Ramayana Mythological Story: रामायण में जटायु का नाम तो लगभग हर व्यक्ति जानता है, जिन्होंने माता सीता की रक्षा के लिए रावण से युद्ध करते हुए अपने प्राणों का त्याग कर दिया था। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जटायु के बड़े भाई सम्पाती भी रामकथा के अत्यंत महत्वपूर्ण पात्रों में से एक थे। यदि सम्पाती न होते, तो संभव है कि माता सीता का पता लगाना वानर सेना के लिए अत्यंत कठिन हो जाता। रामायण में उनका योगदान प्रत्यक्ष युद्ध से अधिक ज्ञान, त्याग और सत्य के उद्घाटन से जुड़ा हुआ है।
सम्पाती की कथा केवल एक पक्षी की कहानी नहीं, बल्कि रामायण के उस महत्वपूर्ण प्रसंग का हिस्सा है, जिसने भगवान श्रीराम के लंका विजय अभियान को दिशा प्रदान की। वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड और अन्य रामकथाओं में सम्पाती का उल्लेख विस्तार से मिलता है।
सम्पाती और जटायु का जन्म
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सम्पाती और जटायु दोनों अरुण के पुत्र थे। अरुण को सूर्यदेव का सारथि माना जाता है और वे महर्षि कश्यप तथा विनता के पुत्र बताए गए हैं। इस प्रकार सम्पाती और जटायु का संबंध गरुड़ वंश से माना जाता है। सम्पाती बड़े भाई थे, जबकि जटायु उनसे छोटे थे। दोनों अत्यंत शक्तिशाली गिद्ध थे और आकाश में दूर-दूर तक उड़ने की क्षमता रखते थे। बचपन से ही दोनों भाइयों में गहरा स्नेह था और वे सदैव साथ रहते थे।
बाल्यकाल की ने बदल दिया सम्पाती का जीवन
रामायण में वर्णित कथा के अनुसार एक बार सम्पाती और जटायु के मन में अपनी शक्ति की परीक्षा लेने का विचार आया। दोनों भाइयों ने निश्चय किया कि वे आकाश में उड़कर सूर्य के निकट तक पहुंचेंगे और देखेंगे कि कौन अधिक ऊंचाई तक जा सकता है। दोनों भाई आकाश में तेजी से उड़ने लगे। धीरे-धीरे वे सूर्य के अत्यंत समीप पहुंच गए। उस समय सूर्य का तेज अत्यधिक प्रखर था।
छोटे भाई जटायु सूर्य की तपिश सहन नहीं कर पा रहे थे और उनके प्राण संकट में पड़ गए। अपने छोटे भाई को संकट में देखकर सम्पाती ने अपने विशाल पंख फैलाकर जटायु को सूर्य की किरणों से ढक लिया। उन्होंने अपने शरीर से भाई की रक्षा की, लेकिन सूर्य के प्रचंड ताप से उनके अपने पंख जल गए।
पंख जल जाने के कारण सम्पाती धरती पर गिर पड़े। इस घटना के बाद वे फिर कभी पहले की तरह उड़ नहीं सके। दूसरी ओर जटायु सुरक्षित बच गए। इस प्रकार बड़े भाई सम्पाती ने अपने छोटे भाई के प्राण बचाने के लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया।
विंध्य पर्वत पर बिताया जीवन
पंख नष्ट हो जाने के बाद सम्पाती उड़ने में असमर्थ हो गए। वे दक्षिण दिशा में स्थित विंध्य पर्वत के क्षेत्र में रहने लगे। समय के साथ उनकी शक्ति क्षीण हो गई और वे एकांत जीवन व्यतीत करने लगे। रामायण में उल्लेख मिलता है कि वर्षों तक वे वहीं निवास करते रहे। उनका जीवन तप, प्रतीक्षा और एकांत में बीतने लगा। हालांकि उनके दिव्य नेत्रों की शक्ति बनी हुई थी और वे दूर तक देखने में सक्षम थे।
जटायु के बलिदान का समाचार
समय बीतता गया और त्रेतायुग में जब भगवान श्रीराम वनवास के दौरान पंचवटी में निवास कर रहे थे, तभी रावण माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले गया। माता सीता को बचाने के लिए जटायु ने रावण का मार्ग रोका और उससे घोर युद्ध किया। वृद्ध होने के बावजूद जटायु ने अद्भुत पराक्रम दिखाया, किंतु अंततः रावण ने उनके पंख काट दिए और वे भूमि पर गिर पड़े। बाद में भगवान श्रीराम ने स्वयं जटायु को मोक्ष प्रदान किया।
जब सम्पाती को यह ज्ञात हुआ कि उनके प्रिय भाई जटायु भगवान श्रीराम के कार्य में अपने प्राण न्योछावर कर चुके हैं, तो वे अत्यंत दुःखी हुए, लेकिन साथ ही उन्हें अपने भाई के महान बलिदान पर गर्व भी हुआ।
वानर सेना से सम्पाती की भेंट
माता सीता की खोज के लिए भगवान श्रीराम ने वानरराज सुग्रीव की सेना को चारों दिशाओं में भेजा। दक्षिण दिशा में खोज करने का दायित्व अंगद, जाम्बवान और हनुमान सहित अनेक वानरों को मिला। कई दिनों तक खोज करने के बाद भी जब माता सीता का पता नहीं चला, तब सभी वानर अत्यंत निराश हो गए। वे समुद्र तट के निकट पहुंच गए और सोचने लगे कि यदि वे बिना समाचार के लौटे तो दंड मिलेगा।
इसी दौरान उनकी दृष्टि एक विशाल गिद्ध पर पड़ी। वह सम्पाती थे, जो वृद्धावस्था में वहीं निवास कर रहे थे। प्रारंभ में सम्पाती ने वानरों को देखा और सोचा कि उन्हें भोजन प्राप्त होगा, लेकिन जब उन्होंने बातचीत के दौरान जटायु का नाम सुना, तो वे चौंक उठे। सम्पाती ने पूछा कि उनके भाई जटायु का क्या हुआ है। तब वानरों ने जटायु के बलिदान की पूरी कथा सुनाई।
सीता का पता कैसे चला?
जटायु की कथा सुनकर सम्पाती अत्यंत भावुक हो उठे। उन्होंने अपने भाई के लिए शोक व्यक्त किया और फिर वानरों की सहायता करने का निश्चय किया। सम्पाती के पास दिव्य दृष्टि थी। उन्होंने अपने तप और विशेष सामर्थ्य के कारण दूर तक देखने की क्षमता प्राप्त कर रखी थी। जब वानरों ने माता सीता की खोज का उद्देश्य बताया, तब सम्पाती ने अपने दिव्य नेत्रों से दक्षिण दिशा की ओर देखा।
उन्होंने बताया कि विशाल समुद्र के पार स्थित स्वर्णमयी लंका नगरी में माता सीता अशोक वाटिका में विराजमान हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि रावण उन्हें वहीं रखे हुए है। सम्पाती ने यह भी बताया कि लंका यहां से लगभग सौ योजन दूर स्थित है। यह सूचना वानर सेना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई। यदि सम्पाती यह रहस्य न बताते, तो वानरों को यह ज्ञात ही नहीं हो पाता कि माता सीता लंका में हैं।
हनुमान के लंका गमन का मार्ग प्रशस्त हुआ