Ramayana Mythological Story: लंका युद्ध के प्रसंगों में मेघनाद (इंद्रजीत) का नाम जितना पराक्रम, युद्धकौशल और मायावी शक्तियों के लिए प्रसिद्ध है, उतना ही उनकी पत्नी सुलोचना का नाम पतिव्रता धर्म और अटूट पतिभक्ति के लिए लिया जाता है। रामायण और उससे जुड़ी लोककथाओं में सुलोचना को ऐसी धर्मपरायण और पतिव्रता स्त्री बताया गया है, जिनकी निष्ठा के आगे देवता, राक्षस और वानर सेना तक नतमस्तक हो गई थी। सुलोचना का चरित्र मुख्य रामायण में सीमित रूप से मिलता है, लेकिन रामकथाओं, लोक परंपराओं और पुराणों में उनके जीवन से जुड़ी अनेक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध कथा वह है, जब युद्धभूमि में मेघनाद के वध के बाद सुलोचना अपने पति का शीश लेने श्रीराम के शिविर तक पहुंची थीं।
कौन थीं सुलोचना?
पौराणिक कथाओं के अनुसार सुलोचना नागराज शेषनाग की पुत्री थीं। उनका विवाह रावण के ज्येष्ठ और सबसे पराक्रमी पुत्र मेघनाद से हुआ था। मेघनाद ने इंद्र को पराजित करके "इंद्रजीत" की उपाधि प्राप्त की थी, इसलिए वह लंका के सबसे शक्तिशाली योद्धाओं में गिने जाते थे। सुलोचना अत्यंत रूपवती, सदाचारी, धर्मनिष्ठ और पतिव्रता थीं। यद्यपि उनका विवाह राक्षस कुल में हुआ था, फिर भी वे अपने आचरण, संयम और पति के प्रति समर्पण के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध थीं। लंका में रहते हुए भी उन्होंने सदैव मर्यादा और पतिव्रता धर्म का पालन किया।
लंका युद्ध में मेघनाद का प्रवेश
जब श्रीराम और रावण के बीच युद्ध प्रारंभ हुआ तो रावण की ओर से सबसे बड़ा सहारा उसका पुत्र मेघनाद था। उसने अपने मायावी अस्त्रों और दिव्य शक्तियों से कई बार वानर सेना को संकट में डाल दिया। यहां तक कि उसने भगवान राम और लक्ष्मण पर भी नागपाश का प्रयोग किया था। मेघनाद युद्धभूमि में बार-बार वानर सेना को परास्त कर रहा था। उसकी शक्ति का सामना करना अत्यंत कठिन था। तब विभीषण ने श्रीराम को बताया कि यदि मेघनाद अपने विशेष यज्ञ को पूर्ण कर लेगा तो उसे युद्ध में पराजित करना लगभग असंभव हो जाएगा। इसके बाद लक्ष्मण, हनुमान और विभीषण मेघनाद के यज्ञस्थल पहुंचे। वहां भयंकर युद्ध हुआ और अंततः लक्ष्मण ने मेघनाद का वध कर दिया।
सुलोचना को कैसे मिला पति के वध का समाचार?
पौराणिक कथा के अनुसार, जब मेघनाद युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए, तब लंका में स्थित सुलोचना को इस घटना का संकेत मिला। कुछ कथाओं के अनुसार उन्होंने अशुभ स्वप्न देखा, जबकि कुछ कथाओं में कहा गया है कि उनके महल में अनेक अपशकुन होने लगे। इसी बीच युद्धभूमि से एक अद्भुत घटना घटित हुई। कहा जाता है कि मेघनाद की कटी हुई भुजा आकाश मार्ग से उड़ती हुई सुलोचना के महल में आ गिरी। अपने पति की भुजा को देखकर सुलोचना समझ गईं कि कोई बड़ा अनर्थ हो चुका है। कथा के अनुसार पतिव्रता सुलोचना ने उस भुजा से सत्य जानने का प्रयास किया। उन्होंने मन ही मन अपने पति का स्मरण किया और प्रार्थना की कि यदि उनकी पतिव्रता शक्ति सत्य है तो यह भुजा उन्हें पूरी घटना बताए।
कटी हुई भुजा ने लिखी युद्ध की कथा
रामकथा की लोकपरंपराओं में एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग मिलता है। कहा जाता है कि सुलोचना ने भूमि पर एक लेखनी रखी और अपनी पतिव्रता शक्ति के प्रभाव से मेघनाद की कटी हुई भुजा से युद्ध का वृत्तांत लिखवाया। उस भुजा ने लिखा कि युद्धभूमि में लक्ष्मण के हाथों उसका वध हो चुका है। साथ ही यह भी लिखा कि लक्ष्मण कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे शेषनाग के अवतार हैं। इस प्रकार सुलोचना को अपने पति के निधन का पूर्ण समाचार प्राप्त हुआ। कथा के अनुसार यह जानकर सुलोचना अत्यंत दुखी हुईं, लेकिन उन्होंने धैर्य नहीं खोया। उन्होंने अपने पति के अंतिम दर्शन करने और उनका शीश प्राप्त करने का निश्चय किया।
रावण के दरबार में पहुंचीं सुलोचना
पति की मृत्यु का समाचार मिलने के बाद सुलोचना रावण के दरबार में पहुंचीं। उन्होंने रावण से कहा कि उन्हें मेघनाद का शीश चाहिए ताकि वे अपने पति का अंतिम संस्कार विधिपूर्वक कर सकें, लेकिन उस समय रावण स्वयं शोक और क्रोध से भरा हुआ था। कुछ कथाओं में वर्णन मिलता है कि उसने युद्ध की परिस्थितियों का हवाला देते हुए सुलोचना की इच्छा पूरी करने में असमर्थता जताई। तब सुलोचना ने स्वयं श्रीराम के शिविर में जाकर अपने पति का शीश मांगने का निर्णय लिया।
श्रीराम के शिविर में पहुंचीं सुलोचना
जब सुलोचना श्रीराम के शिविर में पहुंचीं तो वानर सेना उन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह गई। वे शत्रु पक्ष की राजकुमारी और मेघनाद की पत्नी थीं, फिर भी उनके चेहरे पर शोक, संयम और पतिव्रता तेज स्पष्ट दिखाई दे रहा था। उन्होंने श्रीराम को प्रणाम किया और विनम्रता से अपने पति का शीश मांगा। श्रीराम ने उनके दुख को समझा और सम्मानपूर्वक उनका स्वागत किया।
जब मेघनाद का कटा हुआ शीश मुस्कुराया