Ramayana Mythological Story: अयोध्या के राजकुमार भरत और श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी का संबंध रामायण की अत्यंत रोचक घटनाओं में से एक माना जाता है। हालांकि हनुमान जी श्रीराम के साथ वनवास काल में ही जुड़ चुके थे और लंका विजय में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी, लेकिन भरत और हनुमान जी की पहली भेंट रामायण के उत्तरार्ध में हुई थी। यह घटना उस समय की है जब चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण कर श्रीराम अयोध्या लौटने वाले थे।
वाल्मीकि रामायण और अन्य रामकथाओं में वर्णित इस प्रसंग के अनुसार, श्रीराम ने अयोध्या लौटने से पहले हनुमान जी को भरत के पास भेजा था। उसी अवसर पर पहली बार भरत और हनुमान जी का आमना-सामना हुआ। यह भेंट केवल दो महान व्यक्तित्वों का मिलन नहीं थी, बल्कि श्रीराम के प्रति दोनों की अद्वितीय भक्ति का भी अद्भुत संगम थी।
वनवास की अवधि समाप्त होने का समय
लंका विजय के बाद श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी पुष्पक विमान से अयोध्या की ओर प्रस्थान कर रहे थे। मार्ग में वे विभिन्न आश्रमों और तीर्थों पर पहुंचे। इसी दौरान वे महर्षि भरद्वाज के आश्रम में भी रुके। महर्षि भरद्वाज से चर्चा के समय श्रीराम को स्मरण हुआ कि अयोध्या में भरत पिछले चौदह वर्षों से उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। भरत ने नंदिग्राम में रहकर कठोर तपस्वी जीवन अपनाया था और श्रीराम की चरण पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित करके राज्य का संचालन किया था।
श्रीराम जानते थे कि भरत ने यह प्रतिज्ञा कर रखी थी कि यदि चौदह वर्ष पूर्ण होने पर भी वे वापस नहीं लौटे, तो वे अपने प्राण त्याग देंगे, इसलिए अयोध्या पहुंचने से पहले भरत को अपने आगमन का समाचार देना आवश्यक था।
श्रीराम ने हनुमान जी को क्यों भेजा?
जब अयोध्या लौटने का समय निकट आया, तब श्रीराम ने हनुमान जी को बुलाया और उन्हें एक विशेष दायित्व सौंपा। उन्होंने कहा कि वे नंदिग्राम जाकर भरत को उनके आगमन का समाचार दें। रामायण में वर्णन मिलता है कि श्रीराम केवल संदेश भेजकर संतुष्ट नहीं होना चाहते थे। वे यह भी जानना चाहते थे कि भरत की वर्तमान स्थिति क्या है और उनके मन में क्या भाव हैं, इसलिए उन्होंने हनुमान जी को निर्देश दिया कि वे भरत से मिलकर उनकी मनोदशा का भी अवलोकन करें। हनुमान जी ने श्रीराम की आज्ञा को सिर झुकाकर स्वीकार किया और तत्काल नंदिग्राम की ओर प्रस्थान किया।
नंदिग्राम में तपस्वी जीवन जी रहे थे भरत
अयोध्या के निकट स्थित नंदिग्राम में भरत राजसी सुखों का त्याग कर तपस्वी के समान जीवन व्यतीत कर रहे थे। उन्होंने रेशमी वस्त्रों और आभूषणों का परित्याग कर दिया था। वे जटा धारण करते थे और अत्यंत सादा जीवन जीते थे। राज्य का संचालन वे स्वयं राजा के रूप में नहीं, बल्कि श्रीराम के प्रतिनिधि के रूप में करते थे। राजसिंहासन पर श्रीराम की पादुकाएं विराजमान थीं और भरत स्वयं सेवक की भांति उनका सम्मान करते थे। वनवास की अवधि समाप्त होने के दिन निकट आते जा रहे थे। भरत लगातार श्रीराम की प्रतीक्षा कर रहे थे और उनके मन में यह चिंता भी थी कि कहीं कोई अनिष्ट न हो गया हो।
ब्राह्मण वेश में पहुंचे हनुमान जी
जब हनुमान जी नंदिग्राम पहुंचे, तब उन्होंने सीधे अपने वास्तविक स्वरूप में जाने के बजाय ब्राह्मण का वेश धारण किया। रामायण में वर्णित है कि वे पहले भरत की स्थिति और भावनाओं को समझना चाहते थे। नंदिग्राम पहुंचकर उन्होंने देखा कि भरत अत्यंत साधारण वेशभूषा में तपस्वियों जैसा जीवन जी रहे हैं। उनके शरीर पर तपस्या का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था और उनका पूरा मन श्रीराम के स्मरण में लगा हुआ था। हनुमान जी भरत के समीप पहुंचे और उनसे वार्ता आरंभ की।
भरत की व्याकुलता देखकर हनुमान जी भावुक हुए
भरत से बातचीत के दौरान हनुमान जी ने अनुभव किया कि उनका समस्त जीवन केवल श्रीराम की प्रतीक्षा में बीत रहा है। भरत बार-बार श्रीराम का स्मरण कर रहे थे और उनके लौटने की आशा लगाए बैठे थे। उस समय भरत अत्यंत चिंतित थे, क्योंकि चौदह वर्ष की अवधि लगभग पूर्ण हो चुकी थी। वे सोच रहे थे कि यदि निर्धारित समय तक श्रीराम नहीं लौटे, तो वे अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार प्राण त्याग देंगे। भरत की यह अटूट भक्ति और समर्पण देखकर हनुमान जी का हृदय भी द्रवित हो उठा। उन्होंने समझ लिया कि श्रीराम के प्रति भरत का प्रेम अद्वितीय है।
हनुमान जी ने सुनाया श्रीराम के आगमन का समाचार
जब हनुमान जी ने उचित अवसर देखा, तब उन्होंने भरत को वह शुभ समाचार सुनाया जिसका वे वर्षों से इंतजार कर रहे थे। हनुमान जी ने कहा कि श्रीराम ने रावण का वध कर दिया है, माता सीता सकुशल हैं, लक्ष्मण जी भी स्वस्थ हैं और अब सभी अयोध्या लौट रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि श्रीराम ने स्वयं उन्हें यह समाचार देने के लिए भेजा है। यह समाचार सुनते ही भरत की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। कहा जाता है कि वे कुछ समय तक भावविभोर होकर कुछ बोल ही नहीं सके। उनकी आंखों से आनंद के अश्रु बहने लगे। चौदह वर्षों की प्रतीक्षा समाप्त होने जा रही थी और उनके प्रिय बड़े भाई श्रीराम शीघ्र ही अयोध्या पहुंचने वाले थे।
भरत ने पूछा संदेशवाहक का परिचय
शुभ समाचार सुनने के बाद भरत ने उस ब्राह्मण से उसका परिचय पूछा। वे जानना चाहते थे कि ऐसा मंगल समाचार लेकर आने वाला व्यक्ति कौन है, तब हनुमान जी ने अपना वास्तविक परिचय दिया। उन्होंने बताया कि वे वानरश्रेष्ठ हनुमान हैं और श्रीराम के सेवक तथा भक्त हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वे सुग्रीव की सेना के प्रमुख वीरों में से एक हैं और लंका विजय में श्रीराम के साथ रहे हैं। हनुमान जी का परिचय सुनकर भरत अत्यंत प्रसन्न हुए। वे समझ गए कि उनके सामने वही महान भक्त खड़े हैं जिन्होंने माता सीता की खोज की, समुद्र लांघा और श्रीराम की सेवा में अनेक अद्भुत कार्य किए।
यह भी पढ़ें:-
Ramayan Ki Kahani: रामायण की रचना क्यों हुई? जानें रामायण की मुख्य घटनाएं, कथा और धार्मिक महत्व
Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य
Hanuman Ji Story: कलियुग में कहां रहते हैं हनुमान जी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)