Ramayana Katha: पौराणिक कथाओं के अनुसार अहिरावण पाताललोक का राजा था। उसे तंत्र-मंत्र, मायावी विद्या और अनेक गूढ़ शक्तियों का ज्ञान प्राप्त था। अहिरावण, रावण का सौतेला भाई था।
Ramayana Mythological Story: लंका युद्ध के दौरान अनेक ऐसे प्रसंग सामने आए, जिनका वर्णन मुख्य रामायण के अतिरिक्त विभिन्न रामकथाओं, लोक परंपराओं तथा रामचरित से जुड़े ग्रंथों में मिलता है। इन्हीं में से एक अत्यंत रोचक और प्रसिद्ध कथा अहिरावण की है। लंका में श्रीराम और रावण के बीच भीषण युद्ध चल रहा था। रावण के एक-एक करके सभी प्रमुख योद्धा युद्धभूमि में पराजित हो रहे थे, जिससे उसकी चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी। जब उसे यह समझ आ गया कि सीधे युद्ध में श्रीराम और लक्ष्मण को हराना उसके लिए संभव नहीं है, तब उसने एक ऐसी योजना बनाई, जिसने पूरी वानर सेना को संकट में डाल दिया। रावण ने पाताललोक के मायावी और तांत्रिक शक्तियों से संपन्न राजा अहिरावण को सहायता के लिए बुलाया। इसके बाद अहिरावण ने ऐसा छल रचा कि स्वयं हनुमान जी की सुरक्षा व्यवस्था भी भेद दी गई और श्रीराम-लक्ष्मण का अपहरण कर उन्हें पाताललोक ले जाया गया। आखिर अहिरावण कौन था, उसने दोनों भाइयों का अपहरण क्यों किया और भगवान हनुमान ने किस प्रकार पाताललोक पहुंचकर उन्हें मुक्त कराया, आइए पौराणिक कथा से जानते हैं।
कौन था अहिरावण?
पौराणिक कथाओं के अनुसार अहिरावण पाताललोक का राजा था। उसे तंत्र-मंत्र, मायावी विद्या और अनेक गूढ़ शक्तियों का ज्ञान प्राप्त था। अहिरावण, रावण का सौतेला भाई था। अहिरावण देवी की उपासना करता था और अपनी सिद्धियों के कारण देवताओं तथा दानवों में भी प्रसिद्ध था। पाताललोक में उसका प्रभाव अत्यंत व्यापक था। वह युद्धकला के साथ-साथ मायाजाल रचने में भी निपुण था। उसकी सबसे बड़ी शक्ति यह थी कि वह किसी भी रूप में प्रकट हो सकता था और अपनी माया से बड़े-बड़े योद्धाओं को भ्रमित कर देता था।
रावण ने क्यों ली अहिरावण की सहायता?
लंका युद्ध के दौरान रावण के अनेक प्रमुख योद्धा मारे जा चुके थे। कुंभकर्ण, अतिकाय, देवांतक, नरांतक और अन्य कई राक्षस वीर युद्धभूमि में परास्त हो चुके थे। दूसरी ओर वानर सेना का उत्साह बढ़ता जा रहा था। जब रावण ने देखा कि सीधे युद्ध में श्रीराम और लक्ष्मण को पराजित करना संभव नहीं है, तब वह अत्यंत चिंतित हो उठा। उसे अपने राज्य और जीवन दोनों का भय सताने लगा।
इसी संकट की घड़ी में उसे अपने मायावी सहयोगी अहिरावण का स्मरण हुआ। रावण ने गुप्त रूप से अहिरावण को संदेश भेजा और उससे सहायता मांगी। उसने कहा कि यदि किसी प्रकार श्रीराम और लक्ष्मण को युद्धभूमि से हटाया जा सके तो वानर सेना स्वतः कमजोर पड़ जाएगी और युद्ध का परिणाम बदल सकता है।
अहिरावण ने बनाई अपहरण की योजना
अहिरावण ने रावण की बात सुनकर एक योजना बनाई। वह जानता था कि युद्ध शिविर में भगवान हनुमान स्वयं श्रीराम और लक्ष्मण की रक्षा कर रहे हैं। हनुमान की उपस्थिति में किसी भी प्रकार का छल करना आसान नहीं था।
उस समय हनुमान जी ने अपनी पूंछ का विशाल घेरा बनाकर सुरक्षा कवच तैयार किया था। उस घेरे के भीतर श्रीराम और लक्ष्मण विश्राम कर रहे थे। किसी भी राक्षस के लिए उस सुरक्षा व्यवस्था को भेदना असंभव माना जा रहा था। अहिरावण ने समझ लिया कि बल प्रयोग से सफलता नहीं मिलेगी, इसलिए उसने माया और रूप परिवर्तन का सहारा लेने का निश्चय किया।
विभीषण का रूप धारण कर शिविर में पहुंचा
अहिरावण ने विभीषण का रूप धारण कर लिया। वह बिल्कुल विभीषण जैसा दिखाई देने लगा। उसकी वाणी, चाल-ढाल और स्वर तक विभीषण के समान हो गए। रात्रि के समय वह वानर सेना के शिविर के निकट पहुंचा। जब हनुमान जी ने उसे देखा तो उन्हें लगा कि यह वास्तव में विभीषण हैं, क्योंकि विभीषण का शिविर में आना-जाना सामान्य बात थी, इसलिए हनुमान जी को कोई संदेह नहीं हुआ।
कुछ कथाओं में वर्णन मिलता है कि अहिरावण ने अपनी मायावी शक्ति से पूरे शिविर को गहरी निद्रा में सुला दिया। वानर सेना, रक्षक और अन्य योद्धा सब उसकी माया के प्रभाव में आ गए। इसके बाद वह सुरक्षा घेरा पार करके उस स्थान तक पहुंच गया जहां श्रीराम और लक्ष्मण विश्राम कर रहे थे।
श्रीराम और लक्ष्मण का अपहरण
अहिरावण ने अपनी तांत्रिक शक्तियों का प्रयोग किया और श्रीराम तथा लक्ष्मण को अचेत अवस्था में उठा लिया। इसके बाद वह उन्हें लेकर आकाश मार्ग से पाताललोक की ओर चल पड़ा। किसी को इस घटना का पता तक नहीं चला। जब रात बीत गई और प्रातःकाल हुआ, तब वानर सेना में हलचल मच गई। सभी ने देखा कि श्रीराम और लक्ष्मण अपने स्थान पर नहीं हैं। हनुमान जी सहित सभी योद्धा चिंतित हो उठे। चारों ओर खोज की गई लेकिन दोनों भाइयों का कोई पता नहीं चला।
विभीषण ने बताया अहिरावण का रहस्य
जब वास्तविक विभीषण वहां पहुंचे तो पूरी घटना का रहस्य सामने आया। उन्होंने बताया कि वह रात में शिविर में आए ही नहीं थे। तब सभी को समझ में आया कि किसी मायावी राक्षस ने उनका रूप धारण किया था। विभीषण ने बताया कि ऐसा कार्य केवल अहिरावण ही कर सकता है। उन्होंने हनुमान जी को बताया कि अहिरावण पाताललोक का शक्तिशाली राजा है और संभवतः वही श्रीराम तथा लक्ष्मण को अपने साथ ले गया है। यह सुनते ही हनुमान जी ने उन्हें खोजने का संकल्प लिया।
पाताललोक की ओर हनुमान जी की यात्रा
हनुमान जी तुरंत पाताललोक की ओर प्रस्थान कर गए। मार्ग में उन्हें अनेक विचित्र बाधाओं का सामना करना पड़ा। पाताललोक तक पहुंचना सामान्य कार्य नहीं था। वहां पहुंचने के लिए रहस्यमयी मार्गों और द्वारों को पार करना पड़ता था। कथाओं के अनुसार पाताललोक के प्रवेश द्वार पर मकरध्वज नामक योद्धा पहरा दे रहा था। जब हनुमान जी वहां पहुंचे तो मकरध्वज ने उन्हें रोक लिया।
मकरध्वज और हनुमान जी का सामना
मकरध्वज ने स्वयं को हनुमान जी का पुत्र बताया। यह सुनकर हनुमान जी आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि वे आजीवन ब्रह्मचारी थे, तब मकरध्वज ने बताया कि जब हनुमान जी लंका दहन के बाद समुद्र में अपनी पूंछ की अग्नि शांत करने गए थे, तब उनके शरीर से निकली पसीने की एक बूंद समुद्र में गिरी थी। उसे एक मछली ने निगल लिया और उसी से मकरध्वज का जन्म हुआ।
हालांकि, मकरध्वज अपने पिता का सम्मान करता था, फिर भी वह अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटा। दोनों के बीच युद्ध हुआ और अंततः हनुमान जी ने उसे पराजित कर बांध दिया। इसके बाद हनुमान जी पाताललोक के भीतर प्रवेश कर गए।
देवी को बलि चढ़ाने की तैयारी
अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को देवी के समक्ष बलि के रूप में अर्पित करने की तैयारी कर रहा था। उसने विशाल यज्ञ और अनुष्ठान का आयोजन किया था। उसका विश्वास था कि यदि वह इन दोनों दिव्य पुरुषों की बलि दे देगा तो उसे अपार शक्ति प्राप्त होगी और रावण को भी विजय मिल जाएगी। पाताललोक में चारों ओर राक्षसों की सेना तैनात थी। यज्ञ मंडप को कड़ी सुरक्षा में रखा गया था, ताकि कोई वहां तक न पहुंच सके।
हनुमान जी ने बनाई नई योजना
हनुमान जी ने स्थिति का निरीक्षण किया और समझ लिया कि सीधे आक्रमण करने से श्रीराम और लक्ष्मण को खतरा हो सकता है, इसलिए उन्होंने युक्ति से कार्य करने का निश्चय किया। हनुमान जी ने सूक्ष्म रूप धारण किया और देवी के मंदिर में प्रवेश कर गए। वहां पहुंचकर उन्होंने ऐसी व्यवस्था की कि अहिरावण को उनके आने का पता न चल सके। इसी दौरान उन्हें ज्ञात हुआ कि अहिरावण को मारने का एक विशेष उपाय है।
पंचमुखी हनुमान का प्राकट्य
कथा के अनुसार अहिरावण के जीवन की रक्षा पांच दिशाओं में जल रहे पांच दीपकों से हो रही थी। जब तक वे पांचों दीपक एक साथ नहीं बुझते, तब तक अहिरावण का वध संभव नहीं था। यह कार्य सामान्य रूप से नहीं किया जा सकता था, तब हनुमान जी ने पंचमुखी स्वरूप धारण किया। इस रूप में उनके पांच मुख थे- हनुमान, नरसिंह, गरुड़, वराह और हयग्रीव। पंचमुखी स्वरूप धारण कर उन्होंने एक ही समय में पांचों दिशाओं में जल रहे दीपकों को बुझा दिया। जैसे ही दीपक बुझे, अहिरावण की रक्षा शक्ति समाप्त हो गई।
अहिरावण का वध
दीपक बुझने के बाद हनुमान ने युद्ध में अहिरावण का सामना किया। भीषण संघर्ष हुआ, लेकिन अब अहिरावण की मायावी शक्तियां निष्प्रभावी हो चुकी थीं।हनुमान जी ने अपने अद्भुत बल और पराक्रम से अहिरावण का वध कर दिया। उसके मरते ही पाताललोक में हाहाकार मच गया और राक्षस सेना तितर-बितर हो गई। इसके बाद हनुमान जी ने श्रीराम और लक्ष्मण को बंधनमुक्त किया।
श्रीराम और लक्ष्मण की वापसी
अहिरावण के वध के बाद हनुमान जी, श्रीराम और लक्ष्मण को लेकर पुनः लंका के युद्ध शिविर में लौट आए। दोनों भाइयों को सुरक्षित देखकर वानर सेना अत्यंत प्रसन्न हुई। विभीषण, सुग्रीव, जाम्बवान और अन्य सभी वीरों ने हनुमान की प्रशंसा की। इस प्रकार अहिरावण की योजना विफल हो गई और रावण का एक और प्रयास असफल साबित हुआ।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)